🔴 करकचतुर्थीव्रतम् 🔴
( करवा चौथ ) (वामन पुराणोक्त)
➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ कार्तिककृष्णचतुर्थ्यां
(दक्षिणेदेशे आश्विनकृष्णचतुर्थ्यां )
करक चतुर्थी- व्रतम् ।
अत्र स्त्रीणामेवाधिकारः ।
प्रथमतः आचम्य मासपक्षाद्युल्लिख्य मम सौभाग्यपुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्रीप्राप्तये करकचतुर्थीव्रतं करिष्ये इति संकल्प्य वटं विलिख्य तदधस्ताच्छिवं गणपतिं षण्मुखयुक्तां गौरीं च लिखित्वा षोडशोपचारैः पूजयेत् ।
🔴 पूजामन्त्र-
नमः शिवाय शर्वाण्यै सौभाग्यं सन्तति शुभाम् ।।
प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे । ।
इत्यनेन गौर्याः पूजनम् , ततो नमोन्तनाममन्त्रेण शिवषण्मुखगणपतीनां पूजा कार्या । ततः सपक्वान्नाक्षत संयुक्तान् दशकरकान् ब्राह्मणेभ्यो दद्यात् । ततः पिष्टकननैवेद्यं भोग्यं सर्व निवेदयेत् । ततश्चन्द्रोदयोत्तरं चन्द्रायार्घ्य दद्यात् ।।
🔴। अथ कथा-
मान्धातोवाच । अर्जुनं तु गते तप्तुमिन्द्रकीलगिरि प्रति ।।
विषण्णमानसा सुभ्रू द्रौपदी सचिन्तयत् ।। १ ।।
अहो किरीटिना कर्म समारब्धं सुदुष्करम् ।।
बहवो विघ्नकर्तारो मार्गे वै परिपन्थिनः ।। २ ।।
चिन्तयित्वेति सा देवी कृष्णा कृष्णं जगद्गुरुम् ।।
भर्तु । प्रियं चिकीर्षन्ती सापृच्छद्विघ्नवारणम्।। ३।।
द्रौपद्युवाच
कथयस्व जगन्नाथ व्रतमेकं सुदुर्लभम् ।।
यत्कृत्वा सर्वाविघ्नानि विलयं यान्ति तद्वद ।। ४ ।।
श्रीकृष्ण उवाच
एवमेव महाभागे शम्भुः पृष्टः किलोमया ।।
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा प्राह देवो महेश्वरः ।। ५ ।।
शृणु देवि वरारोहे वक्ष्यामि त्वां महेश्वरि ।।
सर्वविघ्न- हरेत्याहुः करकाख्यां चतुथिकाम् ।। ६।।
पार्वत्युवाच
भगवन् कीदृशी प्रोक्ता चतुर्थी करकाभिधा ।।
विधानं कीदृशं प्रोक्तं केनेयं च पुरा कृता ॥ ७ ॥
ईश्वर उवाच
शक्रप्रस्थपुरे रम्ये विद्वज्जनसमाकुले ।।
स्वर्णरौप्यसमाकीर्णे रत्नप्रका- रशोभने ।। ८ ।।
दिव्यनारीजनालोकवशीकृतगत्रये ।।
वेदध्वनिसमायुक्ते स्वर्गा दपि मनोहरे ।। ९ ।।
वेदशर्मा द्विजस्तत्रावसद्देशे विदां वरः ।।
पत्नी तस्यैव विप्रस्य नाम्ना लीलावती शुभा ।। १० ।।
तस्यां स जनयामास पुत्रान् सप्तामितौजसः ।।
कन्यां वीरावतीनाम्नीं सर्वलक्षणसंयुताम् ।। ११ ।।
नीलात्पलाभनयनां पूर्णेन्दु सदृशाननाम्।।
तां तु काले शुभदिने विधिवच्च द्विजोत्तमः।।१२ ।।
ददौ वेदाङ्ग- विदुषे विप्राय विधिपूर्वकम् ।।
अत्रान्तरे भ्रातृदारैश्चक्रे गौर्या व्रतं चसा ।। १३ ।
चतुर्थ्यां कार्तिकस्याथ कृष्णायां तु विशेषतः ।।
स्नात्वा सायन्तने काले सर्वास्तः भक्तिभावतः ।। १४ ।।
विलिख्य वटवृक्षं च गौरीं तस्य तले लिखन् ।।
शिवेन विघ्ननाथेन षण्मुखेन समन्विताम् ।।१५ ।।
गन्धपुष्पाक्षतैर्गोरीं मन्त्रेणानेन पूजयन्' ।।
नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं सन्तृत शुभाम् ।। १६।।
प्रयच्छ भक्ति- युक्तानां नारीणां हरवल्लभे ।।
तस्याः पाश्र्व महादेवं विघ्ननाथं षडाननम् ।।१७।।
पुनः पुष्पाक्षतैर्धूपैरर्चयंश्च पृथक्पृथक् ।।
पक्वान्नाक्षतसंपन्नान् सदीपान् करकान् दश ।।१८।।
तथा पिष्टकनैवेद्यं भोज्यं सर्वं न्येवेदयन् ।।
प्रतीक्षन्त्यः स्त्रियः सर्वाश्चन्द्रमर्थ्यपराः स्थिताः ।। १९ ।।
सा बाला बिकला दीना क्षुत्तुड्यां परिपीडिता ।।
निपपात महीपृष्ठे रुरुदुर्बान्धवास्तदा ।। २० ।।
समाश्वास्य च वा तैस्तां मुखमभ्युक्ष्य वारिणा ।।
तद्धाता चिन्तयित्वैवमारुरोह महावटम् ।। २१ ।।
हस्ते चोल्कां समादाय ज्वलन्तीं स्नेहपीडितः ।।
भगिन्यै दर्शयामास चंद्रं व्याजोदितं तदा ।। २२ ।।
तं दृष्ट्वा चातिमुत्सृज्य बुभुजे भावसंयुता ।।
चन्द्रोदयं तमाज्ञाय अर्घ्य दत्त्वा विधानतः ।। २३।।
तद्दोषेण मृतस्त्वस्याः पतिधर्मश्च दूषितः ।।
पति तथाविधं दृष्ट्वा शिवमभ्यर्च्य सा पुनः ।। २४।।
व्रतं निरशनं चक्रे यावत्संवत्सरो गतः ।।
चक्रुः संवत्सरेऽतीते व्रतं तद्धातृयोषितः ।। २५ ।।
पूर्वोक्तेन विधानेन सापि चक्रे शुभानना ।।
तदा तत्र शची देवी कन्याभिः परिवारिता ।।२६ ।।
एतदेव व्रतं कर्तुमागता स्वर्गलोकतः ।।
वीरवत्यास्तदाभ्याशमगमद्भाग्यतः स्वयम् ।।२७।
दृष्ट्वा तां मानुषीं देवीं पप्रच्छ सकलं च सा ।।
वीरावती तदा पृष्टा प्रोवाच विनमान्विता ।। २८।।
अहं पतिगृहं प्राप्ता मृतोऽयं मे पतिः प्रभुः ।।
न जाने कर्मणः कस्य फलं प्राप्तं मयाधुना ।।२९।।
मम भाग्यवशाद्देवि आगतासि महेश्वरि ।।
अनुगृह्णीष्व मां मातर्जीवयाशु पति मम ।। ३० ।।
इन्द्राण्युवाच ।।
त्वया पितृगृहे पूर्व कुर्वत्या करकव्रतम् ।।
वृथैवार्घ्यस्तदा दत्तो विना चन्द्रोदयं शुभे ।। ३१।।
तेन ते व्रतदोषेण स्वामी लोकान्तरं गतः ।।
इदानीं कुरु यत्नेन करक- व्रतमुत्तमम् ।। ३२ ।।
पति ते जीवयिष्यामि व्रतस्यास्य प्रभावतः ।।
कृष्ण उवाच
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा व्रतं चक्रे विधानतः ॥ ३३ ।।
प्रसन्ना साऽभवद्देवी शक्रस्य प्राणवल्लभा ।।
तया व्रते कृते देवी जलेनाभ्युक्ष्य तत्पतिम् ।३४।।
जीवयामास चेन्द्राणी देववच्च बभूव सा ।।
ततश्चागाद्गृहं स्वीयं रेमे सा पतिना सह ।। ३५ ।।
धनं धान्यं सुपुत्रांश्च दीर्घमायुः स लब्धवान् ।।
तस्मात्त्वयापि यत्नेन व्रतमेतद्विधीयताम् ।। ३६।।
सूत उवाच
श्रीकृष्णस्य वचः श्रुत्वा चकार द्रौपदी व्रतम् ।।
तव्रतस्य प्रभावेण जित्वा तान् कौरवान्रणे ।३७ ।।
लेभिरे राज्यमतुलं पाण्डवा दुःखनाशनम् ।।
याः करिष्यन्ति सुभगा व्रतमेतन्निशागमे ।। ३८ ।।
तासां पुत्रा धनं धान्यं सौभाग्यं चातुलं यशः ।
करकं क्षीरसंपूर्ण तोयपूर्णमथापि वा ।। ३९ ।।
ददामि रत्नसंयुक्तं चिरं जीवतु मे पतिः ।।
इति मन्त्रेण करकान् प्रदद्या- द्विजसत्तमे ।। ४० ।।
सुवासिनीभ्यो दद्याश्च आदद्यात्ताभ्य एव च ।।
एवं व्रतं याकुरुते नारी सौभाग्यकाम्यया ।।
सौभाग्यं पुत्रपौत्रादि लभतेसुस्थिरां श्रियम् ।। ४१।।
इति वामनपुराणे करकाभिधचतुर्थीव्रतं सम्पूर्णम्।।
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🔴 हिन्दी रूपान्तरं 🔴
कातिक कृष्ण चतुर्थी के दिन ( दक्षिणदेश में प्रसिद्ध आश्विनकृष्णा चतुर्थी के दिन) करक चतुर्थी व्रत पालन होता हैं । इस व्रतको करनेका केवल स्त्रियोंकाही अधिकार है; क्योंकि व्रत करनेवाली स्त्रियों की ही फलश्रुति मिलती है। प्रथम आचमन करे फिर "ओम् तत्सत्" इत्यादि रोतिसे देश कालका स्मरण करे, फिर "मम" इत्यादि वाक्य द्वारा संकल्प करे कि, में अपने सौभाग्य एवं पुत्र पौत्रादि तथा निश्चल सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये करकचतुर्थीके व्रतको करूंगा। उस प्रकार संकल्प करनेके पीछे एक बडको लिखे उस, बडके मूलभागमें महादेवजी, गणेशजी, और स्वामिकार्तिकसहित पार्वतीजीका आकार लिखे, (फिर प्राणप्रतिष्ठा करके) षोडशोपचारसे पूजन करे।
🥀पूजाके मंत्र
नमः शिवाय शर्वाण्यै सौभाग्यं सन्तति शुभाम् ।।
प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे । ।
( "शर्वाणी शिवा" ....... के लिये प्रणाम है। हे महेश्वर भगवान्की प्यारी! आप अपनी भक्त स्त्रियोंको सौभाग्य और शुभसन्तान प्रदान करें, )
इस मन्त्रसे गौरी की पूजा करके पीछे, नमः जिनके अन्तमें रहता है ऐसे नाम मन्त्रोंसे शिवजी स्वामिकातिक तथा गणपति देवकी पूजा करनी चाहिए। इसके पीछे पक्वान्न और अक्षतों के साथ दश करवे ब्राह्मणोंको देन चाहिए। पीछे पिष्टकका नैवेद्य और भोज्य सब निवेदन कर दे। पीछे चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमाको अर्थ देना चाहिए ।।
🔴 व्रत कथा
मान्धाता कहने लगे कि, जब अर्जुन इन्द्रकील पर्वतपर तप करने चला गया उस समय सुभ्रु द्रौपदीका चित्त कुम्हिला गया और चिन्ता करने लगी ।। १ ।। कि अर्जुनने बडा कठिन काम करना प्रारंभकर दियाहै, यह निश्चय है कि मार्गमें विघ्न करनेवाले बहुतसे वैरी हूं ।। २ ।। कृष्णाकी यह इच्छा थी कि, पतिदेव के काममें कोई विघ्न न आवे इसी चिन्ताको करके जगद्गुरु श्रीकृष्ण भगवान्से पूछा ।। ३ ।। द्रौपदी बोली हे जगन्नाथ ! आप एक अत्यन्त गोप्य व्रतको वतावें, जिसके करनेसे सब ओरके विघ्न दूर दल जायें ।। ४ ।। श्रीकृष्ण बोले कि, हे महाभागे ! जैसा आपने मुझसे पूछा है, उसी प्रकार पार्वतोजीने महा- देवजीसे पूछा था उनके प्रश्नको सुनकर महादेवीजीने कहा कि ।। ५ ।। हे विरारोहे ! हे महेश्वरि ! तुम सुनो, मैं तुम्हे सब विघ्नहारिणी करक चतुर्थीका व्रत कहता हूं ।। ६ ।। पार्वतीने पूछा कि हे भगवन् ! करक चतुर्थीका माहात्म्य और इस व्रतको करने की क्या विधि है ? आप कहिये यह व्रत पहिले किसने किया था इसको भी कहिए ।। ७ ।। महादेवजी बोले कि, जहां बहुतसे विद्वान् रहते हैं, जिस जगह बहुतसा चांदी सोना एवम् रत्नोंको शहरपनाह है ।। ८ ।। जो सुंदर स्त्री पुरुषोंके दर्शनसे तोनों भुवनोंको वशीभूत करलेता है, जहां निरन्तर वेदध्वनि होती रहती है ऐसे स्वर्गसे स्वर्गसे भी रमणीय इन्द्रप्रस्थपुरमें ।। ९ ।। वेदशर्मा नामक विद्वान ब्राह्मण निवास करता था, उसकी स्त्रीका नाम लीलावती था वो अच्छी थी ।।१० ।। उस वेदशमसि लीलावतीमें सात परमतेजस्वी पुत्र और एक सर्व लक्षण सुलक्षण वोरावती नामक कन्या उत्पन्न हुई ।। ११ ।। फिर वह ब्राह्मण अपनी नीलकमलसदृश नेत्रवाली पूर्णचन्द्रमाके समान मुख, बाली उस बीरावती कन्याको विवाह योग्य शुभ समयमें ।। १२ ।। वेदवेदाङ्ग (शिक्षाव्याकरणादि) शास्त्रज्ञ उत्तम ब्राह्मणके लिए विधिपूर्वक बानकर दिया, उसीसमय वीरावतीने अपनी भाभियोंके साथ गौरीवत किया ।।१३ ।। फिर जब कातिक बदि चतुर्थी आई उस समय वीरावती और उसकी भाभी सब मिलकर बड़े प्रेमसे सन्ध्याके समय ।। १४ ।। बटके वृक्षको लिखकर उसके मूलमें महेश्वर, गणेश एवं कार्तिकेयके साथ गौरीको लिखके ।। १५ ।। गन्ध, पुष्प और अक्षतोंसे इस गौरी मन्त्रको बोलतों हुई पूजने लगीं कि शर्वाणी शिवाके लिए नमस्कार है, सौभाग्य और अच्छी सन्तति ॥१६ उन स्त्रियोंको दे जो, हे हरकीप्यारी! तेरी भक्तिवाली हो, उसके पार्श्वमें स्थित महादेव, गणेश और स्वामिकार्तिकेयको ।॥१७॥ फिर, धूप, दीप और पुष्प अक्षतोंसे जुवा जुदा पूजन कर पीछे पक्कान अक्षत और दीपकों सहितवश करुए ।। १८ ।। तया पिष्ट- शका नैवेद्य एवम् सब तरहका भोज्य, चन्द्रमाको अर्थ देने की प्रतीक्षामें बैठी हुई सब स्त्रियोंने निवेदन कर विया ।। १९ ।। वो बालिकायी भूल प्याससे पीडित थी इस कारण दीन एवम् विकल होकर भूमिपर गिर पडी, उस समय उसके बान्धवगण रोने लगे ।। २० ।। कोई उसको हवा करने लगा, कोई मुलपर पानी छिडकने लगा, उसका भाई कुछ शोच विचारकर एक बड़े भारी पेडपर चढ गया ।। २१ ।। बहिन के प्रेममें पीडित या हाथमें एक जलती हुई मसाल ले रखी थी उस जलती मसाल को ही उसने चन्द्र बताकर दिखा दिया ।। २२ ॥ उसने उसे चांद समझ, दुख छोड, विधिपूर्वक अर्घदेकर भावके साथ भोजनकिया ।। २३ ।। इसी दोषसेउसका पति मर गया, धर्म दूषित हुआ। पतिको मरा देख शिवका पूजन किया ।। २४ ।। फिर उसने एक सालतक निराहार व्रत किया, पर उसकी भाभियोंने संवत्सरके बीत जानेपर वो व्रत किया ।। २५ ।। पहिले कहे हुए विधानसे शोभन मुखवाली वीरावतीने भी व्रत किया, उस समय कन्याओंसे घिरी हुयी शची देवी ।। २६ ॥ इसी व्रतको करनेके लिए स्वर्ग लोकसे चली आई और बीरावतीके भाग्यसे उसके पास अपने आप पहुंच गई ।। २७ ।। शची देवीने उस मानुषीको देखकर उससे सब बातें पूछी, एवम् बीरावतीने नम्रताके साथ सब बातेंबतादी ।। २८ ।। हे देवेश्वरि ! में विवाहके पीछे जब अपने पतिके घर पहुंची तभी मेरा पति मरगया, न जाने मंने ऐसा कौन उग्र पाप किया है, जिसका यह फल मिल रहा है ।। २९ ।। पर फिर भीआज मेरे किसी पुण्यका उदय हुआ है, जिससे हे महेश्वरि! आप यहां पधारी है, आपसे यही प्रार्थना है कि, आप मेरे पतिको शीघ्र जीवित करने की कृपा करें ।। ३० ।। यह सुन इन्द्राणी बोली कि, हे वीरावति ! तुमने अपने पिताके घरपर करकचतुर्थीका व्रत किया था, पर वास्तविक चन्द्रोदयके हुए बिनाही अर्घ देकर भोजन कर लिया था ।। ३१ ।। इस प्रकार अज्ञानसे व्रत भङ्ग करनेपर यत् किञ्चिदपराधके कारण तुम्हारा पति मरगया है, इस कारण आप अपने पतिके पुनर्जीवनके लिए विधिपूर्वक उसी करकचतुर्थीका व्रत करिए ।। ३२ ।। में उस व्रतके ही पुण्य प्रभावसे तुम्हारे पतिको जीवित करूँगी। श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि, हे द्रौपदी ! इन्द्राणीके वचन सुनकर उस बीरावतीने विधिपूर्वक करकचतुर्थीका व्रत किया ।। ३३ ।। उसके व्रतको पूरा हो जानेपर इन्द्राणीभी अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार प्रसन्नता प्रकट करतीहुई एक चुलू जल लेकरवीरावतीके पतिकी मरण- भूमिपर छिडककर उसके पतिको ।। ३४ ।। जीवीत करदिया, वो पति देवताओंके समान हो गया। वीरावती अपने घरपर आकर अपने पतिके साथ क्रीडा करने लगी ।। ३५ ।। वो धन, धान्य सुन्दर पुत्र और दीर्घ आयु पा गया । इससे तुमभी अच्छी तरह इस व्रतको करो ।। ३६ ।। सूतजी शौनकादिक मुनियोंसे कहते हैं कि, इस प्रकार श्रीकृष्ण चन्द्र भगवान्के वचनोंको सुनकर द्रौपदीने करक चतुर्थीके व्रतको किया, उसी व्रतके प्रभावसे संग्राममें कौरवोंको पराजित करके ।। ३७ ।। उसके पति पाण्डव सब दुःखोंको मिटानेवाली अतुल राज्य संपत्तिको पा गये । और जो सुभगास्त्रियाँ इस व्रतको संध्याकालमें करेंगी और रात्रिको चन्द्रोदयमें अध्यं देकर भोजन करेंगी ।। ३८ ।। उनस्त्रियोंको पुत्र, घन, धान्य, सौभाग्य और अतुलयशको प्राप्ति होगी । दुग्ध या जलसे भरे हुए रत्नसमेत करवे ।। ३९ ।। में दान करती हूं, इससे मेरा पति चिरंजीवी हो, इस प्रकार कहकर उनको योग्य ब्राह्मणके लिये देना चाहिये, और ।। ४० ।। इस व्रतमें सुहागिन स्त्रियोंके लियेही देना चाहिये, सुहागिन स्त्रियोंसे ही लेना चाहिये। इस प्रकार जो स्त्री अपने सौभाग्यसुख सम्पत्ति के लिये इस व्रतको करती है उसको सौभाग्य पुत्र पौत्रावि तया निश्चलसम्पत्ति मिलती है ।। ४१ ।।
यह वामन पुराणका करक चतुर्थीका व्रत पूरा हुआ ।।
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