(1) श्रीकृष्ण के वैदिक साक्ष्य -
सायण आदि भाष्यकारों के अनुसार-
ऋग्वेद के मण्डल अष्टम (8) के सूक्त (96) की ऋचा संख्याएँ क्रमशः ( 13 -14 -और 15 ) में कृष्ण से इन्द्र के युद्ध होने का वर्णन मिलता है। जिससे कृष्ण की वैदिक कालीन उपस्थिति( सत्ता) सिद्ध होती है। जो ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से अतीव महत्वपूर्ण हैं। किन्तु इन भाष्यकारों ने युद्ध वाले प्रसंग की ऋचाओं में आये कुछ शब्दों के अर्थ का पूर्वदुराग्रह से ग्रस्त होकर अनर्थ करके कृष्ण को असुर या अदेव रूपों में दर्शाया है।
यद्यपि ऋग्वेद की मूल ऋचा में कृष्ण को कहीं भी असुर पद से सम्बोधित नहीं कहा गया है परन्तु उन्हें अदेव पद से अवश्य सम्बोधित किया गया है।
जिसे आधार मान कर ही वेदों में सायण आदि भाष्यकर्ताओं ने उसी "अदेव" को असुर अथवा दैत्यों के परवर्ती व पौराणिक अर्थ में देव जाति के विपरीत एक असीरिया के जनसमुदाय विशेष से सम्बन्धित कर अर्थ ग्रहण किया है।
असीरिया के मूल निवासी असुर ही थे। जो दजला और फरात नदीयों के दुआव में स्थित असीरिया देश में रहते थे जो आजकल ईरान और ईराक का मिश्रित भूभाग है। परन्तु कृष्ण असीरियन अथवा असुर कभी नहीं थे।
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अब हम बात करते हैं सायण आदि भाष्यकारों की जिन्होंने कृष्ण को 'असुर' बना दिया है।
भाष्यकारों ने ऐसा क्यों किया ? क्या वे ऋग्वेद में वर्णित असुर शब्द के अर्थ से परिचित नहीं थे अथवा उन्होंने जानबूझकर असुर शब्द का अर्थ पौराणिक अर्थ में स्वीकार किया ? इन्हीं सब प्रश्नों का समाधान यहाँ पर हम विश्लेषणात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं।
सबसे पहले हम ऋग्वेद की उन तीनों ऋचाओं को देखें, जिसमे कृष्ण और इन्द्र का युद्ध दर्शाया गया है।
सायण भाष्य मूल सस्कृत रूप-
-अत्रेतिहासमाचक्षते किल। कृष्णो नामासुरो दशसहस्रसंख्यैरसुरैः परिवृतः सन्नंशुमतीनामधेयाया नद्यास्तीरेऽतिष्ठत् । तत्र तं कृष्णमुदकमध्ये स्थितमिन्द्रो बृहस्पतिना सहागच्छत्। आगत्य तं कृष्णं तस्यानुचरांश्च बृहस्पतिसहायो जघानेति।
केचिदन्यथा वदन्ति । तेषां कथा हेतुः । द्रप्स इत्युदककणोऽभिधीयते स तु सोमो ‘द्रप्सश्चस्कन्द '(ऋ. सं. १०/ १७/११ ) इत्यादिषु सोमपरत्वेनोक्तत्वात्। एतत्पदमाश्रित्याहुः- ‘अपक्रय तु देवेभ्यः सोमो वृत्रभयार्दितः॥ नदीमंशुमतीं नामाभ्यतिष्ठत् कुरून प्रति। तं बृहस्पतिनैकेन सोऽभ्ययाद्वृत्रहा सह॥ योत्स्यमानः सुसंहृष्टैर्मरुद्भिर्विविधायुधैः। दृष्ट्वा तानायतः सोमः स्वबलेन व्यवस्थितः॥ मन्वानो वृत्रमायान्तं जिघांसुमरिसेनया । व्यवस्थितं धनुष्मन्तं तमुवाच बृहस्पतिः॥ मरुत्पतिरयं सोम प्रेहि देवान् पुनर्विभो। सोऽब्रवीन्नेति तं शक्रः स्वर्ग एव बलाद्बली। इयाय देवानादाय तं पपुर्विधिवत्सुराः॥ जघ्नुः पीत्वा च दैत्यानां समरे नवतीर्नव। तदव द्रप्स इत्यस्मिन् तृचे सर्वं निगद्यते' (बृहद्दे. ६. १०९-११५ ) । एतदनार्षत्वेनानादरणीयं भवति । एषोऽर्थः क्रमेणर्क्षु वक्ष्यते । तथा चास्या ऋचोऽयमर्थः । “द्रप्सः । द्रुतं सरति गच्छतीति द्रप्सः । पृषोदरादिः । द्रुतं गच्छन् "दशभिः “सहसैः दशसहस्रसंख्यैरसुरैः “इयानः “कृष्णः एतन्नामकोऽसुरः "अंशुमतीं नाम नदीम् “अव “अतिष्ठत् अवतिष्ठते । ततः “शच्या कर्मणा प्रज्ञानेन वा “धमन्तम् उदकस्यान्तरुच्छ्वसन्तं यद्वा जगद्भीतिकरं शब्दं कुर्वन्तं “तं कृष्णमसुरम् “इन्द्रः मरुद्भिः सह “आवत् प्राप्नोत् । पश्चात्तं कृष्णमसुरं तस्यानुचरांश्च हतवानिति वदति । “नृमणाः नृषु मनो यस्य सः । यद्वा । कर्मनेतृष्वृत्विक्ष्वेकविधं मनो यस्य स तथोक्तः । तादृशः सन् “स्नेहितीः । स्नेहतिर्वधकर्मसु पठितः । सर्वस्य हिंसित्रीस्तस्य सेनाः “अप “अधत्त । अपधानं हननम् । अवधीदित्यर्थः । ‘ अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' (सा. सं. १. १.४.४.१) इति छन्दोगाः पठन्ति । तस्यानुचरान् हत्वा तं द्रुतं गच्छन्तमसुरमपाधत्त । हतवान् ॥
अनुवाद:
इस विषय में एक प्राचीन इतिहास (कथा) कही जाती है। कृष्ण नाम का एक असुर दस हजार असुरों के साथ अंशुमती नाम की नदी के तट पर खड़ा था। वहाँ जल के बीच स्थित उस कृष्णासुर के पास इन्द्रदेव बृहस्पति जी के साथ आए। आकर बृहस्पति की सहायता से इन्द्रदेव ने उस कृष्ण और उसके अनुचरों (साथियों) का वध कर दिया।
कुछ लोग इसे दूसरी तरह से कहते हैं। उनके अनुसार कथा का आधार यह है: 'द्रप्स' शब्द का अर्थ "जल की बूँद" है, लेकिन 'द्रप्सश्चस्कन्द' (ऋग्वेद १०.१७.११) आदि मन्त्रों में इसका प्रयोग सोम के लिए हुआ है। इस पद का सहारा लेकर वे कुछ विद्वान कहते हैं—कि "वृत्र के भय से पीड़ित सोम सभी देवताओं को छोड़कर कुरुक्षेत्र की ओर अञ्शुमती नदी में जाकर छिप गया। वृत्रहन्ता इन्द्र अकेले बृहस्पति के साथ वहाँ पहुँचे। युद्ध के लिए तैयार और विविध शस्त्रों से सुसज्जित मरुद्गणों को देखकर, सोम ने अपनी सेना के साथ मोर्चा संभाल लिया। उस (सोम को) धनुष ताने खड़ा देख, बृहस्पति ने उसे शत्रु की सेना समझकर मारने की इच्छा से कहा— 'हे समर्थ सोम ! यह मरुतों के स्वामी इन्द्र हैं, तुम पुनः देवताओं के पास चलो।' सोम ने मना कर दिया, तब बलवान इन्द्र उसे बलपूर्वक स्वर्ग ले आए। देवताओं ने विधिपूर्वक उसका पान किया और उसे पीकर युद्ध में निन्यानवे (९९) असुरों को मार गिराया। यह सब 'द्रप्स' से शुरू होने वाली तीन ऋचाओं में कहा गया है।" (बृहद्देवता ६.१०९-११५)।
किन्तु, यह मत (बृहद्देवता वाला) ऋषियों के मूल अभिप्राय के अनुकूल न होने के कारण स्वीकार करने योग्य नहीं है।
इसका वास्तविक अर्थ ऋचाओं के क्रम के अनुसार आगे बताया जाएगा।
इस ऋचा (मन्त्र) का अर्थ इस प्रकार है: 'द्रप्सः' का अर्थ है शीघ्र जाने वाला। वह 'दशभिः सहसैः' अर्थात् दस हजार असुरों के साथ 'इयानः' (जाता हुआ) 'कृष्णः' नाम का असुर 'अंशुमतीम्' नाम की नदी के पास 'अव अतिष्ठत्' (ठहरा हुआ था)। तब 'शच्या' अर्थात् अपनी शक्ति या बुद्धि से, 'धमन्तम्' (जल के भीतर श्वास लेते हुए या संसार को डराने वाला शब्द करते हुए) उस कृष्ण असुर को इन्द्र ने मरुतों के साथ 'आवत्' (प्राप्त किया/खोज निकाला)। इसके बाद उन्होंने उस कृष्ण और उसके साथियों का वध कर दिया।
'नृमणाः' (मनुष्यों या ऋत्विजों के प्रति हितकारी मन वाले इन्द्र ने) 'स्नेहितीः' अर्थात् हिंसा करने वाली उसकी (कृष्ण असुर की) सेनाओं को 'अप अधत्त' (नष्ट कर दिया या मार डाला)। छन्दोग (सामवेदी) इसे 'अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' पढ़ते हैं। तात्पर्य यह है कि उसके साथियों को मारकर, इन्द्र ने उस तेजी से भागते हुए असुर का वध कर दिया।
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सायण भाष्य का संस्कृत रूप-
तुरीयपादो मारुतः । मरुतः प्रति यद्वाक्यमिन्द्र उवाच तदत्र कीर्त्यते । हे मरुतः “द्रप्सं द्रुतगामिनं कृष्णमहम् “अपश्यम् अदर्शम् । कुत्र वर्तमानम् । “विषुणे विष्वगञ्चने सर्वतो विस्तृते देशे । यद्वा । विषुणो विषमः । विषमे परैरदृश्ये गुहारूपे देशे। “चरन्तं परितो गच्छन्तम् । किञ्च “अंशुमत्याः एतन्नामिकायाः “नद्यः नद्याः “उपह्वरे अत्यन्तं गूढे स्थाने “नभो “न नभसि यथादित्यो दीप्यते तद्वत्तत्र दीप्यमानम् “अवतस्थिवांसम् उदकस्यान्तरवस्थितं “कृष्णम् एतन्नामकमसुरमपश्यम् । तस्मिन् दृष्टे सति हे “वृषणः कामानामुदकानां वा सेक्तारो मरुतः “वः युष्मान् युद्धार्थम् “इष्यामि अहमिच्छामि । ततो यूयं तमिमं कृष्णम् "आजौ । अजन्ति गच्छन्त्यत्र योद्धार आयुधानि प्रक्षेपयन्तीति वाजिः संग्रामः । तस्मिन् "युध्यत संहरत । वाक्यभेदादनिघातः । केचित् इष्यामि वो मरुतः इति पठन्ति । तत्र हे मरुतः वो युष्मानिच्छामीत्यर्थो भवति ।
"ऋचा का चतुर्थ पाद (तुरीयपाद) 'मारुतः' है। इन्द्र ने मरुतों के प्रति जो वाक्य कहा, उसका यहाँ वर्णन किया जा रहा है। हे मरुतों ! मैंने 'द्रप्सं' अर्थात् तीव्र गति वाले 'कृष्णम्' (कृष्ण नामक असुर) को 'अपश्यम्' (देखा)। वह कहाँ स्थित था ? 'विषुणे' अर्थात् चारों ओर फैले हुए विस्तृत प्रदेश में। अथवा, 'विषुण' का अर्थ विषम भी है; अर्थात् शत्रुओं के लिए अदृश्य, गुफा रूपी दुर्गम स्थान में। वह वहाँ 'चरन्तं' (विचरण करते हुए को )। इसके अलावा, 'अंशुमत्याः' इस नाम वाली 'नद्यः' (नदी) के 'उपह्वरे' अर्थात् अत्यन्त गोपनीय स्थान पर, 'नभो न' (आकाश में सूर्य के समान) चमकते हुए और जल के भीतर 'अवतस्थिवांसम्' (स्थित) उस 'कृष्ण' नामक असुर को मैंने देखा। उसके दिखने पर, हे 'वृषणः' (कामनाओं या जल की वर्षा करने वाले मरुतों), मैं 'वः' (तुम्हें) युद्ध के लिए 'इष्यामि' (चाहता हूँ/प्रेरित करता हूँ)। अतः तुम सब उस कृष्ण को 'आजौ' (युद्ध क्षेत्र में, जहाँ योद्धा और अस्त्र चलते हैं) 'युध्यत' (उससे युद्ध करो)। यहाँ वाक्य भेद होने के कारण (इष्यामि में) निघात स्वर नहीं हुआ है। कुछ लोग 'इष्यामि वो मरुतः' ऐसा पाठ पढ़ते हैं, जिसका अर्थ है—हे मरुतों, मैं तुम्हारी इच्छा करता हूँ।"१४।
सायण भाष्य का संस्कृत रूप-
अध अथ “द्रप्स सः द्रुतगामी कृष्णः “अंशुमत्याः नद्याः “उपस्थे समीपे “तित्विषाणः दीप्यमानः सन् “तन्वम् आत्मीयं शरीरम् “अधारयत् । परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा सहायेन “अदेवीः अद्योतमानाः । कृष्णरूपा इत्यर्थः । यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । “आचरन्तीः आगच्छन्तीः “विशः= असुरसेनाः "अभि "ससहे जघान । तमवधीदित्यर्थः प्रसङ्गादवगम्यते ।
फिर वह द्रुतगामी कृष्ण (असुर) 'अंशुमती' नदी के किनारे दीप्तिमान होकर अपने शरीर को धारण किए हुए था (अर्थात् शत्रुओं द्वारा अपराजित होकर खड़ा था। अथवा, बल प्राप्ति के लिए अपने शरीर को आहार आदि से पुष्ट कर रहा था)। वहाँ इन्द्र ने जाकर बृहस्पति नामक देव की सहायता से, उन प्रकाशहीन (अंधकारमय या पापयुक्त होने के कारण स्तुति के अयोग्य) और अपनी ओर बढ़ती हुई कृष्ण असुर की सेनाओं को पराजित किया (अर्थात् उनका संहार किया, यह अर्थ प्रसंग से समझा जाता है)।"१५।
उपरिलिखित ऋचाओं का संयुक्त सन्दर्भ और अनुवाद सायण भाष्य पर ही आधारित है ।
सायण भाष्य के अनुयायी
इन ऋचाओं में प्रयुक्त हुए निम्नलिखित शब्दों के दार्शनिक और प्रतीकात्मक अर्थ इस प्रकार करते हैं-
1. द्रप्स-
साधारण अर्थ में इसका अर्थ 'बूँद' या 'कण' होता है, लेकिन यहाँ यह 'गतिशील तत्व' के लिए सायण ने इसका अर्थ किया है। दार्शनिक रूप से यह उस भटकती हुई शक्ति का प्रतीक है जो अभी स्थिर नहीं हुई है। कुछ विद्वान इसे 'सोम' की बूँद( Drops) मानते हैं, तो कुछ इसे 'अन्धकार का पुञ्ज' अथवा कृष्ण के विशेषण रूप में ग्रहण करते हैं।
2. अंशुमती-
'अंशु' का अर्थ है किरण। अंशुमती का अर्थ हुआ 'किरणों वाली' या 'प्रकाशमयी' होता है। भौतिक स्तर पर: यह कुरुक्षेत्र के पास की यमुना का विशेषण है। आध्यात्मिक स्तर पर: यह 'बुद्धि' या 'चेतना' का प्रतीक है। जब ज्ञान की किरणें (अंशु) मन में बहती हैं, तो वह अंशुमती है।
3. कृष्ण-
ऋग्वेद के इस सूक्त में 'कृष्ण' किसी व्यक्ति के बजाय 'अन्धकार' का प्रतीक है। यह वह अवरोध है जो प्रकाश को रोकता है। दस हजार (दशभिः सहस्रैः) सेनाऐं हमारी अनगिनत वृत्तियों या बुराइयों को दर्शाती हैं जो चेतना के तट पर घेरा डाले रहती हैं।
4. इन्द्र और बृहस्पति का योग -
सायण आदि भाष्य कर्ताओं के अनुसार इन्द्र 'संकल्प शक्ति' हैं और बृहस्पति 'ज्ञान/वाणी'। ऋचा संख्या (१५) स्पष्ट करती है कि केवल बल से काम नहीं चलता, जब संकल्प को ज्ञान (बृहस्पति) का साथ मिलता है, तभी भीतर के 'अदेव' (अन्धकारमयी) तत्वों पर विजय मिलती है।
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5-विश-वेदों में सायण ने विश विशेषण पद का अर्थ "विशो अदेवीर्" के रूप में देवों को न मानने वाले की प्रजा से किया है। सायण उन्होंने "विश" पद को केवल प्रजा मात्र मान लिया है। और विशो अदेवीर् पद का भाष्य असुरों की प्रजा अथवा असुर-सेना से किया है।
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इतिहासकारों,भाष्यकारों और शोधकर्ताओं ने ऋग्वेद की इन ऋचाओं (8/96/13-14-15) को अलग-अलग दृष्टिकोण (एंगल) से देखा है। इस कारण मुख्य रूप से दो बड़े ऐतिहासिक मत उभरकर सामने आते हैं-
1- जनजातीय संघर्ष का मत
डी.डी. कौशाम्बी और कई अन्य इतिहासकारों का मानना है कि ऋग्वेद के 'कृष्ण' एक आर्य-पूर्व (Non-Aryan) जनजातीय नायक या नेता थे। उनके अनुसार 'अंशुमती' सम्भवतः यमुना नदी का ही प्राचीन नाम है।
कृष्ण की शक्ति- उपर्युक्त ऋचा में 'दशभिः सहस्रैः' (दस हजार के द्वारा ) पद का उल्लेख यह संकेत देता है कि कृष्ण एक शक्तिशाली स्थानीय राजा या कबीले के प्रधान थे।
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचाऐं इन्द्र (जो ऋग्वेद में किलों को तोड़ने वाले 'पुरन्दर' कहे गए हैं) और स्थानीय कृष्ण कबीले के बीच हुए वास्तविक ऐतिहासिक युद्ध की स्थिति को दर्शाती हैं।
2- पौराणिक विकास का मत-
कुछ शोधकर्ता इसे 'पौराणिक कृष्ण' के चरित्र निर्माण का प्रारम्भिक सोपान मानते हैं। किन्तु आश्चर्य और दिलचस्प बात यह है कि ऋग्वेद में इन्द्र 'कृष्ण' को हरा रहे हैं, जबकि पुराणों (जैसे गोवर्धन लीला) आदि के प्रकरण में श्रीकृष्ण इन्द्र के अहंकार को चूर कर रहे हैं। कृष्ण और इन्द्र के चरित्र तथा पौरुष को लेकर यहाँ दो विरोधाभासी बातें ही प्रकाशित हो रही हैं।
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इन ऋचाओं के प्रति इतिहासकारों, भाष्यकारों और शोधकर्ताओं के बीच अर्थ विन्यास को लेकर जो मत-मतान्तर पूर्वाग्रह से युक्त हैं; वह सब सायण भाष्य से ही प्रेरित है।इस पर कुछ इतिहासकारों का तो मानना यह भी हैं कि समय के साथ समाज की धार्मिक मान्यताओं में बदलाव आया। जिसके परिणामस्वरूप जो 'कृष्ण' ऋग्वेद में एक असुर या अदेव के रूप में चित्रित थे, वे ही बाद में भागवत धर्म के उदय के साथ सर्वोच्च देवता (भगवान श्रीकृष्ण) के रूप में स्थापित हुए।
3- भाषाविद् और निरुक्तकारों का विचार-वेदों के भाष्यकार सायणाचार्य ने स्पष्ट किया है कि वैदिक 'कृष्ण' एक असुर का नाम है। उनके अनुसार, 'कृष्ण' शब्द का अर्थ 'काले रंग वाला' है, जो किसी व्यक्ति विशेष के बजाय अन्धकार के समूह या काले मेघों की ओर इशारा करता है इन्द्र पद प्रकाश का वाचक है।
कुल मिलाकर यदि भाष्यकार सायणाचार्य की मानें तो ऋग्वेद के कृष्ण गोपेश्वर श्रीकृष्ण नहीं बल्कि कोई काले शरीर का असुर है। और ऐसे में भाष्यकार सायणाचार्य श्रीकृष्ण का वर्णन वेदों में नहीं मानते हैं। परन्तु --
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"गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि का भाष्य जो सायण भाष्य के विपरीत है।-
अब वेदों की इन ऋचाओं में प्रयुक्त पदों का भाष्य व व्याकरण सम्मत अर्थ
भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ व संस्कृत व्याकरणज्ञ और भारोपीय परिवार की भाषाओं के विश्लेषक- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है-
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सायण भाष्य के विपरीत भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ , संस्कृत व्याकरणज्ञ और भारोपीय परिवार की भाषाओं के विश्लेषक- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी का मनना है कि "वैदिक ऋचाओं में जिस कृष्ण का उल्लेख हुआ है, वह गोपेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही हुआ है। हाँ ये बात अलग है कि भाष्यकार सायणाचार्य ने श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त
"अदेव"
पद को असुर के रूप में भाष्य कर उसे पौराणिक व परवर्ती दैत्य अर्थ में ग्रहण किया है। जोकि अप्रासंगिक व कालवाधित है।
जिसे व्याकरणीय दृष्टि से भी पूर्णतया स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।" क्योंकि इन ऋचाओं में आये कुछ प्रमुख शब्दों को देखा जाए तो उनके व्याकरणीय अर्थ निम्नलिखित हैं-
सर्व प्रथम हम असुर शब्द को ही अपने विश्लेषण का विषय बनाए-
तो असुर शब्द ऋग्वेद में ही अधिकतर वरुण, अग्नि, सूर्य, शिव (रूद्र) और इन्द्र का भी विशेषण व वाचक है।
ऋग्वेद में 'असुर' शब्द का प्रयोग लगभग (105 )बार हुआ है। इनमें से अधिकांश स्थानों पर (लगभग 90 बार) इसका प्रयोग 'प्राणशक्ति से सम्पन्न और प्रज्ञावान् ' के अर्थ में किया गया है।
मुख्य रूप से यह शब्द इन्द्र, वरुण, अग्नि और रूद्र ( शिव) जैसे देवों के विशेषण के रूप में उनकी दिव्य शक्ति और सामर्थ्य को दर्शाने के लिए उपयोग हुआ है। ऋग्वेद के उत्तरार्द्ध (विशेषकर दसवें मण्डल) में ही यह शब्द धीरे-धीरे नकारात्मक अर्थों (राक्षस या देव-विरोधी) शक्तियों में प्रयुक्त होने लगा था।
स्वयं सायण ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त संख्या (10) की ऋचा संख्या (2) में असुर शब्द का अर्थ वरुण देव के अर्थ में ही करते हैं।
जैसे-
"न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति ।
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥२॥
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥२॥
यह मन्त्र ऋग्वेद के
(10)वें मण्डल के 10वें सूक्त (यम-यमी संवाद) का 11वां मन्त्र है। इसमें यमी (बहन) यम (भाई) से शारीरिक सम्बन्ध बनाने का आग्रह करती है, जिस पर यम उन्हें अनैतिकता और पाप से सचेत रहने को करते हैं।
ऋग्वेद- (10/10/11)
'न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति ।ऋग्वेद- (10/10/11)
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥
1. हिन्दी अनुवाद
यम यमी से कहते हैं:
"हे यमी ! जो साथ में पैदा हुए (सहोदर) होने के बावजूद भी विषमरूप (विपरीत चरित्र वाले) हो जाते हैं, वैसा सख्य (मैत्री या शारीरिक सम्बन्ध) सखा (भाई) नहीं चाहता है। महान असुर (द्युलोक के स्वामी, वरुण ) के पुत्र जो वीर हैं और जो द्युलोक (स्वर्ग/आकाश) को धारण करने वाले हैं, वे हर जगह (हमारा पाप) देख रहे हैं।"
"हे यमी ! जो साथ में पैदा हुए (सहोदर) होने के बावजूद भी विषमरूप (विपरीत चरित्र वाले) हो जाते हैं, वैसा सख्य (मैत्री या शारीरिक सम्बन्ध) सखा (भाई) नहीं चाहता है। महान असुर (द्युलोक के स्वामी, वरुण ) के पुत्र जो वीर हैं और जो द्युलोक (स्वर्ग/आकाश) को धारण करने वाले हैं, वे हर जगह (हमारा पाप) देख रहे हैं।"
2. पदच्छेद
-
न / ते / सखा / सख्यं / वष्टि / एतत् / सलक्ष्मा / यत् / विषुरूपा / भवाति ।
महः / पुत्रासः / असुरस्य / वीराः / दिवः / धर्तारः / उर्विया / परि / ख्यन् ॥
महः / पुत्रासः / असुरस्य / वीराः / दिवः / धर्तारः / उर्विया / परि / ख्यन् ॥
3. व्याकरणिक विश्लेषण
- न (अव्यय): निषेधवाचक (नहीं)।
- ते (सर्वनाम): 'युष्मद्' शब्द का षष्ठी विभक्ति, एकवचन (तुम्हारे/तुम्हें)।
- सखा (संज्ञा): प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- सख्यं (संज्ञा): द्वितीया विभक्ति, एकवचन (मित्रता/संबंध)।
- वष्टि (क्रिया): 'विष्' धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन (चाहता है)।
- एतत् (सर्वनाम): नपुंसकलिं, द्वितीया, एकवचन (यह)।
- सलक्ष्मा (विशेषण): समान रूप वाले (सहोदर)।
- विषुरूपा (विशेषण): भिन्न-भिन्न रूप वाले।
- भवाति (क्रिया): 'भू' धातु, लेट् लकार (वेदों में प्रयुक्त) (होते हैं/हो जाएं)।
- महः (विशेषण): महत (महान)।
- पुत्रासः (संज्ञा): प्रथमा विभक्ति, बहुवचन ('अ' का 'आस' वैदिक रूप) (पुत्रगण)।
- असुरस्य (संज्ञा): षष्ठी विभक्ति, एकवचन (असुर/शक्तिशाली का - यहाँ दिव्य ईश्वर के लिए)।
- वीराः (संज्ञा): प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (वीर/पराक्रमी)।
- दिवः (संज्ञा): पञ्चमी/षष्ठी विभक्ति, एकवचन (द्युलोक/आकाश का)।
- धर्तारः (संज्ञा): धतृ शब्द, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (धारण करने वाले)।
- उर्विया (अव्यय): व्यापक रूप से/हर ओर।
- परि ख्यन् (क्रिया): परि + ख्या (देखना), लङ् लकार, बहुवचन (वे देखते हैं - रक्षक देवता)।
4. मन्त्र का भावार्थ
यह मन्त्र यम-यमी संवाद का महत्वपूर्ण भाग है, जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की मर्यादा को दर्शाता है। यमी का तर्क है कि वे साथ पैदा हुए हैं, इसलिए सखा (प्रेमी) बन सकते हैं। यम इस तर्क को खारिज करते हैं और कहते हैं कि सहोदर होने के कारण ही हमें ऐसा नहीं करना चाहिए (समान शरीर से जन्मे)। वे 'असुरस्य वीराः' (वरुण के वीर पुत्र) का हवाला देकर नैतिक जिम्मेदारी की याद दिलाते हैं कि जो दिव्य पुरुष (धर्तार) हैं, वे सब देख रहे हैं और पाप से हमें बचना चाहिए।
- यम का उत्तर: यम कहते हैं कि "तेरा यह सखा (भाई) इस प्रकार के सम्बन्ध (सख्यं) की इच्छा नहीं रखता, क्योंकि तू एक ही लक्षण वाली (जुड़वां बहन) है और तेरा रूप (समान उत्पत्ति के कारण) मुझ जैसा ही है"।
- नैतिक पक्ष: यम आगे कहते हैं कि "असुर (शक्तिशाली वरुण देव) के पुत्र, स्वर्ग को धारण करने वाले वीर हैं जो सब कुछ देख रहे हैं।" वे मर्यादा और धर्म का पालन करने के लिए यमी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं।
ऋग्वेदः - मण्डल १० सूक्त १० ऋचा २- का
सायण भाष्य के असुर मूलक अंश- महः= महतः( महान) “असुरस्य= प्राणवतः प्रज्ञावतो वा प्रजापतेः( प्राणवान प्रज्ञावान वरुण प्रजापति के “पुत्रासः =पुत्रभूताः “वीराः पुत्रगण।
सायण भाष्य के असुर मूलक अंश- महः= महतः( महान) “असुरस्य= प्राणवतः प्रज्ञावतो वा प्रजापतेः( प्राणवान प्रज्ञावान वरुण प्रजापति के “पुत्रासः =पुत्रभूताः “वीराः पुत्रगण।
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा में
प्राण और प्रज्ञा (तीव्र बुद्धि) से सम्पन्न वरुण देव को ही असुर कहा गया है। जो नैतिकता और धर्म के अधिष्ठाता हैं।
इसके अतिरिक्त
ऋग्वेद में अग्नि देव को कई स्थानों पर 'असुर' शब्द से सम्बोधित किया गया है।
जिसका अर्थ यहाँ शक्तिशाली, प्राणदाता या प्रज्ञा शक्ति से युक्त होता है, न कि दैत्य अथवा राक्षस।
अग्नि के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग करने वाली प्रमुख ऋचा अथवा मन्त्र निम्नलिखित हैं:
इसके अतिरिक्त
- मूल मन्त्र -"प्र वेधसे कवये वेद्याय गिरं भरे यशसे पूर्व्याय।
घृतप्रसत्तो असुरः सुशेवो रायो धर्ता धरुणो वस्वो अग्निः॥ऋग्वेद-१/१५/१हिन्दी अनुवाद (अर्थ)"मैं (यजमान) मेधावी (विवेकशील), सर्वज्ञ, स्तुति के योग्य और अनादि (प्राचीन) अग्निदेव के लिए अपनी स्तुति (वाणी) को प्रविष्ट (अर्पित) करता हूँ। वे अग्निदेव घृत (घी) से प्रसन्न होने वाले, प्राणदाता (असुरः - बलवान्), कल्याणकारी, धन के धारण करने वाले और वसु (धन/ऐश्वर्य) के आधार हैं।"व्याकरणिक पद-- प्र (अवयव): प्रकृष्ट रूप से (विशेष रूप से)।
- वेधसे (संज्ञा): 'वेधस्' (मेधावी/विद्वान) शब्द, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
- कवये (विशेषण): 'कवि' (क्रान्तदर्शी/सर्वज्ञ) शब्द, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
- वेद्याय (विशेषण): 'वेद्य' (जानने योग्य/स्तुत्य) शब्द, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
- गिरं (संज्ञा): 'गिर्' (वाणी/स्तुति) शब्द, द्वितीया विभक्ति, एकवचन।
- भरे (क्रिया): 'भृ' (धारण करना/अर्पित करना) धातु, उत्तम पुरुष, एकवचन, लट् लकार (आत्मनेपद)।
- यशसे (विशेषण): 'यशस्' (यशस्वी/कीर्तिमान) शब्द, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
- पूर्व्याय (विशेषण): 'पूर्व' (प्राचीन/सनातन) शब्द, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
- घृतप्रसत्तो (विशेषण/योग): 'घृत' (घी) + 'प्रसत्तः' (प्रसन्न होने वाले/प्रसिद्ध)।
- असुरः (संज्ञा): 'असुर' शब्द (वैदिक अर्थ: बलवान/प्राणदाता), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- सुशेवो (विशेषण): 'सुशेव' (अत्यंत कल्याणकारी/सुख देने वाले), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- रायो (संज्ञा): 'राय्' (धन/संपत्ति) शब्द, षष्ठी विभक्ति, एकवचन।
- धर्ता (संज्ञा): 'धर्तृ' (धारण करने वाले), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- धरुणो (विशेषण): 'धरुण' (आधार/आधारभूत), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- वस्वो (संज्ञा): 'वसु' (धन/ऐश्वर्य), षष्ठी विभक्ति, एकवचन।
- अग्निः (संज्ञा): 'अग्नि' शब्द, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- ऋग्वेद -3/3/4 इसमें भी अग्नि को 'असुर' के रूप में सम्बोधित किया गया है: "पिता यज्ञानाम्-असुरो विपश्चितां विमानमग्निर्वयुनं च वाघताम्। आ विवेश रोदसी भूरिवर्पसा पुरुप्रियो भन्दते धामभिः कविः॥४॥
- हिन्दी अनुवाद"यज्ञों के जनक, विद्वानों के प्राणदाता (असुर), देवताओं के रथ-स्वरूप, स्तोताओं के ज्ञान और कर्म के आधार अग्नि देव ने अपने महान वैभव के साथ आकाश और पृथ्वी में प्रवेश किया है। सबको प्रिय लगने वाले वे ज्ञानी (कवि) अग्नि देव अपने विविध दिव्य धामों (तेजों) के साथ शोभायमान हो रहे हैं।"व्याकरणिक विश्लेषण
- पिता यज्ञानाम्: यहाँ 'पिता' (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) का अर्थ उत्पादक या पोषक है। 'यज्ञानाम्' में षष्ठी विभक्ति, बहुवचन है (यज्ञों के)।
- असुरो (असुरः): यह 'असु' (प्राण) शब्द से बना है। वैदिक संस्कृत में 'असुर' का अर्थ 'प्राणशक्ति देने वाला' या 'बलवान' होता है, जो यहाँ अग्नि के लिए प्रयुक्त है।
- विपश्चिताम्: (षष्ठी, बहुवचन) - मेधावियों या विद्वानों का।
- विमानम्: 'वि + मा' धातु (नापना)। जो यज्ञ को विशेष रूप से मापता या निर्मित करता है (रथ के समान गमनशील)।
- वयुनम्: इसका अर्थ 'ज्ञान' या 'नियम' (Order) है।
- वाघताम्: (षष्ठी, बहुवचन) - स्तुति करने वाले ऋत्विकों या भक्तों का।
- आ विवेश: 'आ' उपसर्ग के साथ 'विश्' धातु (लिट् लकार)। इसका अर्थ है—'सब ओर से प्रवेश किया'।
- रोदसी: (द्वितीया, द्विवचन) - आकाश और पृथ्वी (द्यावापृथिवी)।
- भूरिवर्पसा: 'भूरि' (बहुत) + 'वर्पस' (रूप/तेज)। अपने विशाल रूप या सामर्थ्य के साथ।
- धामभिः: (तृतीय, बहुवचन) - अपने विभिन्न स्थानों, रूपों या तेजपुंजों के द्वारा।
- कविः: (प्रथमा, एकवचन) - क्रान्तदर्शी या त्रिकालज्ञ (अग्नि का विशेषण)।
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे (ऋग्वेद 2.1.6)
- ऋग्वेद 2/1/6 इस ऋचा में भी अग्नि को असुर कहा गया है
- त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे ।
त्वं वातैररुणैर्यासि शंगयस्त्वं पूषा विधतः पासि नु त्मना ॥६॥पदच्छेद (Padachheda)त्वम् | अग्ने | रुद्रः | असुरः | महः | दिवः | त्वम् | शर्धः | मारुतम् | पृक्षः | ईशिषे ।
त्वम् | वातैः | अरुणैः | यासि | शंगयः | त्वम् | पूषा | विधतः | पासि | नु | त्मना ॥हिन्दी अनुवाद (Translation)हे अग्ने! (हे अग्निदेव!) त्वम् (आप) महो दिवः (महान् प्रकाशमान द्युलोक के) रुद्रः (दुष्टों को रुलाने वाले/दुःखनाशक) असुरः (प्राणदाता/शक्तिशाली) असि (हैं)। त्वम् (आप) मारुतं शर्धः (मरुतगणों के बल) पृक्षः (और अन्न) ईशिषे (के स्वामी हैं/ईश्वर हैं)।त्वम् (आप) शंगयः (सुखपूर्वक जाने वाले/सुख के दाता) अरुणैः वातैः (लाल रंग के वायुओं-वेगवान अश्वों के साथ) यासि (गमन करते हैं/विद्यमान हैं)। त्वम् (आप) पूषा (पुष्टि करने वाले/पोषणकर्ता) [असि] नु (निश्चित रूप से) विधतः (यज्ञ-अनुष्ठान करने वाले यजमानों की) त्मना (स्वयं) पाससि (रक्षा करते हैं)।भावार्थ: हे अग्निदेव! आप महान आकाश के तेजस्वी और रुद्र (भयानक/दुःखनाशक) शक्ति हैं। आप मरुद्गणों (वायुदेवों) की शक्ति और अन्न के स्वामी हैं। आप वायु के समान तीव्र और कल्याणकारी वेग से गमन करते हैं। आप पूषा (पोषण करने वाले) रूप में, यज्ञ करने वाले भक्तों की स्वयं रक्षा करते हैं।व्याकरण एवं शब्दार्थ (Grammar and Vocabulary)- त्वम् (Tvam): युष्मद् शब्द, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- अग्ने (Agne): अग्नि शब्द, सम्बोधन, एकवचन (हे अग्नि!)।
- रुद्रः (Rudraḥ): रुद्र (दुःखनाशक), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- असुरः (Asuraḥ): प्राणदाता/शक्तिशाली, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- महः (Mahaḥ): महद् (महान्/प्रकाशमान), दिवः (प्रकाशमान आकाश), षष्ठी/पंचमी विभक्ति एकवचन।
- शर्धः (Śardhaḥ): बल/समूह, प्रथमा विभक्ति, एकवचन (मारुतं शर्धः - मरुतों का बल)।
- पृक्षः (Pṛkṣaḥ): अन्न/बल, षष्ठी विभक्ति (पृक्ष ईशिषे - अन्न/बल के स्वामी)।
- ईशिषे (Īśiṣe): ईश् (ऐश्वर्य/स्वामी होना) धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (आप स्वामी हैं)।
- वातैः (Vātaiḥ): वात (वायु/वायु देवता), तृतीया विभक्ति, बहुवचन (वायुओं के साथ)।
- अरुणैः (Aruṇaiḥ): अरुण (लाल रंग के), तृतीया विभक्ति, बहुवचन (विशेषण: वातैः)।
- यासि (Yāsi): या (जाना) धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन= तुम जाते हो।
- शंगयः (Śaṅgayaḥ): सुखपूर्वक गमन करने वाले (शं + गयः), विशेषण।
- पूषा (Pūṣā): पोषण करने वाले (पूषन् शब्द), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- विधतः (Vidhataḥ): विध (यज्ञ करना) धातु से बना शब्द, षष्ठी विभक्ति, एकवचन (यज्ञ करने वाले का)।
- पाससि (Pāsi): पा (रक्षा करना) धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (रक्षा करते हैं)।
- त्मना (Tmanā): स्वयम्/आत्मना, तृतीया विभक्ति (स्वयं/
वैदिक साहित्य में "असुर" का अर्थ प्रारम्भ में ' प्राणवान्' और प्रज्ञावान् ही रहा है, जो बाद के समय में नकारात्मक अर्थों में प्रयुक्त होने लगा है।
इन्द्र के लिए असुर विशेषण पद का प्रयोग भी वैदिक है।- देखें निम्नलिखित ऋचा जो इन्द्र को असुर रूप में दर्शाती है।
तमु त्वा नूनमसुर प्रचेतसं राधो भागमिवेमहे ।
महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन् ॥ ऋग्वेद ८/९०/६
१. पदच्छेद (Word Breakup)
तम् (उस) उ (ही) त्वा (तुम्हें) नूनम् (अब) असुर (हे बलवान्/प्राणदाता) प्रचेतसं (प्रकृष्ट ज्ञान वाले/प्रबुद्ध) राधः (धन) भागम् (भाग/हिस्सा) इव (की तरह) ईमहे (हम याचना करते हैं/प्राप्त करना चाहते हैं) ।
मही (बड़ी/विशाल) इव (के समान) कृत्तिः (चर्म/कवच/ढाल) शरणा (शरण/रक्षक) ते (तुम्हारी) इन्द्र (हे इन्द्र) प्र (प्रकृष्ट) ते (तुम्हारे) सुम्ना (सुख/कृपा) नः (हमें/हमारे) अश्नवन् (व्याप्त हों/प्राप्त हों) ॥
मही (बड़ी/विशाल) इव (के समान) कृत्तिः (चर्म/कवच/ढाल) शरणा (शरण/रक्षक) ते (तुम्हारी) इन्द्र (हे इन्द्र) प्र (प्रकृष्ट) ते (तुम्हारे) सुम्ना (सुख/कृपा) नः (हमें/हमारे) अश्नवन् (व्याप्त हों/प्राप्त हों) ॥
२. हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
"हे असुर (प्राणदाता/बलवान्), प्रकृष्ट ज्ञान वाले (प्रचेतस्) इन्द्र ! हम 'उसी' तुम्हारी याचना (स्तुति) करते हैं, जैसे धन या भाग्य की याचना की जाती है। हे इन्द्र! तुम्हारी शरण उसी प्रकार महान् और रक्षक (कृत्तिः/ढाल) है, जैसे विशाल चर्म (ढाल) शरीर की रक्षा करती है। तुम्हारे कल्याणकारी सुख (सुम्न) हमें प्राप्त हों।"
सायण भाष्य के अंश " हे असुर बलवन् प्राणवन् हे इन्द्र य उक्तगुणोऽस्ति "
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वेदों (विशेषकर ऋग्वेद) में 'असुर' शब्द का प्रयोग शिव के वैदिक स्वरूप रुद्र के लिए भी कई स्थानों पर हुआ है, लेकिन यहाँ इसका अर्थ 'राक्षस' न होकर 'अत्यन्त शक्तिशाली', 'प्राणवान' या 'दैवीय गुणों से युक्त' जनसमुदाय से है।
वेदों में रूद्र के लिए प्रयुक्त असुर शब्द के प्रमुख सन्दर्भ निम्नलिखित हैं:
- ऋग्वेद- ऋग्वेद में रुद्र (शिव) को असुर और देव दोनों ही विशेषणों से सम्बोधित किया गया गया है। ऋग्वेद में रुद्र को (6) बार असुर के रूप में महिमामण्डित किया गया है।
- प्र सा क्षितिरसुर या महि प्रिय ऋतावानावृतमा घोषथो बृहत् ।
युवं दिवो बृहतो दक्षमाभुवं गां न धुर्युप युञ्जाथे अपः ॥व्याकरण सहित हिन्दी अनुवाद:पदच्छेद:
प्र, सा, क्षितिः, असुर, या, महि, प्रिय, ऋतावाना, ऋतम्, आ, घोषथः, बृहत् ।
युवम्, दिवः, बृहतः, दक्षम्, आभुवम्, गाम्, न, धुरि, उप, युञ्जाथे, अपः ॥पदार्थ (व्याकरणिक अर्थ):- प्र (प्र) : विशेष रूप से (उपसर्ग)
- सा (सा - तत्): वह (सर्वनाम)
- क्षितिः (क्षितिः): निवास स्थान/भूमि (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
- असुर (असुर): हे प्राणवान/बलशाली (सम्बोधन - मित्र और वरुण के लिए)
- या (या): जो (सर्वनाम)
- महि (महि): महान (विशेषण)
- प्रिय (प्रिय): प्यारी/प्रिय (विशेषण)
- ऋतावाना (ऋतावाना): सत्य के पालक/सत्यवान (सम्बोधन)
- ऋतम् (ऋतम्): सत्य/यज्ञ (द्वितीया विभक्ति)
- आ घोषथः (आ+घोषथः): आ (उपसर्ग) + घोषथः (घोष धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन) = विशेष रूप से शब्द करते हो/प्रख्यात करते हो
- बृहत् (बृहत्): बहुत/विशाल
- युवम् (युवम्): तुम दोनों (युष्मद् शब्द, प्रथमा, द्विवचन)
- दिवः (दिवः): द्युलोक से/प्रकाश से (पञ्चमी विभक्ति)
- बृहतः (बृहतः): महान/ऊँचे
- दक्षम् (दक्षम्): बल/सामर्थ्य (द्वितीया विभक्ति)
- आभुवम् (आभुवम्): सम्यक् प्रकार से होने वाला/सम्पन्न
- गाम् (गाम्): गाय/पृथ्वी (द्वितीया विभक्ति)
- न (न): के समान (उपमावाचक)
- धुरि (धुरि): धुरी पर (सप्तमी विभक्ति - भार वहन करने के अर्थ में)
- उप युञ्जाथे (उप+युञ्जाथे): उप (उपसर्ग) + युञ्जाथे (युज् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष, द्विवचन) = उपयोग में लाते हो/जोड़ते हो
- अपः (अपः): कर्म/कार्य (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन -
हिन्दी अनुवाद (भावार्थ)हे (ऋतावाना) सत्यपालक मित्र और वरुण! (असुर) हे बलशाली देवो! (या) जो (महि) महान (क्षितिः) भूमि/स्थान (प्रिय) आपको प्रिय है, उस (सा) प्रसिद्ध यज्ञ-भूमि को आप (बृहत्) बहुत ज्यादा (आ घोषथः) प्रख्यात/सुशोभित करते हैं।
(युवम्) तुम दोनों (बृहतः दिवः) महान प्रकाशमान आकाश से (आभुवम्) उत्तम (दक्षम्) सामर्थ्य/बल को लाते हो, और (गाम् न) बैल के समान (धुरि) धुरी पर (अपः) कर्मों/यज्ञ को (उप युञ्जाथे) नियुक्त करते हो।
- असुर का वैदिक अर्थ: वेदों के प्रारम्भिक काल में, असुर शब्द का प्रयोग अग्नि, वरुण, सूर्य और रुद्र जैसे देवताओं के लिए किया जाता था, जो 'असु' (प्राण) देने वाले या प्रज्ञा (ज्ञान) के स्वामी होते थे।
निष्कर्ष:
वेदों में शिव (रुद्र) के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग अत्यन्त दिव्य शक्ति (Mighty/Supreme Power) के सन्दर्भ में हुआ है, न कि नकारात्मक अर्थ में अत: सायण ने "असुर" शब्द को दो विरोधी अर्थों में प्रस्तुत किया है-
वेदों में शिव (रुद्र) के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग अत्यन्त दिव्य शक्ति (Mighty/Supreme Power) के सन्दर्भ में हुआ है, न कि नकारात्मक अर्थ में अत: सायण ने "असुर" शब्द को दो विरोधी अर्थों में प्रस्तुत किया है-
"को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति ।
भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत् ॥४॥
भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत् ॥४॥
| ← | ऋग्वेदः - मण्डल (१/१६४/४) उपर्युक्त इस ऋचा में असुर पद प्राणोंवाली आत्मा का वाची है। ____________ प्रसंग के अनुरूप वैदिक ऋचाओं में असुर का अर्थ "प्राण व प्रज्ञा से सम्पन्न व्यक्ति" के लिए ही अधिक मान्य है। परन्तु दशम मण्डल के कुछ उत्तरकालीन सूक्तो में असुर पद शक्ति के प्राचुर्य व भयंकरता के कारण दैत्यों का वाचक भी बन गया है। परन्तु ऋग्वेद में सायण ने इस अर्थ परिवर्तन क्रम को अनदेखा किया है। जो अनर्थ का कारण बना। |
विश- शब्द भी वैदिक ऋचाओं में प्रयुक्त है विशेषत: उपर्युक्त ऋचा में विश कृष्ण पक्ष के जन समुदाय का वाचक है। परन्तु इसका अर्थ तृतीय वर्ण के व्यक्ति वैश्य अथवा कृषि कर्म और गोपालन करने वाले के अर्थ को ध्वनित करता है। गोप ही ये सब कार्य (कृषि और गोपालन) करने वाले हैं।
समीक्षा-वेदों में विश' एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और प्राचीन शब्द है,और जो वैदिक सामाजिक संरचना का आधार स्तम्भ था। इसका अर्थ केवल साधारण जनसमूह ही नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सामाजिक इकाई से था जो वंश परम्परागत रूप से कृषि और गोपलन करती है अत: विश का अर्थ वैश्यवृत्ति( कृषि औक गोपालन) करने वाले गोपों से है।।
यह श्लोक पद्मपुराण (स्वर्गखण्ड -26) का है, जिसमें वैश्य वर्ण के लक्षण, आचरण और कर्तव्यों का वर्णन किया गया है।
पूर्ण श्लोक:-
विशत्याशु पशुभ्यश्च कृष्यादानरुचिः शुचिः ।वेदाध्ययनसम्पन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥
अर्थ:
विशत्याशु पशुभ्यश्च: जो पशुपालन (पशुओं की रक्षा और संवर्धन) से शीघ्र ही अपनी आजीविका चलाने वाला हो।
कृष्यादानरुचिः: जिसकी कृषि (खेती) और वाणिज्य (व्यापार-दान) में रुचि हो। शुचिः जो पवित्र (शौच-आचारपरायण) हो।वेदाध्ययनसम्पन्नः: जो वेदों के अध्ययन से संपन्न हो (शिक्षित हो)।
स वैश्य इति संज्ञितः: उसे 'वैश्य' कहा जाता है।
मुख्य विवरण:
वैश्य के कर्म: इस श्लोक के अनुसार वैश्य के मुख्य कर्म कृषि (खेती), पशुपालन और वाणिज्य (व्यापार) हैं।
गुण: वैश्य का 'शुचि' (पवित्र) होना और वेदों का ज्ञान रखना अनिवार्य बताया गया है।
यद्यपि विश गोपों को ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में सम्मिलित नहीं किया जा सकता है।
क्योंकि ये ब्रह्मा की सृष्टि नहीं हैं। तो भी इनके गोपालन और कृषि व्यवसाय परक होने से इन्हें विश कहा जाता रहा है।
वेदों में विश के मुख्य प्राचीन अर्थ निम्नलिखित हैं:
ऋग्वेद में 'विश' का प्रयोग सामान्य जनसमुदाय के लिए किया गया है, जो एक जन (कबीले) का हिस्सा होते थे।
वैश्य वर्ग पुरुषसूक्त (ऋग्वेद) के अनुसार, विश से ही वैश्य वर्ण की उत्पत्ति मानी गई है। वेदों में विश का अर्थ कृषि,और पशुपालन से सम्बंधित जन समुदाय से है जो समाज की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ होते थे।
बस्ती या ग्राम (Settlement/Village): विश' का एक अर्थ उस स्थान या बस्ती से भी है जहाँ लोग रहते थे, जिसे बाद में 'ग्राम' के रूप में जाना गया। यह ग्राम या कबीले का निवास स्थान होता था।
संस्कृत शब्द ग्राम का मूल अर्थ भी ग्रास भूमि( घास के मैदान) से ही है। जहाँ कालान्तर में गोप और उनके पशु स्थाई रूप से रहने लगे। और वह घास का मैदान ग्राम के रूप में रूढ़ हो गया जहाँ कृषक और उनके पशु रहते हैं।
प्रजा राजा या कबीले के नेता (जनस्य गोपा) के सन्दर्भ में, 'विश' का अर्थ उनकी प्रजा या सामान्य नागरिक होता था, जो राजा को कर (बल) देते थे।
वैदिक सामाजिक संरचना: ऋग्वैदिक काल में, समाज में 'जन' (कबीला) के बाद 'विश' सबसे महत्वपूर्ण इकाई थी। ऋग्वेद में 'विशाम्पति' शब्द का प्रयोग प्रजा के रक्षक या राजा के लिए किया गया
निष्कर्ष: वेदों में विश का अर्थ केवल जन विशेष ही नहीं, बल्कि एक उत्पादक, कृषि-पशुपालक वर्ग से है जो अपनी बस्ती में निवास करता था और कबीलाई व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक योगदान देता था। "विश-यह शब्द गोप जाति का समानार्थी व कृषि और गोपालन की गतिविधियों से सम्बन्धित जन समुदाय का वाचक रहा है।
विश" (Viś) शब्द का अर्थ "गोपालक" या "पशुपालक" मुख्य रूप से ऋग्वेद और अन्य वैदिक साहित्य में पाया जाता है।
वैदिक काल में "विश" शब्द के प्रयोग और संदर्भ के बारे में कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
मूल अर्थ: ऋग्वेद में "विश" का प्रयोग सामान्य जनमानस या प्रजा के लिए किया गया है। उस समय समाज मुख्य रूप से पशुपालक (Pastoral) था, इसलिए विश का संबंध सीधे तौर पर गौ-पालन और कृषि से था।
गोपालक के रूप में: वैदिक संस्कृत में "विश" का एक अर्थ "पशुपालक" या "गोपालक" (Cowherd) भी होता है, क्योंकि उस काल में धन और संपत्ति का मुख्य आधार पशुधन (विशेषकर गायें) ही थे।
सामाजिक संरचना: वैदिक काल में समाज के तीन मुख्य स्तर थे: ब्राह्मण (पुरोहित), क्षत्र (योद्धा) और विश (सामान्य जन, जिसमें किसान और गोपालक शामिल थे)। यही "विश" शब्द आगे चलकर "वैश्य" वर्ण का आधार बना, जिनका प्राथमिक कर्तव्य पशुपालन, कृषि और व्यापार था।
उपर्युक्त ऋचा में हम , विश, द्रप्स , कृष्ण, शचि, और बृहस्पति आदि पदों के आधार पर कृष्ण के वैदिक और पौराणिक काल की विवेचना अथवा समीक्षा करेंगे हमारी यह प्रतिक्रिया सायण भाष्य के सापेक्ष होगी !
सायण के भाष्य की समीक्षा-
समीक्षात्मक पद-१- (द्रप्स)- नि:सन्देह सायण ने अपने वैदिक ऋचाओं के भाष्य में "द्रप्स" पद का वैकल्पिक व आनुमानित अर्थ ही ग्रहण किया हैं।
परन्तु हमारी जानकारी और शोधों के अनुसार "द्रप्स" पद भारोपीय परिवार की भाषाओं में अंग्रेज़ी शब्द (Drops)के समानार्थी है। जिसका अर्थ "जल-बिन्दु" होता है। वैदिक संस्कृत में भी द्रप्स पद जल बन्दु का ही अर्थ प्रकाशक है।
अत: द्रप्स पद का रूढ़ अर्थ ही ग्रहण करना चाहिएसमीक्षात्मक पद- (अंशुमती)- अंशुमती पर सायण का भाष्य भी अभिधा शब्द शक्ति मूलक है। रूढ़ अर्थ युक्त नहीं है जोकि वैदिक कथाओं के अनुरूप होना चाहिए था। पुराण वेदों की ही व्याख्याऐं हैं- पुराणों में अंशुमती पद यमुना नदी का वाचक व उसके लिए ही रूढ़ है। क्योंकि वह सूर्य की पुत्री बतायी जाती है। यमुना नदी को अंशुमति (और मुख्य रूप से सूर्यसुता, कहने के पीछे पौराणिक और धार्मिक कारण हैं, जो यमुना नदी को सूर्य देव से जोड़ते हैं:
सूर्य देव की पुत्री यमुना - पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यमुना सूर्य देव और संज्ञा की पुत्री हैं। अंशु का अर्थ 'किरण' होता है और अंशुमति का अर्थ 'किरणों वाली' या 'सूर्य की पुत्री' के रूप में लिया जाता है, जो सीधे सूर्य देव से उनके सम्बन्ध को दर्शाता है।
समीक्षात्मक पद "कृष्ण--उपर्युक्त ऋचा में आया हुआ कृष्णपद भी लाक्षणिक शब्द शक्ति मूलक है। कृष्ण का धातुज अर्थ "कर्षण- अर्थात(कृषि -कार्य करने वाला अथवा आकर्षण करने वाला" ही है। और कृषि करने वाले कृषक भी जलवायु और उष्णता के प्रभाव से श्याम वर्ण( साँवले रंग ) के ही होते हैं। और पौराणिक पात्र कृष्ण भी श्यामल (साँवले) रंग के थे जो यमुना की तलहटी में प्राय: गायें चराया करते थे ।
समीक्षात्मक पद- इन्द्र और शचि-इन्द्र और शचि भी दोनों पति- पत्नी के रूप में पौराणिक पात्र हैं जो उपर्युक्त ऋचा में प्रयुक्त हुए हैं। इन्द्र एक पौराणिक पात्र है वेदों में भी एक देव विशेष का नाम इन्द्र है जो कृष्ण का प्रतिद्वन्द्वी है। अत: उपर्युक्त ऋचा में इन्द्र का वही अर्थ ग्रहण करना चाहिए जो पौराणिक ग्रन्थों में ग्रहण किया जाता है। और बृहस्पति इन्द्र के गुरु भी पौराणिक पात्र ही हैं।
ऋग्वेद में कृष्ण और इन्द्र सम्बन्धी युद्ध की विवेचना विस्तृत रूप से हम अपने सम्यक भाष्य के रूप निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत करते हैं।
"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियान: कृष्णो दशभि: सहस्रै: आवत्तमिन्द्रःशच्याधमन्तमपस्नेहितीर्नृमणा अधत्त॥१३॥
ऋग्वेद_८/९६/१३/अथर्ववेद-(20/137/7)
(इयानः)= चलता हुआ (अंशुमतीम्)= विभागवाली [सीमावाली यमुना नदी पर (अव अतिष्ठत्)= ठहरा है। (नृमणाः)= नरों के समान मनवाले (इन्द्रः) =इन्द्र ने (तम् धमन्तम्)= उस हाँफते अथवा हुँकारते हुए को (शच्या)= शचि के साथ (आवत्)= युद्ध किया और (स्नेहितीः)= स्नेहयुक्त (सिञचन करने वाला /भीगे हुए) (अप अधत्त)= हटा लिया है ॥१३॥
टिप्पणी:-
(धमन्तम्)= उच्छ्वसन्तम्। परिश्रमेण दीर्घं श्वसन्तम्= थकान के द्वारा लम्बी- लम्बी श्वास लेता हुआ। (स्नेहितीः) = सिञ्चन करने वाला।
(नृमणाः) नेतृतुल्यमनस्कः= नेत्रों के समान (अप अधत्त) = उपहार दत्तवान् ।
पद का अन्वय= अव । द्रप्सः । अंशुऽमतीम् । अतिष्ठत् । इयानः । कृष्णः । दशऽभिः । सहस्रैः ।आवत् । तम् । इन्द्रः । शच्या । धमन्तम् । अप । स्नेहितीः । नृऽमनाः । अधत्त ॥१३।
शब्दार्थ व व्याकरणिक विश्लेषण- १-अव= तुम रक्षा करो लोट्लकर मध्यम पुरुष एकवचन।
२-द्रप्स:= जल से द्रप्स् का पञ्चमी एकवचन यहाँ करण कारक के रूप में ।
३- अंशुमतीम् = यमुनाम् –यमुना को अथवा यमुना के पास द्वितीया यहाँ करण कारक के रूप में ।
४-अवतिष्ठत् = अव उपसर्ग पूर्वक (स्था धातु का तिष्ठ आदेश लङ्लकार रूप) =स्थित हुए।
५- इन्द्र: शच्या -स्वपत्न्या= इन्द्र: पद में प्रथमा विभक्ति एकवचन कर्ता करक तथा शच्या में शचि के तृत्तीया विभक्ति करणकारक का रूप शचि इन्द्र: की पत्नी का नाम है यह सर्व विदित है।
६-धमन्तं=अग्निसंयोगम् कुर्वन्तं कोलाहलकुर्वन्तंवा। चमकते हुए को अथवा हल्ला करते हुए को। (ध्मा धातु का धम आदेश तथा +शतृ(अत्) प्रत्यय कर्मणि द्वित्तीया का रूप एक वचन धमन्तं कृष्ण का विशेषण है ।
७-अप स्नेहिती: = जल में भीगते हुए का।
८-नृमणां( धनानां)
९-अधत्त= उपहार या धन दिया ।(डुधाञ् (धा)=दानधारणयोर्लङ्लकारे आत्मनेपदीय अन्यपुरुषएकवचने)
अब देखा जाए तो अथर्ववेद में भी ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा निम्न क्रम में है। जिसमें "अदेवी" पद कृष्ण के लिए ही है। जो कभी देवों की सर्वोपरिता स्वीकार नहीं करता है।
विशेषटिप्पणी- यद्यपि संस्कृत लौकिक साहित्य में "अव" धातु के अनेक अर्थ विकसित हुए हैं- जो ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा "अव द्रप्सो..... में आया हआ
अव क्रियापद- प्राप्त करो" के अर्थ में है।
"अव" धातु के लौकिक संस्कृत भाषाओं में अनेक अर्थ विकसित हुए हैं-
अव् – एक परस्मैपदीय धातु है और धातुपाठ में इसके अनेक अर्थ हैं ।
१०-अव्=१- रक्षण २-गति ३-कान्ति ४-प्रीति ५-तृप्ति ६-अवगम (प्राप्ति) ७-प्रवेश ८-श्रवण ९- स्वाम्यर्थ १०-याचन ११-क्रिया। १२ -इच्छा १३- दीप्ति १४-अवाप्ति १५-आलिङ्गन १६-हिंसा १७-दान १८-वृद्धिषु।
परन्तु हमें प्रकरणअथवा प्रसंग के अनुरूप ही यहाँ अव धातु का अर्थ ग्रहण करना चाहिए । यहाँ अव धातु का अर्थ- "प्राप्त करना" है
प्रथम पुरुष एक वचन का लङ् लकार(अनद्यतन भूूूतकाल का रूप।
आवत् =प्राप्त किया ।
गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि अपने उपर्युक्त ऋचा संख्या (१३) का भाष्य का विस्तार करते हुए कहते हैं-
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अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियान: कृष्णो दशभि: सहस्रै: आवत्तमिन्द्रःशच्याधमन्तमपस्नेहितीर्नृमणा अधत्त॥१३॥
ऋग्वेद_८/९६/१३/
योगेश रोहि का भाष्य-
कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन् अँशुमतीनामधेयाया नद्या: यमुनाया: तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।
"
अनुवाद-
कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं अशुमती अथवा यमुना के तट पर स्थित कृष्ण नाम से प्रसिद्ध उस गोप को इन्द्र ने यमुना नदी के जल में स्थित देखा वह इन्द्र अपनी पत्नी शचि के साथ आया हुआ है- और दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप धन भी दिया।१३।
तात्पर्य-- हे कृष्ण आप यमुना के तट पर स्थित इस जल के रक्षा करने वाले हैं आप इसकी रक्षा करो ! कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं। इन्द्र ने अपनी पत्नी शचि के साथ अग्नि से संयोजित होते हुए अर्थात् दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप धन दिया।
"कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन् अँशुमतीनामधेयाया नद्या यमुनाया वा तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।
१. हिन्दी अनुवाद
दस हजार गोपों (ग्वालों) से घिरे हुए श्रीकृष्ण यमुना नदी के तट पर स्थित अँशुमती नामक नदी अथवा यमुना के किनारे ठहरे थे। वहां कृष्ण के नाम से प्रसिद्ध उस गोप (कृष्ण) को नदी के जल के बीच स्थित (बैठा हुआ) इन्द्र ने देखा। इन्द्र ने अपनी पत्नी शची के साथ आकर जल के बीच उस स्नेही (या स्निग्ध/शान्त) जलाभिषिक्त गोप कृष्ण और उनके अनुचर (साथी) उपगोपों को बहुत सारा धन दिया।
२. व्याकरण सहित विश्लेषण
वाक्य १: कृष्णो दशसहस्रैर्गोपैर्परिवृत: सन् अँशुमतीनामधेयाया नद्या: यमुनाया: तटेऽतिष्ठत्
- कृष्णो (कृष्ण:): कर्ता (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)।
- दशसहस्रैर्गोपै: (दशसहस्रै: + गोपै:): तृतीया विभक्ति, बहुवचन (करण कारक - गोपों के द्वारा)।
- परिवृत: सन्: परिवृत (घिरे हुए) + सन् (होकर) - यह वर्तमान कालिक कृदन्त का प्रयोग है।
- अँशुमतीनामधेयाया (अँशुमती + नामधेयाया:): षष्ठी विभक्ति, एकवचन (नदी का विशेषण)।
- नद्या: यमुनाया:: षष्ठी विभक्ति, एकवचन (सम्बन्ध कारक)।
- तटेऽतिष्ठत् (तटे + अतिष्ठत्): 'तटे' (अधिकरण कारक - तट पर), 'अतिष्ठत्' (स्था धातु, लङ् लकार/भूतकाल, प्रथम पुरुष, एकवचन - ठहरे थे)।
वाक्य २: तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये स्थितं इन्द्रो ददर्श
- तत्र: अव्यय (वहां)।
- कृष्णस्य नाम्न:: षष्ठी विभक्ति (नाम से प्रसिद्ध)।
- तम गोपं: द्वितीय विभक्ति, एकवचन (कर्म कारक)।
- नद्यार्जलेमध्ये (नद्या: + जले + मध्ये): षष्ठी और अधिकरण कारक का प्रयोग (नदी के जल के बीच में)।
- स्थितं: द्वितीया विभक्ति (स्थित/बैठे हुए, गोपं का विशेषण)।
- इन्द्रो (इन्द्र:): कर्ता (प्रथमा विभक्ति)।
- ददर्श: दृश् धातु, लिट् लकार/परोक्ष भूतकाल, प्रथम पुरुष, एकवचन (देखा)।
वाक्य ३: स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्
- स इन्द्र:: तच्छब्द (वह), इन्द्र (प्रथमा, एकवचन)।
- स्वपत्न्या शच्या: तृतीया विभक्ति, एकवचन (सहार्थे तृतीया - पत्नी के साथ)।
- सार्धं: अव्यय (साथ)।
- आगत्य: आ + गम् + ल्यप् प्रत्यय (आकर)।
- जले स्निग्धे: अधिकरण कारक (जल में)। 'स्निग्धे' यहाँ स्निग्ध/स्नेहपूर्ण के अर्थ में है।
- तम गोपं कृष्णं: द्वितीया विभक्ति (कर्म कारक)।
- तस्यानुचरानुपगोपाञ्च (तस्य + अनुचर + उपगोपान् + च): षष्ठी (उसके) + द्वितीया, बहुवचन (साथी गोपों को) + अव्यय (और)।
- अतीवानि धनानि: विशेषण + विशेष्य (बहुत सारा धन - द्वितीया, बहुवचन)।
- अदात्: दा (धातु) + लङ् लकार/भूतकाल, प्रथम पुरुष, एकवचन (दिया)।
मुख्य व्याकरण बिन्दु:
- सन्धि: तटेऽतिष्ठत् (तटे + अतिष्ठत् - पूर्वरूप संधि), नद्यार्जलेमध्ये (नद्या: + जले - विसर्ग संधि का लोप/परिवर्तन), तस्यानुचरानुपगोपाञ्च (अनुचरान् + उपगोपान् + च - अनुस्वार/चत्व संधि)।
- प्रत्यय: आगत्य (आ + गम + ल्यप् - 'आकर' अर्थ में)।
- समास: दशसहस्रैर्गोपै: (बहुव्रीहि/तत्पुरुष), अँशुमतीनामधेयाया: (बहुव्रीहि), अनुचरानुपगोपान् (द्वन्द्व)।
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द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥
पद का अन्वय= द्र॒प्सम् । अ॒प॒श्य॒म् । विषु॑णे । चर॑न्तम् । उ॒प॒ऽह्व॒रे । न॒द्यः॑ । अं॒शु॒ऽमत्याः॑ ।
नभः॑ । न । कृ॒ष्णम् । अ॒व॒त॒स्थि॒ऽवांस॑म् । इष्या॑मि । वः॒ । वृ॒ष॒णः॒ । युध्य॑त । आ॒जौ ॥१४।।
द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥ ऋग्वेद ८/९६/१४
योगेश रोहि का भाष्य-
मया खलु यमुनाजलस्य विविधानि रूपाणि दृष्टानि, तथैव अञ्शुमत्याः निर्जने प्रदेशे चरन् एको वृषभोऽपि दृष्टः। अहं तं वृषभं युध्यन्तं कृष्णेन सह द्रष्टुम् इच्छामि। अर्थात् सो वृषभः स्थान-अडिग-स्थित-कृष्णेन सह युद्धं करोतु, एतादृशं मया वाञ्छितम्। सः स्थानो यत्र जलम् मेघश् च न भवेत् (इन्द्रः कृष्णस्य शक्तिमापनार्थम् एतत् इच्छति)।"
इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए एक बैल अथवा साँड़ को भी देखा और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं कृष्ण के साथ देखना चाहूँगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़ हुए कृष्ण से युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा। वह स्थान जहाँ जल और- (नभ) बादल भी न हो (अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह सब इच्छा जाहिर करता है )।१४।
को दर्शाते हुए गद्यांश है।"
व्याकरणिक विश्लेषण:
- मया - (अस्मद् शब्द, तृतीया विभक्ति, एकवचन) - कर्ता के अर्थ में =मेरे द्वारा।
- यमुनाजलस्य - (षष्ठी तत्पुरुष समास) - यमुना के जल का।
- विविधानि रूपाणि - (विशेषण-विशेष्य) - विविध रूप (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन)।
- अंशुमत्याः - (पञ्चमी/षष्ठी विभक्ति) - यनुनानदी का ।
- निर्जने प्रदेशे - (विशेषण-विशेष्य, सप्तमी विभक्ति) - निर्जन स्थान पर।
- चरन् - (शतृ प्रत्यय) - चरता हुआ।
- द्रष्टुम् - (दृश् धातु + तुमुन् प्रत्यय) - देखने के लिए।
- युध्यन्तं - (युध् धातु + शतृ प्रत्यय) - युद्ध करते हुए को।
- अडिग-स्थित-कृष्णेन - (तृतीया तत्पुरुष) - स्थिर कृष्ण के द्वारा।
व्याख्या:
इन्द्र अंशुमती नदी के तट पर निर्जन स्थान पर एक उग्र वृषभ को देखकर, कृष्ण की अद्भुत शक्ति को मापने के लिए, उन्हें निहत्थे और एक स्थान पर अडिग रहकर उस साँड से युद्ध करने की चुनौती देने की कामना करते हैं। यह भगवान कृष्ण के पराक्रम को सिद्ध करने का दृश्य है।
इन्द्र अंशुमती नदी के तट पर निर्जन स्थान पर एक उग्र वृषभ को देखकर, कृष्ण की अद्भुत शक्ति को मापने के लिए, उन्हें निहत्थे और एक स्थान पर अडिग रहकर उस साँड से युद्ध करने की चुनौती देने की कामना करते हैं। यह भगवान कृष्ण के पराक्रम को सिद्ध करने का दृश्य है।
पदों के हिन्दी अनुवाद सहित अर्थ-
विषुण=विभिन्न रूप।
३-वृ॒ष॒णश्चर॑न्तम्= चरते हुए साँड को।
४-आजौ = संग्रामे = युद्ध में।
५-अ॒व॒ = उपसर्ग
६- त॒स्थि॒ऽवांस॑म्= तस्थिवस् शब्द का द्वितीया विभक्ति एकवचन का रूप तस्थिवांसम् है । तस्थिवस्= स्था--क्वसु स्थितवति (स्थिर)= अडिग अथवा जो एक ही स्थान पर खड़ा होते हुए है उस स्थिति में।
७-व:= युष्मभ्यम् । युष्माकम् । यष्मच्छब्दस्य द्बितीया चतुर्थी षष्ठी बहुवचनान्तरूपोऽयम् इति व्याकरणम् = युष्मान् - तुम सबको । ॥
८-उपह्वरे= निर्जन देशे।
९-वृ॒ष॒णः॒ = साँड ने ।
१०-युध्य॑त= युद्ध करते हुए।
११-आजौ= युद्ध में ।
१२-इष्या॑मि= मैं इच्छा करुँगा।।।१४।
हिन्दी अर्थ-इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए एक बैल अथवा साँड़ को भी देखा और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं कृष्ण के साथ देखना चाहूँगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़ हुए कृष्ण से युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा। वह स्थान जहाँ जल और- (नभ) बादल भी न हो
(अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह सब इच्छा जाहिर करता है )।१४।
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शब्दार्थ व्याकरणिक विश्लेषण-
१-द्र॒प्सम्= जल को -कर्मकारक द्वित्तीया विभक्ति।अपश्यम्=अदर्शम् -दृश् धातु का लङ्लकार (सामान्य भूतकाल ) क्रिया पदरूप - मैंने देखा ।
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२- वि + सवन(सुन) रूप विषुण =(विभिन्न रूप)। षु (सु)= प्रसवऐश्वर्ययोः - परस्समैपदीय सवति सोता [ कर्मणि- ] सुषुवे सुतः सवनः सवः अदादौ (234) सौति स्वादौ षुञ् अभिषवे (51) सुनोति (911) सूनुः, पुं, (सूयते इति । सू + “सुवः कित् ।” उणादिसूत्र्र ३।३५। इति (न:) स:च कित् ) पुत्त्रः । (यथा, रघुः । १ । ९५ ।
“सूनुः =सुनृतवाक् स्रष्टुः विससर्ज्जोदितश्रियम् ) अनुजः । सूर्य्यः । इति मेदिनी ॥ अर्कवृक्षः । इत्यमरः कोश ॥
व्याकरणिक निर्देश-
षत्व विधान सन्धि :-"विसइक्कु हयण्सि षत्व" :- इक् स्वरमयी प्रत्याहार के बाद 'कु(कखगघड•) 'ह तथा यण्प्रत्याहार ( य'व'र'ल) के वर्ण हो और फिर उनके बाद 'स'आए तो वहाँ पर 'स'का'ष'हो जाता है:- यदि 'अ' 'आ' से भिन्न कोई स्वर जैैैसे इ उ आदि हो अथवा 'कवर्ग' ह् य् व् र् ल्' के बाद तवर्गीय 'स' उष्म वर्ण आए तो 'स' का टवर्गीय मूर्धन्य 'ष' ऊष्म वर्ण हो जाता है ।
शर्त यह कि यह "स" आदेश या प्रत्यय का ही होना चाहिए जैसे :- दिक् +सु = दिक्षु । चतुर् + सु = चतुर्षु। हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु । मातृ + सु = मातृषु । परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है
परन्तु अ' आ 'स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 'हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु । वि+सम=विषम । वि+सुन =विषुण अथवा विष्+ उणप्रत्यय=विषुण।__________________________
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
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योगेश कुमार रोहि का भाष्य-
इस प्रसंग का संस्कृत अनुवाद और व्याकरणिक विश्लेषण नीचे दिया गया है:
संस्कृत अनुवाद:
"कृष्णो यमुनायाः (अंशुमत्याः) गर्भे जलस्याधः स्वकीयं देदीप्यमानं शरीरं धारयामास, यः स्वगोपानां विशाम् (वैश्यवृत्तिसम्पन्नानां) सखा आसीत्। परितः चरन्तीभिर् गौभिः सह निवसन्तः ते गोपाः इन्द्रेण बृहस्पतेः साहाय्येन शिशासिषाञ्चक्रे।"
व्याकरणिक टिप्पणी:
- देदीप्यमानं शरीरम्: 'दीप्' धातु में यङ्-प्रत्यय (बार-बार चमकने के अर्थ में) लगाकर 'देदीप्यमान' शब्द बनता है। यह 'शरीरम्' का विशेषण है।
- धारयामास: 'धृ' धातु (धारण करना) का लिट् लकार (परोक्ष भूतकाल) है।
- विशाम्: 'विश्' शब्द का षष्ठी बहुवचन, जिसका अर्थ प्रजा या वैश्य वृत्ति[ गोपालन व कृषि करने] वाले लोग होता है।
- चरन्तीभिः गौभिः सह: 'सह' के योग में तृतीया विभक्ति (गौभिः) का प्रयोग हुआ है। 'चरन्तीभिः' यहाँ विशेषण है।
- शिशासिषाञ्चक्रे -(śiśāsiṣāñcakre) का अर्थ है— "शासन करने की इच्छा की"।यह शब्द 'शास्' (शासन करना/उपदेश देना) धातु से बना है। इसकी व्याकरणिक संरचना इस प्रकार है:
- धातु: शास् (śās) - शासन करना, उपदेश देना या अनुशासित करना।
- प्रत्यय: सन् (san) - यह प्रत्यय 'इच्छा' के अर्थ में जोड़ा जाता है। 'शास् + सन्' मिलकर 'शिशासिष्' बनता है, जिसका अर्थ है 'शासन करने की इच्छा'।
- लकार: लिट् लकार (Lit Lakara) - यह परोक्ष भूतकाल (जो आँखों के सामने न हुआ हो) को दर्शाता है।
- रूप: यह आत्मनेपद, प्रथम पुरुष, एकवचन का रूप है।
अर्थ-कृष्ण ने अंशुमती के जल के नीचे अपने दैदीप्यमान शरीर को अशुमती नदी( यमुना) की गोद में धारण किया जो इनके गोपों - विशों (गोपालन आदि करने वाले -वैश्यवृत्ति सम्पन्न) सहचर( साथी) थे । चारों ओर चलती हुई गायों के साथ रहने वाले गोपों को इन्द्र ने बृहस्पति की सहायता से शासन में करना चाहा।
पदपाठ-विच्छेदन :-
द्रप्स:। अंशुऽमत्याः। उपऽस्थे ।अधारयत् । तन्वम् । तित्विषाणः। विशः। अदेवीः । अभि । आऽचरन्तीः। बृहस्पतिना। युजा । इन्द्रः। ससहे॥१५।
शब्दार्थ-
“अध =अथ अधो वा = नीचे ।
“द्रप्सः= द्रव्य अथवा जल बिन्दु: ( Drops)
“अंशुमत्याः=यमुनाया: नद्याः = यमुना नदी के “(उपस्थे=समीपे) पास में अथवा गोद में।
“त्विष धातु =दीप्तौ अर्थे = त्विष् धातु का अर्थ- चमकना है।
तित्विषाणः= दीप्यमानः= चमकता हुआ।
सन् =भवन्= होता हुआ।
“तन्वम् द्वितीया कर्मणि वैदिके रूपे = शरीरम्
“(अधारयत् = शरीर धारण किया)।
परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् = बल प्राप्ति के लिए अपने शरीर को आहार आदि से पोषित( पुष्ट) किया।
“इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा =सहायेन = इन्द्र ने जाकर बृहस्पति के साथ “अदेवीः = देवानाम् ये न पूजयन्ति इति अदेवी:। कृष्णरूपा इत्यर्थः = जो देवताओं को नहीं पूजता वह कृष्ण ।१५।
यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः = अथवा पाप युक्त “आचरन्तीः =आगच्छन्तीः= चलती हुईं। “विशः=गोपालका: = कृषि कर्म और गोपालन करने वाले "अभि "ससहे षह् (सह्) लिट्लकार (अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) । शक्यार्थे =चारो और से सख्ती की अथवा शासन किया ।
सह्- सह्यति विषह्यति ससाह सेहतुः सिसाहयिषति सुह्यति सुषोह अधेः प्रसहने (1333) इत्यत्र सह्यतेः सहतेर्वा निर्देश इति
विशेष-
पुराणों में भी कृष्ण समस्त देवों के यज्ञों को बन्द करा देते हैं। क्योंकि उन यज्ञों में निरीह पशुओं का वध होता है। जो विशेष रूप से इन्द्र देव को लक्ष्य करके किए जाते हैं।
इसी सन्दर्भ में हम यह भी सुनिश्चित कर दें की कृष्ण को वैदिक ऋचाओं में असुर कहीं नहीं कहा गया है। ऋग्वेद की मूल ऋचा में उपस्थित अदेवी पद का की सायण ने भाष्य "असुर" के समानार्थक किया है। उसी को आधार मान कर वेदों का हिन्दी अनुवाद पढ़ने वाले जन- साधारण ने कृष्ण को असुर मान लिया है।
सारांश=असुर शब्द का प्रयोग तो कृष्ण के लिए सायण ने अपने भाष्य में ही किया है । अन्यथा मूल ऋचा में असुर पद न. होकर अदेव पद है जैसा हम पूर्व में बता चुके हैं ।
परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों को कहा गया है ।
इसी कारण सायण आचार्य ने कृष्ण को अपने
ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या (96) की कुछ ऋचाओं के भाष्य में अदेवी: पद के आधार पर (13,14,15,) में कृष्ण को असुर अथवा "अदेव कहकर कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ ऐसा वर्णित है। सायण का सम्पूर्ण भाष्य इस अदेवी पद को लेकर भ्रान्तिजनक है।
परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ "प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों से है। इन्द्र, वरुण और शिव को भी वेदों में असुर कहा गया है।
अतः उपर्युक्त ऋचा के अनुसार स्पष्ट हुआ कि कृष्ण यमुना की तलहटी में इन्द्र से युद्ध करते हैं। और यह बात वैदिक सत्य है। किन्तु श्रीकृष्ण तो वैदिक काल से भी प्राचीन हैं।
नीचे स्पष्ट रूप से ऋग्वेद के अतिरिक्त अथर्ववेद ,शौनक संहिता , और सामवेद आदि में कृष्ण का स्पष्ट उल्लेख है।
"यःकृ॒ष्णः के॒श्यसु॑र स्तम्ब॒ज उ॒त तुण्डि॑कः। अ॒राया॑नस्या मु॒ष्काभ्यां॒ भंस॒सोऽप॑ हन्मसि॥"
(अथर्ववेद - काण्ड »8; सूक्त»6; ऋचा»5)
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१. ( यः कृष्ण:) = जो कृष्ण,२-(केशी) = केशी नामक ३- (असुरः) =दैत्य ४-(स्तम्बजः) जिसके केश गुच्छेदार हैं = ५-(उत) = और ६- (तुण्डिक:) = कुत्सित मुखवाला है / थूथनवाला है। ७-(अरायान्) = निर्धन पुरुषों को ८-(अस्याः) = इस के ९-(मुष्काभ्याम्) = मुष्को से-अण्डकोषों से तथा १०-(भंसस:)भसत् कटिदेशः पृषो० । उपचारात् तत्सम्बन्धिनि पायौ ऋ० १० । १६३ । = कटिसन्धिप्रदेश से ११- (अपहन्मसि) = दूर करते हैं।
"अनुवाद:- जो कृष्ण केशी दैत्य के गुच्छे दार केशों और उसके विकृत मुख उसके अण्डकोशों तथा इसकी कटि (कमर)आदि भागों से निर्धन लोगों दूर करते हैं अर्थात उनकी रक्षा करते हैं-
उपर्युक्त ऋचा में वर्णन है कि कृष्ण केशी दैत्य के गुच्छे दार केशों और उसके विकृत मुख और अण्डकोशों तथा कटि प्रदेश (कमर,)आदि के स्पर्श से गरीब अथवा निर्धन लोगों को तथा स्वयं को भी दूर करते हैं।
भागवत पुराण में दशम स्कन्ध, अध्याय (36), श्लोक (16-26) तथा अध्याय (37), श्लोक (1-9)में वर्णन है कि "कृष्ण-भगवान का अत्यन्त कोमल कर(हाथ) कमल भी उस समय ऐसा हो गया, मानो तपाया हुआ लोहा हो।
उसका स्पर्श होते ही केशी के दाँत टूट-टूटकर गिर गये और जैसे जलोदर रोग उपेक्षा कर देने पर बहुत बढ़ जाता है, वैसे ही श्रीकृष्ण का भुजदण्ड उसके मुँह में बढ़ने लगा।
अचिन्त्यशक्ति भगवान श्रीकृष्ण का हाथ उसके मुँह में इतना बढ़ गया कि उसकी साँस के भी आने-जाने का मार्ग न रहा। अब तो दम घुटने के कारण वह पैर पीटने लगा।
अथर्ववेद (दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व) में संकलित है जिसमें , केशी,="बालों (केशों)वाले", दैत्य का कृष्ण के साथ युद्ध होते हुए पहली बार वर्णन किया गया है
अर्जुन द्वारा भगवत गीता में भी कृष्ण को तीन बार केशी का हत्यारा कहा गया है- केशव (1.30 और 3.1) और केशी-निषूदन (18.1)। पहले अध्याय (1.30) में, कृष्ण को केशी के हत्यारे के रूप में सम्बोधित करते हुए, अर्जुन युद्ध के बारे में अपना संदेह व्यक्त करते हैं।
ऋग्वेद १/१०/३/ तथा यजुर्वेद ८/३४ में केशिन् का वर्णन है ही है ।
"युक्ष्वा हि केशिना हरी वृष॑णा कक्ष्यप्रा ।
अथा॑ न इन्द्र सोमपा गिरामुप॑श्रुतिं चर ।। 3.।।
पदों का अन्वयार्थ:-
युक्ष्वा हि= संयुक्त ही होओ। केशिना= केशी दैत्य के संहारक अथवा सुन्दर केशों वाले के द्वारा । हरी = हरि भगवान कृष्ण के द्वारा। वृषणा= वृषणों के द्वारा। कक्ष्यप्रा= काँछ के साथ। अथा= और। इन्द्र= इन्द्र। सोमपा= सोमपा। नः= हमारी।गिरामुप॑श्रुतिं= सुनी हुई वाणी को । चर = दूत ।
"अनुवाद:- केशी दैत्य का बध करने वाले हरि के साथा जुड़ जाओ ! जिसने केशी दैत्य के अण्डकोष और काँख पकड़ कर फैंक दिया। हे सोमपान करने वाले इन्द्र ! हमारी सुनी हुई स्तुतिगीत को कृष्ण तक दूत के रूप में पहुचाऐं।३।
_____________
कृष्ण अवतरण की भविष्यवाणी वेद में भी प्राप्त होती है।****
अब पुनः बात करते हैं यजुर्वेद » अध्याय:-32» ऋचा (5) की जो इस प्रकार है-
"यस्मा॑ज्जा॒तं न पु॒रा किं च॒नैव य आ॑ब॒भूव॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। प्र॒जाप॑तिः प्र॒जया॑ सꣳररा॒णस्त्रीणि॒ ज्योती॑षि सचते॒ स॒ षो॑ड॒शी ॥५ ॥
पद पाठ-
यस्मा॑त्। जा॒तम्। न। पु॒रा। किम्। च॒न। ए॒व। यः। आ॒ब॒भूवेत्या॑ऽऽ ब॒भूव॑। भुव॑नानि। विश्वा॑ ॥ प्र॒जाऽप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। प्र॒जया॑ स॒ꣳर॒रा॒ण इति॑ सम्ऽररा॒णः। त्रीणि॑। ज्योती॑षि। स॒च॒ते॒। सः। षो॒ड॒शी ॥५ ॥
पदों के अर्थ और अन्वय- को देखा जाए तो कुछ इस प्रकार से होगा "हे मनुष्यो ! (यस्मात्)= जिस से (पुरा) =पहिले (किम्, चन)= कुछ भी (न जातम्)= नहीं उत्पन्न हुआ, (यः)= जो (आबभूव)=उत्पन्न हुआ जिसमें (विश्वा)= सब (भुवनानि)= लोक वर्त्तमान हैं, (सः एव)= वही (षोडशी)= सोलह कलावाला (प्रजया)= प्रजा के साथ (सम्, रराणः)= सम्यक् रूप रमता हुआ (प्रजापतिः) प्रजा का पालक अधिष्ठाता (त्रीणि) तीन (ज्योतीषिं)=ज्योतियों को{ अर्थात देवत्रय- ब्रह्मा विष्णु और महेश इन तीनों को (सचते)= संयुक्त करता है / जोड़ता है ॥५॥
"अनुवाद:- हे मनुष्यों जिससे पहले कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ। जिससे सम्पूर्ण विश्व और सभी लोक उत्पन्न हुए वही ईश्वर( स्वराट्- विष्णु) ! सोलह कलाओं से युक्त प्रजा के साथ आनन्द करता हुआ। प्रजा पालक रूप में तीन ज्योतियों में जुड़ता है।
वस्तुत उपर्युक्त वैदिक ऋचा गोपेश्वर श्रीकृष्ण के अवतरण की भविष्यवाणी करती है।
पुराणों के अनुसार कृष्ण सोलह कलाओं से भी युक्त थे। इस बात का संकेत हमें वेदों में भी मिलता है।
यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाभिस्वरन्ति ।
इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश ॥२१॥
इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश ॥२१॥
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम् ।
स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥३१॥
स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥३१॥
सन्दर्भ-
वेदों में कृष्ण का 'विष्णुर्गोपा' के रूप में वर्णन अत्यंत दिव्य और गूढ़ है, जो उन्हें विष्णु के ही स्वरूप—'गोपालक' के रूप में स्थापित करता है। यह वस्तुत: गोलोक के स्वराट विष्णु का रूप है। जो सर्वोत्तम सत्ता है।
ऋग्वेद और अन्य वैदिक ग्रन्थों में कृष्ण को एक ऐसे सुन्दर चरवाहे के रूप में वर्णित किया गया है, जो न केवल गउओं का, बल्कि संसार का पालन और रक्षण भी करता है।
वेदों में कृष्ण का 'विष्णुर्गोपा' रूप में वर्णन इस प्रकार है:
.१- विष्णुर्गोपा (विष्णु ही गोपाल हैं):
ऋग्वेद (1.22.18) में एक गोपा (चरवाहे) का उल्लेख है, जो कभी अपनी स्थिति से नहीं गिरता, जो कभी पास तो कभी दूर होता है और विभिन्न रास्तों पर चलता रहता है। वेदों के इस विवरण को विष्णु के ही 'गोपाल' (श्री कृष्ण) अवतार के रूप में व्याख्यायित किया गया है।
- 'विष्णुर्गोपा' का अर्थ ही है—वह विष्णु जो 'गोपा' (गायों के रक्षक या गोपालक) हैं।
- २- सर्वोच्च पालक और रक्षक:
- वेद में कृष्ण को 'अवतार परम पुरुष' के रूप में भी दर्शाया गया है।
3. वेदों में कृष्ण के अप्रत्यक्ष संकेत:-
- ऋग्वेद (1/116/23) में 'कृष्ण' नाम का उल्लेख है, । "अवस्यते स्तुवते कृष्णियाय ऋजूयते नासत्या शचीभिः ।
पशुं न नष्टमिव दर्शनाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय ॥२३॥ - अनुवाद- कृष्ण की प्राप्ति करने वाला उनकी स्तुति करता है। तो उसकी कृष्ण द्वारा रक्षा भी की जाती है। उसके द्वारा सरल और सीधे मार्ग पर चला जाता है। अश्वनिकुमारों और शचि द्वारा भी विष्णु की स्तुति की जाती है तो विशाल शरीर वाले पापा के अभिमानी देव "अप्वं" के दर्शन नही होते और इन स्तुतियों से भक्तों के पशु भी नष्ट नहीं होते हैं।
- भाष्य - "येन कृष्णं स्तुवते स: कृष्ण: तम् रक्ष्यति। सः सरलपथेन गच्छति। अश्विनीकुमारौ शची च विष्णुं स्तुवन्ति। एवं स्तुत्या विशालकायः अप्वा-देवः न दृश्यते, भक्तानां पशवः च न नश्यन्ति।शब्दार्थ एवं व्याकरण (Grammar)१. यः कृष्णं संश्रयति (जो कृष्ण की शरण लेता है):
- यः: सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
- कृष्णम्: द्वितीया विभक्ति (कर्म)।
- संश्रयति: सम् + श्रि धातु, लट् लकार (वर्तमान काल), परस्मैपद।
२. तेन रक्ष्यते (उनके द्वारा रक्षा की जाती है):- तेन: तद् शब्द, तृतीया विभक्ति (करण/कर्ता)।
- रक्ष्यते: रक्ष् धातु, कर्मवाच्य (Passive Voice), लट् लकार।
३. सरलपथेन (सीधे मार्ग से):- सरल: विशेषण। पथेन: पथिन शब्द, तृतीया विभक्ति।
४. अश्विनीकुमारौ शची च (अश्विनीकुमार और शचि):- अश्विनीकुमारौ: द्विवचन (चूँकि वे दो हैं)।
- शची: इकारान्त स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति।
५. अप्वा (पाप का अभिमानी देव):- वेदों में 'अप्वा' को एक ऐसी शक्ति माना गया है जो मन को भ्रमित करती है और भय पैदा करती है।
- न दृश्यते: नहीं देखा जाता (दृश् धातु, कर्मवाच्य)।
६. पशवः न नश्यन्ति (पशु नष्ट नहीं होते):- पशवः: पशु शब्द, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन।
- नश्यन्ति: नश् धातु, लट् लकार, बहुवचन।
विशेष टिप्पणी-वैदिक सन्दर्भ में 'अप्वा' का अर्थ वह रोग या व्याधि है जो शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करती है। जब भक्त विष्णु (या कृष्ण) और देवों की स्तुति करते हैं, तो वे इस नकारात्मक ऊर्जा (अप्वा) से मुक्त हो जाते हैं। 'सरल मार्ग' का अर्थ यहाँ 'ऋत' (सत्य का मार्ग) से है। - अवस्यते= अवनं रक्षणमात्मन इच्छते । “स्तुवते =स्तुतिं कुर्वते "कृष्णियाय=कृष्णो नाम कश्चित् तस्य पुत्राय “ऋजूयते= आर्जवमिच्छते "विश्वकाय= विशाल। “शचीभिः = इन्द्रस्य पत्न्या । “विष्णाप्वं= विष्णौ ! + अप्वं = पापाभिमानीदेवं। दर्शनाय =दर्शनार्थं “ददथुः= दत्तवन्तौ । “पशुं न नश्यति।
- व्याख्या और मुख्य शब्द
- स्तुवते: जो स्तुति कर रहा हो।
- कृष्णियाय: कृष्ण में गति करने वाला- कृष्णभक्त।
- वेदों में 'याय' (Yaya) शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से 'गति', 'गमन' (जाना) या 'प्रवाह' के अर्थ में होता है। यह संस्कृत की 'या' धातु से बना है, जिसका अर्थ 'जाना' या 'प्राप्त करना' होता है।वेदों के संदर्भ में इसके कुछ प्रमुख अर्थ इस प्रकार हैं:
- गति या गमन: यह किसी वस्तु या विचार के निरंतर आगे बढ़ने या प्रवाहित होने की स्थिति को दर्शाता है।
- प्राप्ति: कई स्थानों पर इसका अर्थ किसी लक्ष्य या ज्ञान की प्राप्ति के लिए अग्रसर होना भी होता है।
- यज्ञीय संदर्भ: यज्ञ (Yajna) और 'याय' शब्दों का मूल कभी-कभी एक ही संदर्भ में देखा जाता है, जहाँ यह देवों की ओर 'जाने' या आहुति के 'पहुँचने' का संकेत देता है।
- ऋजूयते: जो सीधा या सरल मार्ग चाहता हो (आर्जवमिच्छते)।
- विश्वकाय: विश्वकाय:
- को।
- शचीभिः- इन्द्र की पत्नी शचि द्वारा।
- विष्णाप्वं: विष्णाप्वा' पद में यण सन्धि है।इसका सन्धि-विच्छेद विष्णौ + आप्वा होता है।सन्धि की प्रक्रिया और नियम:यण सन्धि का नियम (सूत्र: इको यणचि) कहता है कि यदि ह्रस्व या दीर्घ 'इ', 'उ', 'ऋ' या 'लृ' के बाद कोई असमान स्वर आए, तो उनके स्थान पर क्रमशः 'य्', 'व्', 'र्' और 'ल्' हो जाता है।
- सामान्यतः यण सन्धि में 'उ/ऊ' का 'व्' होता है। 'विष्णु' शब्द के 'उ' को जब असमान स्वर मिलता है, तब वह 'व्' में परिवर्तित हो जाता है।
- अनु + अय = अन्वय (उ + अ = व्)
- मधु + अरि = मध्वरि (उ + अ = व्)इसी प्रकार 'विष्णाप्वा' में भी 'व्' के आगमन के कारण इसे यण सन्धि के अन्तर्गत रखा जाता है।उनके पुत्र का नाम, जो खो गया था (विनष्टं पुत्रं)।
- परन्तु, 'विष्णाप्वा' शब्द की व्युत्पत्ति अयादि सन्धि के विशिष्ट नियमों (विशेषतः 'वान्तो यि प्रत्यये' जैसे सन्दर्भों में) या वैकल्पिक यण प्रक्रियाओं से जुड़ती है जहाँ: यहाँ विष्णौ (सम्बोधन या सप्तमी रूप के सन्दर्भ में) के 'औ' और आप्वा के मेल से विकार उत्पन्न होता है।
- पशुं न: जैसे खोए हुए पशु को वापस लाया जाता है। यहाँ 'न' का प्रयोग 'उपमा' (तुलना) के लिए हुआ है।
- व्याकरणिक टिप्पणी (भाष्य के अनुसार)
- कृष्णियाय: 'कृष्ण' शब्द से अपत्य (संतान) के अर्थ में छान्दस (वेदों में प्रयुक्त) 'घच्' प्रत्यय लगा है।
- विष्णाप्वं: यह खोए हुए पुत्र का नाम है।
- उपमार्थीयः: भाष्यकार ने स्पष्ट किया है कि यहाँ 'न' शब्द का प्रयोग उपमा (यथा/जैसे) के अर्थ में किया गया है, जो वाक्य की तुलना को पूर्ण करता है।
- अवस्यते: जो अपनी रक्षा (अवनं) चाहता हो।
- अवस्यते: यह 'अवः' (रक्षा) शब्द से 'सुप आत्मनः क्यच्' सूत्र द्वारा क्यच् प्रत्यय लगकर बना है। इसके बाद 'शत्रु' प्रत्यय और विभक्ति के उदात्त होने की प्रक्रिया (शतुरनुमः) बताई गई है। इसका अर्थ है "रक्षा की इच्छा करने वाला"।
- जहाँ उन्हें देवकीपुत्र (छान्दोग्य उपनिषद 3.17 में) के रूप में बाद में पहचाना गया। श्री कृष्ण का उल्लेख (3.17.6):इस मन्त्र में कहा गया है कि घोर आङ्गिरस ने देवकी-पुत्र कृष्ण को यह उपदेश दिया, जिसे सुनकर वे अन्य सभी विद्याओं की प्यास से मुक्त हो गए। ऋषि ने उन्हें सिखाया कि मृत्यु के समय मनुष्य को इन तीन मन्त्रों का आश्रय लेना चाहिए:
- अच्युतमसि (तुम अटल हो)
- प्राणसंशितमसि (तुम प्राणों के सूक्ष्म सार हो)
यह खण्ड सिखाता है कि केवल बाहरी कर्मकाण्ड ही यज्ञ नहीं है, बल्कि एक सदाचारी और संयमित जीवन जीना ही वास्तविक आध्यात्मिक यज्ञ है।
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वेदों में कृष्ण और अर्जुन के संयुक्त वार्तालाप है।
त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव ।
कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे ॥३॥
(ऋग्वेद १०/२१/३)
- पदों का व्याकरण सम्मत अर्थ-
- त्वे (Tve): 'त्वयि' का वैदिक रूप। सप्तमी विभक्ति, एकवचन (तुझमें/तेरे आश्रय में)।
- धर्माणः (Dharmāṇaḥ): प्रथमा विभक्ति, बहुवचन। धारण करने वाले गुण या उपासक।
- आसते (Āsate): 'आस्' धातु (बैठना/विराजना), लट् लकार, आत्मनेपद। (विराजते हैं)।
- जुहूभिः (Juhūbhiḥ): तृतीया विभक्ति, बहुवचन। 'जुहू' (हवन पात्र/चमच) के द्वारा।
- सिञ्चतीः-इव (Siñcatīḥ-iva): सींचती हुई धाराओं के समान। 'सिच्' धातु + शतृ प्रत्यय (स्त्रीलिंग)।
- कृष्णा रूपाणि-अर्जुना (Kṛṣṇā rūpāṇi-arjunā): कृष्ण और अर्जुन आदि अनेक रूपों में। यहाँ द्वन्द्व और विशेषण का प्रयोग है।
- वि वो मदे (Vi vo made): 'वः' (तुम्हारे लिए) और ' मदे=स्तुति में। 'वि' उपसर्ग विशिष्टता को दर्शाता है।
- विश्वा अधि श्रियो धिषे (Viśvā adhi śriyo dhiṣe): तुम समस्त (विश्वा)के (श्रियो) कल्याणों (धिषे) धारण करते हो
- विवक्षसे (Vivakṣase): 'वच्' धातु का सन्नत रूप मध्यम पुरुष एक वचन आत्मनेपदीय -कहते हो।
अनुवाद-(हे कृष्ण ) जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) से घी अग्नि में छिड़का जाता है, उसी प्रकार सारे धर्म आप में ही स्थित हैं। आपकी स्तुति में विश्व कल्याण को अधिग्रहण( धारण) करता है । कृष्ण और अर्जुन आदि रूपों में अनेक बार तुम ही सब धर्मों को कहने की इच्छा प्रकट करते हो। ऋग्वेद- १०/२१/३
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ऋग्वेद १०/२१/३)
"त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव।
कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे ॥"
अनुवाद:
"(हे कृष्ण ) जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) से घी अग्नि में छिड़का जाता है, उसी प्रकार सारे धर्म आप में ही स्थित हैं। और आप सभी धर्मों को धारण करते हो। आपकी स्तुति में सम्पूर्ण विश्व कल्याण को अधिग्रहण करता है । कृष्ण और अर्जुन आदि अनेक रूपों में अनेक बार तुम ही धर्मों को कहते हो।
"(हे कृष्ण ) जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) से घी अग्नि में छिड़का जाता है, उसी प्रकार सारे धर्म आप में ही स्थित हैं। और आप सभी धर्मों को धारण करते हो। आपकी स्तुति में सम्पूर्ण विश्व कल्याण को अधिग्रहण करता है । कृष्ण और अर्जुन आदि अनेक रूपों में अनेक बार तुम ही धर्मों को कहते हो।
- प्रस्तुत ऋचा पर योगेश रोहि का भाष्य-नीचे है ।
संस्कृत श्लोक-
यथा जुह्विर्घृतं वह्नौ त्वयि धर्मास्तथा स्थिताः।
त्वं धारयसि धर्मान् वै विश्वं स्वस्ति च विन्दति॥
कृष्णार्जुनस्वरूपेण बहुधा वदसि प्रभो।
धर्मान् सनातनंश्चापि नमोऽस्तु परमात्मने॥
व्याकरण सहित हिन्दी अनुवाद:
- यथा जुह्विर्घृतं वह्नौ त्वयि धर्मास्तथा स्थिताः।
- अनुवाद: जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) के द्वारा घी अग्नि में (अर्पित होकर) स्थित होता है, उसी प्रकार सभी धर्म आप में भी स्थित होता हैं।
- व्याकरण:
- यथा/तथा: अव्यय (जैसे/वैसे)।
- जुह्वि: 'जुहू' शब्द (तृतीया विभक्ति, बहुवचन के अर्थ में यहाँ प्रयुक्त) - हवन का पात्र।
- वह्नौ: 'वह्नि' (अग्नि) शब्द, सप्तमी विभक्ति, एकवचन।
- स्थिताः 'स्था' धातु + 'क्त' प्रत्यय (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन)।
- त्वं धारयसि धर्मान् वै विश्वं स्वस्ति च विन्दति॥
- अनुवाद: आप ही समस्त धर्मों को धारण करते हैं और (आपकी स्तुति से) सम्पूर्ण विश्व कल्याण (स्वस्ति) प्राप्त करता है।
- व्याकरण:
- धारयसि: 'धृ' धातु (णिजन्त), लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
- विन्दति: 'विद्' धातु (लाभ प्राप्त करना), लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
- स्वस्ति: कल्याण/मंगल।
- कृष्णार्जुनस्वरूपेण बहुधा वदसि प्रभो।
- अनुवाद: हे प्रभु! कृष्ण और अर्जुन जैसे अनेक रूपों में आप ही बार-बार धर्म का उपदेश देते हैं।
- व्याकरण:
- स्वरूपेण: तृतीया विभक्ति, एकवचन (रूप के द्वारा)।
- बहुधा: अव्यय (अनेक प्रकार से/अनेक बार)।
- वदसि: 'वद्' धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
यह श्लोक भगवान कृष्ण (परमात्मा) की महिमा और उनके धर्म-रक्षक स्वरूप का वर्णन करता है।
यह श्लोक ऋग्वेद में उल्लिखित (१०/२१/३) का गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि का संस्कृत भाष्य है।
"यथा जुह्विर्घृतं वह्नौ त्वयि धर्मास्तथा स्थिताः।
त्वं धारयसि धर्मान् वै विश्वं स्वस्ति च विन्दति॥
कृष्णार्जुनस्वरूपेण बहुधा वदसि प्रभो।
धर्मान् सनातनंश्चापि नमोऽस्तु परमात्मने॥
इसका हिन्दी अनुवाद और व्याकरणिक विश्लेषण नीचे दिया गया है:
हिन्दी अनुवाद-
"जैसे प्रज्वलित अग्नि में हवन (घी) स्थित रहता है, वैसे ही समस्त धर्म आपमें ही स्थित हैं। हे प्रभु! आप ही इन धर्मों को धारण करते हैं, जिससे यह समस्त विश्व कल्याण प्राप्त करता है। आप ही कृष्ण और अर्जुन के रूप में (नर-नारायण रूप में) बहुधा उपदेश देते हैं और सनातन धर्मों की रक्षा करते हैं। उन परमात्मा स्वरूप आपको नमस्कार है।"
श्लोक में प्रयुक्त पदों का
व्याकरणिक विश्लेषण-
यथा जुह्विर्घृतं वह्नौ त्वयि धर्मास्तथा स्थिताः।
यथा/तथा: ये अव्यय हैं, जिनका अर्थ है 'जैसे/वैसे'।
जुह्विः: (हु + क्विप्) यहाँ 'हवन' या 'आहुति' के अर्थ में प्रयुक्त है।
घृतम्: कर्म कारक (द्वितीय विभक्ति), अर्थ- घी।
वह्नौ: 'वह्नि' (अग्नि) शब्द की सप्तमी विभक्ति, एकवचन। अर्थ- 'अग्नि में'।
त्वयि: 'युष्मद' शब्द की सप्तमी विभक्ति। अर्थ- 'आपमें'।
धर्माः 'धर्म' शब्द की प्रथमा विभक्ति, बहुवचन।
स्थिताः 'स्था' धातु + क्त प्रत्यय। अर्थ- 'स्थित हैं'।
त्वं धारयसि धर्मान् वै विश्वं स्वस्ति च विन्दति॥
धारयसि: 'धृ' धातु (णिजन्त), लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन। अर्थ- 'आप धारण करते हैं'।
धर्मान्: द्वितीय विभक्ति, बहुवचन। अर्थ- 'धर्मों को'।
विन्दति: 'विद्' (लाभ करना) धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन। अर्थ- 'प्राप्त करता है'।
स्वस्ति: यह एक अव्यय है जिसका अर्थ 'कल्याण' या 'मंगल' होता है।
कृष्णार्जुनस्वरूपेण बहुधा वदसि प्रभो।
कृष्णार्जुनस्वरूपेण: कृष्ण + अर्जुन (द्वन्द्व समास) + स्वरूप (तृतीय विभक्ति)। अर्थ- 'कृष्ण और अर्जुन के स्वरूप के द्वारा'।
बहुधा: अव्यय। अर्थ- 'अनेक प्रकार से' या 'बार-बार'।
वदसि: 'वद्' धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष। अर्थ- 'आप बोलते/उपदेश देते हैं'।
धर्मान् सनातनंश्चापि नमोऽस्तु परमात्मने॥
सनातनान् + च + अपि: (संधि) 'सनातन और भी'।
नमोऽस्तु: नमः + अस्तु (विसर्ग सन्धि)। अर्थ- 'नमस्कार हो'।
परमात्मने: 'परमात्मन्' शब्द की चतुर्थी विभक्ति, एकवचन। (नमः के योग में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है)।
विशेष: यह पंक्तियाँ कृष्ण को 'धर्म-गोप्ता' (धर्म का रक्षक) और 'साक्षात् धर्म' के रूप में प्रतिपादित करती हैं। जिस प्रकार अग्नि आहुति को स्वीकार करती है, उसी प्रकार परमात्मा सभी धर्मों का आधार (आश्रय) हैं।
छान्दोग्योपनिषद् (अध्याय- 3, खण्ड- 17, श्लोक- 6), का हिन्दी अनुवाद और व्याकरण नीचे दिया गया है:
१. सन्दर्भ (Context)
- ग्रन्थ: छान्दोग्य उपनिषद (सामवेद से संबद्ध)।
- खण्ड: 3.17 (पुरुष यज्ञ - मनुष्य के जीवन को यज्ञ के रूप में वर्णित करना)।
- सन्दर्भ: इस श्लोक में घोर आङ्गिरस ऋषि द्वारा देवकी के पुत्र कृष्ण को दिए गए ज्ञान का उल्लेख है। यह कृष्ण को 'देवकीपुत्र' के रूप में सम्बोधित करने वाले सबसे पुराने सन्दर्भों में से एक है।
- मूल श्लोक:
"तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसंशितमसीति तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ॥ स्रोत- छान्दोग्यपनिषद- (३.१७.६)
२. पदच्छेद (Word Splitting)
तद् + ह + एतत् + घोरः + आङ्गिरसः + कृष्णाय + देवकीपुत्राय + उक्त्वा + उवाच + अपिपासः + एव + सः + बभूव + सः + अन्तवेलायाम् + एतत् + त्रयम् + प्रतिपद्येत + अक्षितम् + असि + अच्युतम् + असि + प्राणसंशितम् + असि + इति + तत्र + एते + द्वे + ऋचौ + भवतः ॥
३. हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
घोर आङ्गिरस (ऋषि) ने देवकीपुत्र कृष्ण को यह (ऊपर वर्णित पुरुष यज्ञ का ज्ञान) कहकर यह भी कहा—"जिसने यह (ज्ञान) जान लिया, वह (विद्या की प्यास से) अपिपास (तृप्त, अन्य ज्ञान की इच्छा से मुक्त) हो गया।"
(वे ऋषि कृष्ण से आगे बोले) - "मनुष्य को अंत समय (मृत्यु) में इन तीन बातों का आश्रय लेना चाहिए:
- अक्षितमसि (तुम अविनाशी हो),
- अच्युतमसि (तुम अच्युत/अपरिवर्तनीय हो),
- प्राणसंशितमसि (तुम सूक्ष्म प्राण-शक्ति हो)।"
(इस ज्ञान के समर्थन में) वहाँ दो ऋचाएं भी हैं।
४. व्याकरण और शब्दार्थ (Grammar and Word Meanings)
- घोर आङ्गिरसः (घोर + आङ्गिरसः): घोर (नाम) आङ्गिरस गोत्र के (कर्ता, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)।
- देवकीपुत्राय: देवकी का पुत्र (संज्ञक) (संप्रदान कारक, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन)।
- उक्त्वा (उत्+कृ+त्वा): कहकर (त्वा प्रत्यय, पूर्वकालिक क्रिया )।
- उवाच (वच् + लिट् लकार): कहा (भूतकाल लिट् लकार)।
- अपिपासः (न पिपासा यस्य सः): बहुव्रीहि समास। जिसे अन्य ज्ञान की प्यास न हो, तृप्त।
- अन्तवेलायाम् (अन्त + वेला): मृत्यु के समय (अधिकरण कारक, सप्तमी विभक्ति, एकवचन)।
- एतत्त्रयम्: ये तीन (अक्षित, अच्युत, प्राणसंशित)।
- प्रतिपद्येत (प्रति + पद + विधिलिङ् लकार): धारण करना चाहिए, आश्रय लेना चाहिए (आत्मनेपद)।
- अक्षितम् (न क्षीयते इति): अविनाशी (अ + क्षि + क्त) - जो नष्ट न हो।
- अच्युतम् (न च्युतम्): अचल, स्थिर, अपरिवर्तनीय (न + च्युत)।
- प्राणसंशितम् (प्राण + सं + शि + क्त): सूक्ष्म प्राण-शक्ति (जो प्राण को संशित/तेज करता है)।
- ऋचौ: दो ऋचाएं/ (द्विवचन)।
- भवतः: होते हैं (भू धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन)।
विशेष: यह श्लोक अद्वैत दर्शन (आत्मा ही अविनाशी ब्रह्म है) की शिक्षा देता है।
श्रीकृष्ण धर्म की स्थापना के लिए अवतरित हुए उनकी सबसे अधिक समीपता व उपस्थिति अर्जुन के साथ रही है। वेदों में यह संकेत हम कर ही चुके हैं। धर्म की स्थापना का उद्घोष तो श्रीमद्भगवद्गीता मेंनभी है।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रसिद्ध श्लोक (अध्याय 4, श्लोक 7) का सविस्तार अनुवाद और व्याकरण नीचे दिया गया है:
पूरा श्लोक:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
हिंदी अनुवाद
हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि (गिरावट) होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ (अर्थात प्रकट होता हूँ)।
श्रीकृष्ण भारतीय धरा की प्राचीनत्तम उपस्थिति है। इसकी पुष्टि मोहन-जोदाड़ो की सभ्यता के पुरातात्विक उत्खनन के परिणाम स्वरूप प्राप्त भित्तिचित्रों से हुई है।
मोहनजोदाड़ो सभ्यता के विषय में ईस्वी सन् (1929) में हुई खोज के अनुसार पुरातत्व वेत्ता "अरनेस्त मैके" के द्वारा मोहनजोदाड़ो में हुए उत्खनन में प्राप्त हुए एक पुरातन टैबलेट (भित्तिचित्र) से इस सत्य की पुष्टि होती है।
"जिसमें दो वृक्षों के बीच खड़े एक बालक का चित्र बना हुआ था।
जो पूर्णत: भागवत आदि पुराणों के कृष्ण से सम्बद्ध है। और जो शोधकर्ताओं को पुराणों में लिखे कृष्ण द्वारा यमलार्जुन के उद्धार की कथा की ओर ले जाता है।"
पुराणों की कथाऐं भले ही पुरानी हों परन्तु
पुराणों का सृजन बुद्ध के परवर्ती काल में हुआ। और कृष्ण की कथाऐं पुराणों से भी पुरानी हैं। भारतीय वेद गौतम-बुद्ध से पूर्व भी अस्तित्व में थे और मोहनजोदाड़ो की सभ्यता वेदों से भी पूर्व कालिक है।।
अत: कृष्ण बुद्ध से तो प्राचीन हैं ही साथ में वैदिक काल से भी प्राचीन हैं जिनकी उपस्थिति सिन्धु सभ्यता में भी है।
अत: वेदों कृष्ण की उपस्थिति को खारिज नहीं किया जा सकता है।
इतना ही नहीं ऋग्वेद के अष्टम मण्डल के अतिरिक्त चौथे वेद अथर्ववेद में भगवान कृष्ण का वर्णन केशी नामक दैत्य का वध करने वाला बताकर कृष्ण की वैदिक काल से भी पूर्व की स्थिति दर्ज कर दी है।
अत: वेदों में भी कृष्ण के होने की बात सिद्ध होती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं-
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वेदों का लेखन कार्य ईसा पूर्व सप्तम सदी तक होता रहा है। भले हीं इसकी बहुत सी ऋचाऐं प्राचीन हों वेदों का प्रणयन "मुक्तक काव्य शैली में लम्बे समय तक हुआ है। वेद प्रबन्ध शैली में नहीं हैं वेदों की एक ऋचा ही अपने आप में पूर्ण भावमयी होती है ।
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