गीत-हालात, इश्क और बगावत
गीत परिचय
गायन शैली: भावुक लोक-गीत एवं अर्ध-शास्त्रीय फ्यूजन (दर्द और कटाक्ष का मिश्रण)।
स्थाई भाव: व्यवस्था पर तंज, मोहब्बत की उलझन और जिंदगी के संघर्ष का खूबसूरत संगम।
(अंतरा 1: देश, व्यवस्था और विडंबना)
मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...
कुछ अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!
मंचों पर उपदेश, पंच बैठे हैं अन्यायी,
वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!
अंतरा (कोरस के साथ):
राजनीति का गंदा खेल, विपक्षी बना है द्रोही,
जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, क्रम बनता आरोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष।
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!
(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)
संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):
पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,
अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!
लेते उनसे ज्ञान, मति गयी उनकी मारी,
दौलत के पीछे, उम्र बीत गयी सारी।
जीवन के कुछ दिन अभी रहे हैं शेष।
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, कुछअनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!
मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):
स्वर "ईश्वर" बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,
भाँग-धतूरा, फूँक रहे मन्दिरों में पाखंडी !
पढ़ने वालों को उपदेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी और पड़ी देश में मंदी! युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश।
महंगाई बेकाबू आम जन लाचार है, दिनदूनी रात चौगुनी बढती कीमतों की मार है।
बेरोजगारी , रिश्वतघोरी जनता में हाहाकार है।
व्यापारीयों की बहार है।
संशोधित गीत -
उत्तर भारतीय लोक संगीत शैली में कब्बाली का हारमोनियम व ढोलक की ताल पर सम्फोनी व सिंथ के स्वर को साथ स्पष्ट उच्चारण करते हुए ऑडियो जनरेट करें !
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गीत-हालात, इश्क और बगावत
गीत परिचय
गायन शैली: भावुक लोक-गीत एवं अर्ध-शास्त्रीय कब्बाली सूफी शैली में (दर्द और कटाक्ष का मिश्रण) ।
स्थाई भाव: व्यवस्था पर तंज, मोहब्बत की उलझन और जिंदगी के संघर्ष का खूबसूरत संगम।
(अंतरा 1: देश, व्यवस्था और विडंबना)
मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...
अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!
मंचों पर उपदेश, पंच बैठे अन्यायी,
वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!
अंतरा (कोरस के साथ):
राजनीति का गंदा खेल, विपक्ष बना है द्रोही,
जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, क्रम बनता आ रोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष।
दिन रात आदमी रोजी को, लगा रहा है रेश
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!
(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)
संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):
पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,
अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!
लेते उनसे ज्ञान, मती गयी उनकी मारी,
दौलत के पीछे, बीत गयी उमर सारी।
जीवन के कुछ दिन अभी रह गये शेष।
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश, कुछ अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!
मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):
स्वर ईश्वर बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,
भाँग-धतूरा, फूँक रहे, मन्दिर पड़े पाखंडी !
छल कपट और द्वेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी छाई देश में मंदी!
मँहगाई बेसुमार, कहीं बेरोजगारी।
जाति वाद का खेल, कुपात्र अधिकारी ।
डिगा नहीं कभी बिका नहीं न कभी किसी से द्वेष।
युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे,पढ़ने वालों को उपदेश।
महंगाई बेकाबू आम जन लाचार है, दिनदूनी रात चौगुनी बढती कीमतों की मार है।
बेरोजगारी ,रिश्वतघोरी जनता में हाहाकार है।
व्यापारीयों की बहार है।
गीत का स्क्रिप्ट नयी शैली में प्रस्तुत कर लिखें
गीत-हालात, इश्क और बगावत
मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...
अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!
मंचों पर उपदेश, पंच बैठे अन्यायी,
वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!
अंतरा (कोरस के साथ):
राजनीति का गंदा खेल, विपक्ष बना है द्रोही,
जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, राह में लुटा बटोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष
महिलाओं को दे रहा बैठा बैठा कहीं उपदेश ।
बेरोजगारी और मंहगायी कालाबाजारी निवेश।
दिन रात आदमी रोजी को, बस लगा रहा है रेश
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!
(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)
संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):
पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,
अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!
लेते उनसे ज्ञान, मती गयी उनकी मारी,
दौलत के पीछे,भागती देशी दुनिया सारी ।
जीवन के कुछ दिन अभी रह गये शेष।
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश, कुछ अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!
मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):
स्वर, ईश्वर बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,
भाँग-धतूरा, फूँक रहे, मन्दिर में पड़े पाखंडी !
छल कपट और द्वेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी छाई देश में मंदी!
मँहगाई बेसुमार, कहीं बेरोजगारी।
जाति वाद का खेल, कुपात्र अधिकारी ।
डिगा नहीं कभी बिका नहीं न कभी किसी से द्वेष।
युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे,पढ़ने वालों को उपदेश।
महंगाई बेकाबू आम जन लाचार है, दिन दूनी रात चौ गुनी बढती कीमतों की मार है।
बेरोजगारी ,रिश्वतघोरी जनता में हाहाकार है।
स्टोक भरा है चीना का ,व्यापारीयों की बहार है।
हिमांचली लोक संगीत शैली में ऑडियो जनरेट करें !
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