शनिवार, 24 जनवरी 2026

आज के लोग एक अविमुक्तेश्वरानंद के क्रोधी स्वभाव से परेशान हो चुके हैं मैं सोचती हूँ ये भारतवासी यदि पौराणिक समय मे होते तो बात बात पर श्राप देने वाले ऋषियों से कैसे डील करते जिनमे ऋषि दुर्वासा, महर्षि परशुराम, भृगु और विश्वामित्र शामिल थे जिनके कोप से बड़े बड़े राजाओं की हालत खराब हो जाती थी।

हर एक संत का स्वभाव अलग होता है विचारधारा अलग होती है इसका मतलब ये नहीं कि उसकी प्रमाणिकता को कटघरे में लाकर रख दो। UP के डेप्युटी CM ने क्षमा सहित अविमुक्तेश्वरानंद को स्नान करने का आग्रह किया ये दर्शाता है सत्ता किस तरह अब डेमेज कंट्रोल करने का प्रयास कर रही है।

खैर.....
रामभद्राचार्य को विकलांग होने पर सन्यासी होने का अधिकार नहीं कहने पर समर्थक और भड़क गए तो अविमुक्तेश्वरानंद ने कुछ अलग नहीं कह दिया वही कहा है को शास्त्रों में वर्णित है...

शास्त्रों ने कलौ संन्यासवर्जित: का वर्णन है। पर अब बिना वर्णाश्रम-शुद्धता पुष्टि किये, गुण-लिंग-उद्देश्य का विचार किये हर किसी को सन्यासी बनना है और यदि बाद में अकूत सम्पत्ति और जनबल हो गया तो फिर पीठाधीश्वर, जगद्गुरु, मठाधीश और न जाने क्या क्या उपाधियां भी मिलने लगती हैं जैसे सतुआ बाबा और बाकी के रोल्ड गोल्ड बाबा।

आजकल एक शब्द बड़ा चलन में है दिव्यांग पर उसपर फिर किसी लेख में बात करेंगे....!

पूर्वजन्म के किये गए पाप से ही इस जन्म में विकलांगता होती है, ऐसा सनातन धर्म में शास्त्र प्रमाण हैं। वैसे तो इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, क्योंकि अलग अलग प्रकार की विकलांगता का कारण अलग अलग कर्म हैं। यदि हम कर्मफल को न मानें, तो भला जन्मजात असाध्य रोगों से ग्रस्त अथवा अंगहीनता से व्यथित देह वाले बच्चे ने कौन सा पाप किया था, क्योंकि इस जन्म के कर्म तो अब तक प्रारम्भ भी नहीं हुए है।

और यदि प्रारब्ध को मानते ही नहीं तो किसी को सन्यासी बनाने न बनाने पर कुतर्क करना ही क्यों है फिर। धर्म को माने तो धर्म की बातों को भी मानिए और धर्म को नहीं मानते हो तो कर्मफलों की व्याख्या को भी ठुकरा दीजिये सहूलियत के हिसाब से अपने स्टैंड बदलते रहना तो कोई तर्क की बात नहीं।

हां तो बात करते हैं विकलांगता की....

दीर्घजीवी च क्षीणायुः सुखी दुःखी च निश्चितम्।
अन्धादयश्चाङ्गहीनाः कुत्सितेन च कर्मणा॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृतिखण्ड, २६-०२)

अर्थात- कौन लम्बी आयु वाला होगा और किसकी अकाल मृत्यु होगी, कौन सुखी या दुःखी होगा, ये सब पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर निश्चित होता है।

अन्धो दीपापहारी स्यात्
अन्धो भवति गोघ्नस्तु
(विष्णुधर्मोत्तर पुराण, खण्ड २, अध्याय १२१, ०९)

यानी- अंधकार करने के उद्देश्य से दीपक बुझाने वाला, एवं गोहत्या करने वाला अगले जन्म में अन्धा होता है।

और धर्म शास्त्रों की माने तो रोग, दरिद्रता, अज्ञान, कष्ट और विकलांगता में कोई दिव्यता नहीं होती बल्कि ये
व्यक्ति के पूर्वजन्म के पापकर्म का फल है। 
हां ये बात और है कि सरकार ने तुष्टिकरण के हिसाब से विकलांग को दिव्यांग की उपाधि दे दी है पर शब्द बदल देने से सच नहीं बदल जाता। 

अब कोई कहेगा सन्त सूरदासजी भी तो अंधे थे और अष्टावक्र तो शरीर के 8 हिस्सों से विकलांग थे,
तो किसी के पूर्व जन्म बुरे हैं इसका अर्थ ये नहीं कि 
इस जन्म में अच्छे कर्म करने का अधिकार नहीं। 
पर ईश्वर की भक्ति करने और दंड धारक बन खुद को शाश्त्रार्थ सन्यासी घोषित करने में अंतर है।

जैसे देशभक्ति करना हर एक नागरिक का कर्तव्य है पर देश की सेवा करने के लिए सेना में भर्ती होने के कुछ निश्चित मानक। तो सूरदास जी भक्त थे, विरक्त साधु और परम श्रेष्ठ भक्त थे न कि सन्यासी। इसी तरह अष्टावक्र ने भी कभी दंड नहीं उठाया।

संन्यासोपनिषत्, नारदपरिव्राजकोपनिषत् में भी यही बातें वर्णित है शारीरिक अक्षमता को लेकर।

श्रीमद्भगवद्गीता कहती है कि काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
यानी बुद्धिमान् जन उसी को संन्यास कहते हैं, जिसमें काम्य कर्म का न्यास हो जाता है और उस स्थिति में सभी कर्म इन्द्रियों के द्वारा स्वभावतः ही संचालित होते हैं जिसमें जीव की कोई उत्प्रेरित फलाकांक्षा नहीं होती। पर जो इंद्रियां और अंग पहले से अक्षम हैं उनमें काम्य कर्म का नाश कैसे हो....??

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