गुरुवार, 24 सितंबर 2026

भर द्वाभ्यां जायते इति भारद्वाजः

भर द्वाभ्यां जायते इति भारद्वाजः' — सनातन परंपरा और संस्कृत व्याकरण के अनुसार भरद्वाज शब्द की उत्पत्ति का यह सबसे प्रसिद्ध और गहरा आधार है।
इस पंक्ति का सरल शब्दों में अर्थ है: "जो दो पिताओं से उत्पन्न हुआ हो वह भरद्वाज है।"
ऋषि भरद्वाज की उत्पत्ति और इस पंक्ति के पीछे पौराणिक कथा इस प्रकार है:
पौराणिक संदर्भ और उत्पत्ति की कथा
महान ऋषि भारद्वाज की उत्पत्ति की कथा श्रीमद्भागवत महापुराण और महाभारत में मिलती है। इसके अनुसार:
  • माता-पिता: भारद्वाज के जैविक पिता देवगुरु बृहस्पति थे और माता ममता (बृहस्पति के बड़े भाई उत्थ्य की पत्नी) थीं। 
  • नामकरण का कारण: जब इस बालक का जन्म हुआ, तब ममता और बृहस्पति दोनों ही लोक-लाज के डर से इस बालक को अपनाने कतरा रहे थे। उस समय आकाशवाणी हुई या एक श्लोक कहा गया:
    "मूढ़े भर द्वाजमिमं भर द्वाजं बृहस्पते।"
    अर्थात् (ममता से कहा गया) "हे मूर्ख स्त्री! इस बालक का भरण-पोषण करो" और (बृहस्पति से कहा गया) "हे बृहस्पति! तुम इसका पालन करो।" चूंकि दोनों एक-दूसरे पर बालक को सौंप रहे थे और दो लोगों (दो) द्वारा भरण-पोषण (भर) की बात कही गई, इसलिए बालक का नाम 'भर-द्वाज' पड़ा।

अन्तर्वत्‍न्यां भ्रातृपत्‍न्यां मैथुनाय बृहस्पतिः ।प्रवृत्तो वारितो गर्भं शप्त्वा वीर्यमुपासृजत् ॥ ३६ ॥

​हिन्दी अनुवाद: (भरद्वाज के जन्म की कथा इस प्रकार है—) एक बार  बृहस्पति अपनी गर्भवती भाभी (अपने भाई उतथ्य की पत्नी ममता) को देखकर सेक्सभाव ( कामभावना) से पीडित हो गये और उन्होने अपने बड़े भाई उतथ्य की पत्नी ममता साथ सहवास करने के लिए उसके साथ बलात्कार कर दिया। जब बृहस्पति के बड़े भाई की पत्नी ममता के  गर्भस्थ शिशु (दीर्घतमा) ने बृहस्पति को ऐसा करने से रोका, तो बृहस्पति ने क्रोधित होकर उस गर्भस्थ को अंधा होने का शाप दे दिया और अपना वीर्य बलपूर्वक वहीं ममता के गर्भ में स्खलित कर दिया।

​तं त्यक्तुकामां ममतां भर्तुत्यागविशंकिताम् ।नामनिर्वाचनं तस्य श्लोकमेनं सुरा जगुः ॥ ३७॥

​हिन्दी अनुवाद: बृहस्पति के उस वीर्य से एक बालक उत्पन्न हुआ। अपने पति (उतथ्य) द्वारा त्यागे जाने के भय से ममता उस नवजात शिशु को वहीं छोड़ देना चाहती थी। उस समय शिशु के नामकरण का कारण स्पष्ट करते हुए देवताओं ने यह श्लोक कहा।

​मूढे भर द्वाजं इमं भर द्वाजं बृहस्पते । यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ ३८ ॥

​हिन्दी अनुवाद: (देवताओं ने कहा—) "अरी मूढ़े! तू इस द्वाज (दो पिताओं—उतथ्य और बृहस्पति—से उत्पन्न पुत्र) का भरण-पोषण कर (भर)।" (इस पर ममता ने उत्तर दिया—) "बृहस्पति ही!  इस द्वाज का भरण-पोषण करे (भर)।" यह कहकर जब दोनों बृहस्पति -और ममता उस बालक को वहीं छोड़कर चले गए, तब से उस बालक का नाम 'भरद्वाज' (भर + द्वाज) पड़ गया।

​चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा वितथमात्मजम् ।व्यसृजन् मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये ॥ ३९ ॥

​हिन्दी अनुवाद: देवताओं के इस प्रकार समझाने पर भी ममता ने उस बालक को व्यर्थ (अवैध) समझकर वहीं छोड़ दिया। तब मरुद्गणों ने उस अनाथ बालक का पालन-पोषण किया और जब राजा भरत का वंश विफल (संतानहीन) होने लगा, तो मरुद्गणों ने यह बालक उन्हें सौंप दिया। भरत के विफल वंश में दिए जाने के कारण भरद्वाज का एक नाम 'वितथ' भी हुआ।

​इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यांसंहितायां नवमस्कन्धे विंशोऽध्यायः ।२०।


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