ब्राह्मणों के लिए पण्डित शब्द का सम्बोधन उसी प्रकार रूढ़ हो गया जैसे किसी विधवा के लिए राड़़ शब्द का सम्बोधन रूढ़ हुआ। परन्तु प्रत्येक ब्राह्मण पण्डित नहीं होता और प्रत्येक विधवा ( राँड़) रण्डिका (रड़िया) नहीं होती है। दर असल राँड़ का मूल रूप (तत्सम) रण्डिका है और रण्डिका रण्डी ( वेश्या) का पर्याय है।
पण्डित शब्द के अर्थ में गीता के सन्दर्भ विचारणीय हैं।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।5.18।।
पण्डित जन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय, हाथी एवं कुत्ते में भी आत्मा रूप मे समानता को देखनेवाले होते हैं
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥
श्रीमद भगवदगीता – (4.19 )
अर्थ: जिसके सम्पूर्ण कर्म बिना इच्छा और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निद्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं ॥
यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 11वां श्लोक है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं: "ज्ञानी (पंडित) लोग न तो जीवितों के लिए शोक करते हैं और न ही मृतों के लिए, क्योंकि आत्मा अजर-अमर है।" यह ज्ञान, जीवन और मृत्यु की अनित्यता को समझते हुए मोह और शोक से ऊपर उठने की शिक्षा देता है।
श्लोक और अर्थ:
- मूल श्लोक: अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥
- अर्थ: हे अर्जुन! तुम उन लोगों के लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं हैं (भीष्म, द्रोण आदि), और ज्ञान की बातें भी कर रहे हो। जो बुद्धिमान (पंडित) हैं, वे गतासून् (जिनके प्राण चले गए हैं - मृत) और अगतासून् (जिनके प्राण नहीं गए हैं - जीवित) के लिए शोक नहीं करते।
प्रमुख बिंदु:
- आत्मा अमर है: पण्डित उसे कहते हैं जो शरीरी (आत्मा) की अमरता और शरीर की नश्वरता को जानता है।
- अनावश्यक शोक: जीवन और मृत्यु प्रकृति के नियम हैं, अतः इनके लिए विलाप करना मूर्खता है।
- ज्ञान की बात: पंडित ज्ञानी की बातें तो करते हैं लेकिन वे इन भावनाओं से ऊपर उठे होते हैं।
इस प्रकार सारे ब्राह्मण पण्डित नहीं होते-
इसी क्रम में राँड़ के संस्तृत सन्दर्भ-
रण्डा = वेश्या । राँड् इति भाषा ॥ यथा । तिष्ठते रण्डा विकर्म्मस्थेभ्यः स्वहृदयं व्यनक्तीत्यर्थः । इति संक्षिप्तसारे तिङन्तपादः ॥
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