दृश्य 2: आगाज़ (Sher & Alaap)
कैमरा एंगल: क्लोज-अप शॉट (Close-up Shot) चेहरे और एक्सप्रेशन पर। संगीत में ध्रुपद शैली का गंभीर आलाप गूँजता है।
संगीत: तानपूरे और हारमोनियम की गूँज के साथ हल्का ढोलक/तबला।
अभिनय / प्रस्तुति: > (गीतकार आँखें बंद करके भावुकता के साथ शेर पढ़ते हैं) > "हे रहवर तेरी वारगाह में आके, सिर तेरे सज्दे में झुका के। > सुकूँन बहुत मिलता है, एक तेरी रूहानी नज्म गाके..." >
(लय थोड़ी बढ़ती है - तीव्र ताल की शुरुआत) > "वक़्त की धूप में ज़िन्दगी यूँ ही ढलती जा रही है धीरे, > कुछ हासिल नहीं होगा अब, उम्र अपनी यों ही गँवा के!"
दृश्य 3: मुखड़ा (Mukhda)
कैमरा एंगल: वाइड शॉट (Wide Shot) - मंच का पूरा दृश्य, हिमांचली लोक धुन और द्रुपद का फ्यूजन यहाँ पूरी तीव्रता पकड़ता है। ढोलक और हारमोनियम की तीव्र गति।
प्रस्तुति (गायन): > "मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात! > दिन गुजर जाते हैं यों ही गुजर जाती हैं रात! > हम मंजिलों को पालेंगे, गर मिल जाए तेरा साथ। > मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात!"
दृश्य 4: अंतरा 1 & 2
कैमरा एंगल: डायनामिक कैमरा मूवमेंट (धीमी गति से कलाकारों के पास घूमता हुआ कैमरा)।
प्रस्तुति (गायन): > "जेहन के खयालों में, ज़िन्दगी के सवालों में। > धड़कनों की तालों में, मेरे हर हालों में! हो तेरा नूरानी जज्बात— > मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात!..." >
(बिना रुके अगले अंतरे की ओर बढ़ते हुए) > "सिसकियों की तानों में, मेरे सब तरानों में > ज़िन्दगी के अरमानों में, हो बस तेरी ही बात! > मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात!..."
दृश्य 5: अंतरा 3 & 4 (Climax Build-up)
कैमरा एंगल: ऊर्जावान शॉट, कैमरे की गति तेज होती है।
प्रस्तुति (गायन - तीव्र लय में): > "मैं पथिक थका पर नहारा, गिरकर चला दुबारा। > साँसें तब तलक हैं आशें! निगाहें तुझको तलाशें।। > हम्हे तू ही दे सहारा। खस्ता है मेरी हालात।" >
(अगला अंतरा - भावपूर्ण और दृढ़ स्वर में) > "हमने खुद को परखा है जाके उन मुकामों पे! > ईमान भी बिक जाते जहाँ लोगों के सस्ते दामों पे।। > हम डिगें नहीं कभी बिकें नहीं रहे तेरा हम पे हाथ!"
दृश्य 6: समापन (Outro)
कैमरा एंगल: मंच का वाइड शॉट, सभी संगीतकार और गायक एक साथ सुर मिलाते हैं।
प्रस्तुति (अंतिम पंक्तियाँ): > "मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात! > दिन गुजर जाते हैं यों ही गुजर जाती हैं रात! > हम मंजिलों को पालेंगे, गर मिल जाए तेरा साथ। > सज्दा तेरा करता रहूँ मुझे इतनी दे खैरात।।" * फेड आउट (Fade Out): संगीत धीरे-धीरे धीमा होता है, मंच की लाइट कम होती है और वीडियो समाप्त होता है।
★-"इतिहास के बिखरे हुए पन्ने"-★
शुक्रवार, 11 सितंबर 2026
जुबैर विडियो स्क्रिप्ट-
गुरुवार, 10 सितंबर 2026
ऊँ हरि ऊं ओम हरि ऊंं ओम हरि बोल ....
बुधवार, 9 सितंबर 2026
गाना
इस गीत को अत्ताउल्ला खाँ जैसी मिलती जुलती आवाज में उन्हीं के मिलते अन्दाज में कोरस कब्बाली की शैली में मेघालयी व अरुणाचली लोक धुनों के मिश्रण से युक्त करे के ऑडियो ट्रेक जनरेट करें!
शेर (आगाज़)
हे रहवर तेरी वारगाह में आके, सिर तेरे सज्दे में झुका के।
सुकूँ बहुत मिलता है, एक तेरी रुहानी नज्म गाके
वक़्त की धूप में जिन्दगी यूँ ही ढलती जा रही है धीरे,
कुछ हासिल नहीं होगा अब , उम्र अपनी यों ही गँवा के
(मुखड़ा)
मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात!
दिन गुजर जाते हैं यों ही गुजर जाती हैं रात!
हम मंजिलों को पालेंगे ,गर मिल जाए तेरा साथ।
मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात!
अंतरा - १
जेहन के खयालों में , जिन्दगी के सबालों में।
धड़कनों की तालों में,मेरे हर हालों में ! हो बस एक नूरानी जज्बात-
मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात!
दिन गुजर जाते हैं यों ही गुजर जाती हैं रात!
हम मंजिलों को पालेंगे ,गर मिल जाए तेरा साथ।
सिसकियों की तानों में, मेरे सब गानों में
जिन्दगी के अरमानों में तेरी हो बात !
मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात!
दिन गुजर जाते हैं यों ही गुजर जाती हैं रात!
हम मंजिलों को पालेंगे ,गर मिल जाए तेरा साथ।
मैं पथिक थका मारा, गिरकर चला दुबारा। सांसे तब तलक आशें निगाहे तुझको तलाशें
थका पर न हारा
उसकी रहमत होगी जरूर,मेरी पुकार पे
कौन है खिवैया मेरी इस मझधार का?
कौन है बनाने वाला इस संसार का...
अंतरा - २
हम बेकसूरों पे ग़मों की बिजलियाँ गिराई गईं
जहाँ ईमान बिकते हैं, वो फ़रोशगाह सजाई गईं
हमने खुद को परखा है जाके उन मुकामों पे
ईमान भी बिक जाते लोगों का सस्ते दामों पे
ये दौर है इस मतलबी दुनिया के बाज़ार का
कौन है खिवैया मेरा हयात ए मझधार का?
कौन है बनाने वाला इस संसार का...
अंतरा - ३
दुनिया के इस मेले में अकेले ही आए हैं
अकेले ही जाना है, कुछ पल के ये साए हैं
ख्वाबों के महलों पे ना तू दुनिया बसा रोहिये पल दो पल की ख़ुशी है!आँख खुली तो क्या है?
ज़िंदगी नाम है सफर और इंतज़ार का
चलते चलो यूँ ही, कोई तो हो साथ इस रफ़्तार का
थक गया हूँ इन राहों में, पर हार न मानूँगा
साथ मिल जाए गर उस परवरदिगार का!
कौन है खिवैया मेरी इस मझधार का?
कौन है बनाने वाला इस संसार का...
अल्फाजों के लहजे को दुरुस्त रखें "
(पाकिस्तानी गायक अत्ताउल्ला खाँ जैसी मिलती जुलती आवाज में और उनके जैसे ही अंदाज़ में इस गीत का
ऑडियो जनरेट करें !
थ्योरी जुबैर की -
शीर्षक: नूर की तलाश (सन्नाटे का सफर)
अवधि: लगभग 90 सेकंड
मूड/टोन: रूहानी, शांत, संगीतमय (धीमी बांसुरी या नेय की धुन और हल्की हवा का स्वर)
दृश्य 1: (0:00 - 0:15)
- दृश्य: एक शांत कमरा। आधी रात का वक्त है। एक दिया टिमटिमा रहा है। जुबैर (एक सादा लिबास पहने, नूरानी चेहरे वाला शख्स) जाड़े की रात में मुसल्ले पर बैठा है। उसके होंठ खामोश हैं, लेकिन आँखें नम हैं और आसमान की तरफ उठी हैं।
- वॉइसओवर (VO): जब दुनिया गहरी नींद में सो रही होती है, तब एक शख्स ऐसा है जिसकी आँखें दुनिया के लिए नहीं, बल्कि अपने रब के दीदार की तड़प में जागती हैं... जुबैर।
दृश्य 2: (0:15 - 0:35)
- दृश्य: मोंटाज शॉट्स—जुबैर का कभी किसी से झूठ न बोलना (चेहरे पर एक सुकून भरी सच्चाई), हर धर्म और जरूरत मंद के दरवाजे पर जाकर उनकी मदद करना। कभी किसी हिंदू बुजुर्ग को सहारा देना, तो कभी किसी भूखे को खाना खिलाना।
- वॉइसओवर (VO): होशोहवाश में कभी जिसके लबों पर झूठ नहीं आया। जो हर मजहब, हर इंसान के दर्द को अपना समझता है। जिसकी सेवा किसी मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि खालिस इंसानियत और रब्ब की रज़ा के लिए है।
दृश्य 3: (0:35 - 0:55)
- दृश्य: जुबैर फिर से अपनी तन्हाई में लौट आता है। वह दोनों हाथ फैलाकर अल्लाह से दुआ कर रहा है—"मौला, मेरे सीने को अपने नूर से भर दे।" कमरे में अचानक एक अलौकिक, सुकून देने वाली रोशनी (VFX/Soft Glow) चारों तरफ बिखरने लगती है।
- वॉइसओवर (VO): और फिर शुरू होती है उस तन्हाई की दास्तान, जहाँ दुनिया की भीड़ खत्म हो जाती है और सिर्फ एक बंदा और उसका परवरदिगार रह जाता है। जब वह तन्हाई में अल्लाह से नूर की भीख मांगता है...
दृश्य 4: (0:55 - 1:25)
- दृश्य: आसमान से बादलों के चीरते हुए एक बारीक, खूबसूरत रहमत और रोशनी की किरणें जुबैर के चारों तरफ उतरती हुई महसूस होती हैं। फरिश्तों के परों की हल्की सी परछाई और कायनात का सन्नाटा इस मंज़र को और रूहानी बना देता है। जुबैर के चेहरे पर एक अजीब सा इत्मीनान छा जाता है।
- वॉइसओवर (VO): ...तो आसमान के दरवाजे खुल जाते हैं। रब के फरिश्ते उतरते हैं और उस सादिक व इबादतपरस्त मोमिन की रूह को नूर से नहला देते हैं। ये वो नूर है जो चमकता नहीं, बल्कि दिलों को रोशन कर देता है।
दृश्य 5: (1:25 - 1:30)
- दृश्य: जुबैर मुस्कुराते हुए सजदे में झुक जाता है। स्क्रीन पर फेंटे हुए शब्दों में सूफी कैलाग्राफी उभरती है— "सच्चाई ही सबसे बड़ी इबादत है।"
- वॉइसओवर (VO): इबादत सिर्फ सजदों का नाम नहीं, सादगी और सच्चाई में जीने का हुनर है।
(संगीत धीमी आवाज़ में जाकर खामोशी में बदल जाता है)
शीर्षक: नूर की तलाश (सन्नाटे का सफर)
अवधि: लगभग 90 सेकंड
मूड/टोन: रूहानी, शांत, संगीतमय (धीमी बांसुरी या नेय की धुन और हल्की हवा का स्वर)
दृश्य 1: (0:00 - 0:15)
- दृश्य: एक शांत कमरा। आधी रात का वक्त है। एक दिया टिमटिमा रहा है। जुबैर (एक सादा लिबास पहने, नूरानी चेहरे वाला शख्स) जाड़े की रात में मुसल्ले पर बैठा है। उसके होंठ खामोश हैं, लेकिन आँखें नम हैं और आसमान की तरफ उठी हैं।
- वॉइसओवर (VO): जब दुनिया गहरी नींद में सो रही होती है, तब एक शख्स ऐसा है जिसकी आँखें दुनिया के लिए नहीं, बल्कि अपने रब के दीदार की तड़प में जागती हैं... जुबैर।
दृश्य 2: (0:15 - 0:35)
- दृश्य: मोंटाज शॉट्स—जुबैर का कभी किसी से झूठ न बोलना (चेहरे पर एक सुकून भरी सच्चाई), हर धर्म और जरूरत मंद के दरवाजे पर जाकर उनकी मदद करना। कभी किसी हिंदू बुजुर्ग को सहारा देना, तो कभी किसी भूखे को खाना खिलाना।
- वॉइसओवर (VO): होशोहवाश में कभी जिसके लबों पर झूठ नहीं आया। जो हर मजहब, हर इंसान के दर्द को अपना समझता है। जिसकी सेवा किसी मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि खालिस इंसानियत और रब्ब की रज़ा के लिए है।
दृश्य 3: (0:35 - 0:55)
- दृश्य: जुबैर फिर से अपनी तन्हाई में लौट आता है। वह दोनों हाथ फैलाकर अल्लाह से दुआ कर रहा है—"मौला, मेरे सीने को अपने नूर से भर दे।" कमरे में अचानक एक अलौकिक, सुकून देने वाली रोशनी (VFX/Soft Glow) चारों तरफ बिखरने लगती है।
- वॉइसओवर (VO): और फिर शुरू होती है उस तन्हाई की दास्तान, जहाँ दुनिया की भीड़ खत्म हो जाती है और सिर्फ एक बंदा और उसका परवरदिगार रह जाता है। जब वह तन्हाई में अल्लाह से नूर की भीख मांगता है...
दृश्य 4: (0:55 - 1:25)
- दृश्य: आसमान से बादलों के चीरते हुए एक बारीक, खूबसूरत रहमत और रोशनी की किरणें जुबैर के चारों तरफ उतरती हुई महसूस होती हैं। फरिश्तों के परों की हल्की सी परछाई और कायनात का सन्नाटा इस मंज़र को और रूहानी बना देता है। जुबैर के चेहरे पर एक अजीब सा इत्मीनान छा जाता है।
- वॉइसओवर (VO): ...तो आसमान के दरवाजे खुल जाते हैं। रब के फरिश्ते उतरते हैं और उस सादिक व इबादतपरस्त मोमिन की रूह को नूर से नहला देते हैं। ये वो नूर है जो चमकता नहीं, बल्कि दिलों को रोशन कर देता है।
दृश्य 5: (1:25 - 1:30)
- दृश्य: जुबैर मुस्कुराते हुए सजदे में झुक जाता है। स्क्रीन पर फेंटे हुए शब्दों में सूफी कैलाग्राफी उभरती है— "सच्चाई ही सबसे बड़ी इबादत है।"
- वॉइसओवर (VO): इबादत सिर्फ सजदों का नाम नहीं, सादगी और सच्चाई में जीने का हुनर है।
(संगीत धीमी आवाज़ में जाकर खामोशी में बदल जाता है)
सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं। विचलित नहीं होते जो मुशीवतों में मुस्कराते है। आबाज में कोशिश जो रुहानी जन्म गाते हैं। सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं।
कव्वाली: जुबैर की थ्योरी
स्थाई (मुखड़ा)
अपने उशूलो से जो करता नहीं समझौता! मतलब परस्तों को नहीं मिलता है उसका न्यौता !
अन्तरा-(१) हमारी खुशनसीबी कि हम जुबैर से मिले ! और जब भी मिले उनसे मक्दमे- खैर से मिले!! आज तक वे अपनों का फ़र्ज़ निभाते हैं।
सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं। विचलित नहीं होते जो मुशीवतों में मुस्कराते है। आबाज में कोशिश जो रुहानी नज्म गाते हैं। सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं।
अंतरा 1
दुनिया के बाज़ार में हर शख्स उलझा हुआ है।, ख्वाहिशों के जाल में दिल उसका फँसा हुआ है।
मगर इस भीड़ में एक शख्स का ,रास्ता सबसे जुदा हैं,
अपनी नियामतों का पाबन्द, रोहि उसका रहवर ख़ुदा है।
किसी को मुशीबतों से बचाने को, लोग आज घबराते हैं।
सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं। विचलित नहीं होते जो मुशीवतों में मुस्कराते है। आबाज में कशिश जो रुहानी नज्म गाते हैं। सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं।
अन्तरा-३
सोच की गहराई का देखो तो ये कौन सा नुक्ता है?सच्चाई की राह पे चलता, वह कभी नहीं रुकता है।
पीर खाने की सर जमीं पर जुबैर की विलादत है।! गिरे हुऐ लोगों उठाना उस बन्दे की ये आदत है।
जुबैर का न बैर किसी से वह मुफलिसी की हिमायत है।
इबादत है जीने की शरीयत, उसकी हर श्वास आयत है।
आज भी बालिदों को वे सज्दे से पेश आते है।
सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं। विचलित नहीं होते जो मुशीवतों में मुस्कराते है। आबाज में कोशिश जो रुहानी नज्म गाते हैं। सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं।
अंतरा
इंसान बहुत से रोहि देखे तुमने - मगर उस जैसा इन्सान न मिला। तुम परखते रहे लोगों को, चलता रहा ये सिलसिला। इन्सानियत के वास्ते लोग मिलने आते हैं ।
सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं। विचलित नहीं होते जो मुशीवतों में मुस्कराते है। आबाज में कोशिश जो रुहानी नज्म गाते हैं। सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं।
कव्वाली: जुबैर, अलीगढ़ की शान
अंतरा 1
ये ज़मीं है अलीगढ़ की, यहाँ उल्फ़त पलती है,
हर एक कली पे भंबरो देखो, जब वो मचलती है।इस शहर के पीरखाने इक नूर निराला देखा,
रंग-ए-इबवादत में डूबा हुआ एक रिशाला देखा।
जुबैर जैसा इन्सान मुद्युदतों में पैंदा होता है,
खुदा की रहमतों को जो दिल में संजोता है।
ऐसे लोग धरती पर खुशूसियत लाते हैं।
सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं। विचलित नहीं होते जो मुशीवतों में मुस्कराते है। आबाज में कोशिश जो रुहानी नज्म गाते हैं। सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं।
अंतरा ४-
इन्सान दुर्लभ हो गये हैं अब इस जमाने में। उम्र बीत जाती हैं लोगों की रूढियाँ निभाने में !
मजहब के झगड़े देखे हमने हर ठिकाने में।इन्सानियत मजहब हैं जुबैर की सच्चे मायने में। इस ईश्वर के बन्दे के हम अख़लाक गिनाते हैं।
सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं। विचलित नहीं होते जो मुशीवतों में मुस्कराते है। आबाज में कोशिश जो रुहानी नज्म गाते हैं। सच्ची दास्तान हम भाई जुबैर की सुनाते हैं।
मंगलवार, 8 सितंबर 2026
दो अन्तरा-
यादव गीत -
चमत्कार या यथार्थ-
यह विचार वर्तमान धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश में धर्म, अंधविश्वास और संस्थागत बाबाओं की कार्यशैली पर एक गहरी तार्किक टिप्पणी है। प्रस्तुत सिद्धांत को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक दृष्टिकोण से इस प्रकार समझा जा सकता है:
कालखंड और साक्ष्य का फासला (पुरातनता बनाम वर्तमान)
अतीत की घटनाओं और चमत्कारों पर सवाल उठाना कठिन होता है क्योंकि समय के साथ उनके प्रत्यक्षदर्शी या तो समाप्त हो चुके होते हैं या फिर उनका इतिहास धार्मिक मान्यताओं व लोककथाओं में ढल चुका होता है। इसके विपरीत, आधुनिक युग में सूचना तकनीक, सोशल मीडिया, कैमरे और वैज्ञानिक सोच के कारण किसी भी दावे की तुरंत सत्यता जांची जा सकती है। यही कारण है कि तथाकथित चमत्कार हमेशा इतिहास के धुंधलके में ही सुरक्षित पाए जाते हैं, जबकि वर्तमान में केवल प्रवचन या मनोवैज्ञानिक सांत्वना ही मिलती है, कोई प्रत्यक्ष भौतिक चमत्कार नहीं।
चमत्कारों की दिशा और उपयोगिता
पारंपरिक कथाओं में मिलने वाले चमत्कार अधिकतर शक्ति प्रदर्शन (जैसे हवा में वस्तुएं प्रकट करना, रोग ठीक करना या प्रकृति को प्रभावित करना) तक सीमित होते हैं। इनसे किसी बड़े सामाजिक संकट, महामारी, गरीबी या अन्याय का स्थायी समाधान नहीं होता। ये दावे मानवीय जिज्ञासा और आश्चर्य को जागृत करके किसी विशेष व्यक्ति या संस्था के प्रभाव को समाज में स्थापित करने का माध्यम मात्र बन जाते हैं।
भक्ति का विस्थापन (ईश्वर से व्यक्ति की ओर)
इस सिद्धांत का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि इसमें परमपिता या निराकार ईश्वर की जगह एक मनुष्य (बाबा) केंद्र में आ जाता है। अनुयायी ईश्वर की आराधना की बजाय बाबा के नाम का लॉकेट, तस्वीर और उनके बताए नियमों का पालन करने लगते हैं। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे धार्मिक चेतना को एक व्यक्ति-पूजा (Cult of Personality) में बदल देती है, जहाँ उस व्यक्ति की वाणी ही अंतिम सत्य बन जाती है।
संस्थागत स्वार्थ और अंधविश्वास का अर्थशास्त्र
बाबाओं के नाम पर संचालित होने वाले आश्रम, मठ और मंदिर केवल आध्यात्मिक केंद्र नहीं होते, बल्कि वे एक सुव्यवस्थित अर्थशास्त्र और शक्ति का ढांचा होते हैं। इन संस्थानों को जीवित रखने के लिए चमत्कारों की कथाओं का निरंतर पुनरुत्पादन आवश्यक होता है, क्योंकि यही कथाएं श्रद्धालुओं की आस्था को आर्थिक सहयोग और अटूट निष्ठा में बदलती हैं।
यह विश्लेषण तार्किक यथार्थवाद पर आधारित है, जो यह स्पष्ट करता है कि कैसे आस्था का दोहन करके श्रद्धा को व्यक्तिगत प्रभाव और संस्थागत लाभ में परिवर्तित किया जाता है।
ज़माने की इस भीड़ में अब कौन चमत्कार दिखाए,
जो सच पूछे तो कैमरे और मोबाइल सच बतलाएं!
बाबा जी के पुराने किस्से सदियों पुराने अफ़साने,
आज के दौर में सच पूछो तो कोई सबूत न पाए!
अंतरा 1 (कालखंड और साक्ष्य का फासला)
कल की बातें धुंधलके में, इतिहास की चादर ओढ़े,
आज के ज़माने में सच के पहरे, हर कोई शीशा जोड़े।
कैमरे की आँख से बचके, कोई करिश्मा कर के दिखाओ,
पुराने किस्से छोड़ो यार, वर्तमान में सच ले आओ!
पुराने किस्से... वर्तमान में सच ले आओ!
अंतरा 2 (चमत्कारों की दिशा और उपयोगिता)
हवा में चीज़ें उड़ाईं, पर गरीबी नहीं मिटाई,
महामारी के इस दौर में, किसी ने दवा न पहुँचाई।
सिर्फ अपनी शक्ति दिखाई, और अपनी धौंस जमाई,
आम जन के किसी काम न आई, ये कैसी बाबाई!
आम जन के... ये कैसी बाबाई!
अंतरा 3 (भक्ति का विस्थापन)
खुदा को भूल बैठे लोग, अब तस्वीर गले में लटकाएं,
निराकार को छोड़कर बाबा के चरणों में शीश झुकाएं।
इश्वर से बड़ी कुर्सी पर, इंसान को जा बिठाया,
भक्ति का बाज़ार सजाकर, अजब तमाशा दिखाया!
अजब तमाशा... अजब तमाशा दिखाया!
समापन (संस्थागत स्वार्थ और अर्थशास्त्र)
आश्रम और मठों की दुनिया, अर्थशास्त्र का खेल है भाई,
आस्था के इस व्यापार में, श्रद्धा की बोली लगाई।
तर्क की कसौटी पर परखो, तो सब सच सामने आ जाएगा,
बिन तार्किक यथार्थ के यहाँ, कोई अंधविश्वास न टिक पाएगा!