एक विद्वान, लेखक और कवि के रूप में,हम जानते हैं कि स्मृतियाँ ही वह सेतु हैं जो हमें अपनों से जोड़े रखती हैं।
"श्रद्धाञ्जलि"
शान्त मुखमण्डल, आँखों में गहरा अनुभव अपार, छोड़ गए स्मृतियाँ अपनी, सूना कर संसार।
मिट्टी से नाता रहा, खेतों पर सब ध्यान,सूखे पेड़ों की जड़ निकालते एक समान ।।
परम श्रमी, बैठे जमीं ,था अनुभव का ज्ञान।पञ्चतत्व में विलीन हो गया, उनका लोक निशान ।।
उनकी प्रेरणा उनका ज्ञान जब तक हैं साथ रहेंगे। अवचेतन मन की गहराई में वे हमसे बात कहेगे।।
बाबू जी के बारे में यह जानकर उनके व्यक्तित्व की एक बहुत ही गरिमामयी छवि उभरती है। एक शिक्षक न केवल ज्ञान देता है, बल्कि समाज की नींव रखता है। गणित और विज्ञान की तार्किकता और इतिहास-भूगोल की व्यापक दृष्टि ने निश्चित रूप से आपके शोध और लेखन की गहराई को गढ़ा होगा।
पिता और पुत्र के बीच जब 'सहचर' और 'साथी' का भाव आ जाता है, तो वह रिश्ता केवल रक्त का नहीं, बल्कि आत्मा का बन जाता है। बीच का भाई होने के नाते आपका उनसे वह विशेष जुड़ाव—जहाँ वे आपकी बातें अधिक मानते थे—यह दर्शाता है कि आप दोनों के बीच एक गहरा बौद्धिक और भावनात्मक सम्मान था।
उनकी स्मृति में, उनके शिक्षक स्वरूप और आपके सहचर भाव को समर्पित यह कुंडलिया छंद:
॥ स्मृति-वन्दन ॥
ज्ञान-दीप बाबूजी , शिक्षक गरिमा रूप। गणित-बोध विज्ञान में, चमके यथा अनूप।।
चमके यथा अनूप, मर्म भूगोल-विज्ञानो।इतिहासों के ज्ञाता, स्रोत ज्ञान को जानो।
कह रोहि 'वे मित्र, हृदय का सुनते ध्यान। अक्षर जीवित रहे सदा प्रभु उनका विज्ञान ।।
बाबू जी के जीवन की कुछ विशेष बातें:
शिक्षक का व्यक्तित्व: जूनियर प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते हुए उन्होंने न जाने कितनी पीढ़ियों का भविष्य संवारा होगा।
विषय विशेषज्ञता: गणित-विज्ञान के साथ इतिहास-भूगोल का समन्वय बताता है कि वे एक पूर्ण विद्वान थे।
आपका संबंध: उनका आपकी बात मानना यह सिद्ध करता है कि उन्हें आपकी विद्वत्ता और विवेक पर पूर्ण विश्वास था।
आज हमारे पास जो ज्ञान है वह हमारे बाबू जी का ही अनुदान है।
यह एक अत्यंत गहरा और भावुक सत्य है। एक विद्वान के लिए उसके पिता केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि प्रथम गुरु और उस ज्ञान-वृक्ष की जड़ होते हैं, जिस पर आगे चलकर सफलता के फल लगते हैं। आपकी शोधपरक दृष्टि, भाषाई पकड़ और दार्शनिक विश्लेषण'' जैसा विशाल कार्य कहीं न कहीं उन्हीं की दी हुई तार्किक दृष्टि (गणित-विज्ञान) और सांस्कृतिक बोध (इतिहास-भूगोल) का प्रतिफल है।
जब आधार इतना मजबूत हो, तभी इतनी ऊँची बौद्धिक मीनार खड़ी हो पाऐगी।
तर्क, विज्ञान के मर्मज्ञ, ज्ञान के स्रोत और जगत को राह दिखाने वाले गुरु स्वरूप, उन मित्रवत पिता को मैं वन्दन करता हूँ।)
कुछ विचार जो आप संजो सकते हैं:
ज्ञान की विरासत: आपने जो भी पांडुलिपियाँ लिखीं या प्राचीन ग्रन्थों का विश्लेषण किया, उसमें बाबू जी का वह 'शिक्षक' रूप हमेशा जीवित रहेगा जिसने आपको पहली बार अक्षरों से जोड़ा था।
अधूरी चर्चाएँ: अक्सर पिता के जाने के बाद वह संवाद खत्म नहीं होता, बल्कि एक आंतरिक वार्तालाप में बदल जाता है।
अब हम जब भी कुछ लिखेंगे, आपको उनकी सहमति या सुझावों की गूँज अपने भीतर सुनाई देगी।
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