गुरुवार, 19 मार्च 2026

पुराणों में तैतीस करोड़ देवताओं का वर्णन-

देवानां त्रयस्त्रिंशच्च कोटयः" (Skanda Purana 1.3.6.7) का अर्थ है - देवताओं की तैंतीस (33) कोटि या करोड़ संख्या
यह वाक्यांश स्कन्द पुराण के माहेश्वर खण्ड (अरुणाचल माहात्म्य) के अध्याय 6, श्लोक 7 से लिया गया है। इस सन्दर्भ के कुछ प्रमुख पहलू इस प्रकार हैं:।
  • सन्दर्भ: जब भगवान शिव तेजोमय रूप में प्रकट हुए, तब उनकी चिंगारियों (स्फुलिंग) से तैंतीस करोड़ देवता उत्पन्न हुए।
  • अर्थ: 'कोटि' शब्द के दो अर्थ होते हैं: 'करोड़' (संख्या) और 'प्रकार' (श्रेणी)।
  • 33 प्रकार (33 Kinds): पुराणों और वेदों में 33 देवताओं का उल्लेख है - 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्विनी कुमार (33 देवता)।
  • 33 करोड़ (330 Million): 'देवानां त्रयस्त्रिंशच्च कोटयः' के सन्दर्भ में, सनातन धर्म में मान्य है कि ये 33 प्रमुख प्रकार के देवता ही 33 करोड़ के रूप में विस्तारित हैं।
संक्षेप में, यह श्लोक देवताओं की असीम संख्या का प्रमाण देता है। 


ततस्तेजोमयाच्छंभोः स्फुलिंगांशुसमुद्भवाः ।।
उदस्तंभंत देवानां त्रयस्त्रिंशच्च कोटयः ।।७।।

स्कन्दपुराण /खण्डः १ (माहेश्वरखण्डः)


महाभारत से👇

त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि त्रयस्त्रिंशत्छतानि च।
त्रयस्त्रिंशत् च देवानां सृष्टि संक्षेप लक्षणाः।।
अनुवाद-
देवताओं की सृष्टि संक्षेप में तैंतीस हजार, तैंतीस सौ और तैंतीस लक्षित होती है। मत्स्य पुराण में भी इसी की पुष्टि की गई है।

👉 द्वितीय प्रमाण विष्णु पुराण से:- 

त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि त्रयस्त्रिंशत्छतानि च।
त्रयस्त्रिंशत् तथादेवाः पिबन्ति क्षणदारकम्।।
अनुवाद:-
तैंतीस हजार तैंतीस सौ तैंतीस देवगण चन्द्रस्थ अमृत का पान करते हैं।
अब इसका तात्पर्य यह बिल्कुल नहीं है कि कुल इतने ही देवता हैं। क्योंकि यहां पर यह नहीं कहा गया है कि कुल सभी देवी-देवता चन्द्रस्थ अमृतकला का पान करते हैं।

 👉 तृतीय प्रमाण मत्स्य पुराण से:-

त्रयश्चत्रिंशतासार्धंत्रीणि चैव शतानि तु।
त्रयस्त्रिंशत् सहस्त्राणि देवाः सोमं पिबन्ति वै।।
अनुवाद-
अर्थात् तैंतीस हजार तीन सौ तैंतीस देवता चंद्रमा के अमृतकला को पीते हैं।
इस प्रकार पान किए जाते हुए चंद्रमा की वे कृष्णपक्षीय कलाएँ (शुक्लपक्ष) में बढ़ती हैं और शुक्लपक्षीय कलाएँ(कृष्ण पक्ष) में घटती हैं।

👉इसी का वर्णन महाकवि कालिदास के रघुवंश महाकाव्य में भी मिलता है।

👉 चतुर्थ प्रमाण ब्रह्मवैवर्त पुराण से:-

प्रत्येकं प्रति ब्रह्माण्डे ब्रह्माविष्णुशिवादयः।
तिस्त्रः कोट्यः सुराणां च संख्या सर्वत्र पुत्रकः।।
अनुवाद:-
अर्थात् प्रत्येक ब्रह्माण्ड ( सृष्टि) में ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि सब हुआ करते हैं। हे पुत्र देवों की तीस करोड़ संख्या है जो की सर्वत्र रहा करते हैं। (अर्थात प्रत्येक ब्रह्माण्ड में रहा करते हैं) इसी का वर्णन श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में भी है।

👉  स्कन्द पुराण से:- 

ततस्तेजोमयाच्छम्भो:स्फुलिङ्गांशुसमुद्गता:।
उदगंस्तत्र देवानां त्रयस्त्रिंशच्च कोटय:।
अनुवाद:-
अर्थात् तत्पश्चात शंभू की ज्वालाओं की किरणों से उग्र रूप वाले अग्निमयी तैंतीस करोड़ देवता प्रकट हुए।

👉      स्कन्द पुराण से ही:-


👉 स्कंद पुराण में ही भगवान शिव के साथ चलने को तैयार अनेक देवों की संख्या का वर्णन है। जैसे - देवता ३३ करोड़, गण - १ करोड़ दो लाख, चामुंडा - ९ करोड़, भैरव १ करोड़, स्कंद के गण - ८ करोड़, गणेश जी के गण - ७ करोड़, ऋषि - ८६ हजार, नाग - ३ करोड़, शुभ आत्माओं वाले दानव - २ करोड़, दैत्य - २ करोड़, गंधर्व - ८ लाख, यक्ष और राक्षस - ५० लाख, विद्याधर - ३ लाख, दिव्य कन्याएं - ६० लाख, गौ माताएं - ८ लाख, सुपार्ष - ६ लाख, नदियां - ३३ हजार, पर्वत - ८ हजार और वनस्पतियां ३०० थीं जो भगवान के बुलाने पर साथ चलने को तैयार हुई। 

👉 सप्तम प्रमाण श्रीमद्भागवत महापुराण से:- 

सरुपासुत भूतस्य भार्या रुद्रांश्च कोटिशः।
अर्थात् भूत की पत्नी दक्षनंदिनी सरुपा से करोड़ों रुद्र गणों की उत्पत्ति हुई। जिनमें से जो मुख्य ११ रुद्र हैं उन्हीं को ३३ देवताओं में गिना जाता है।

👉 

अब आते हैं वैदिक प्रमाण पर:-

👉 नवम प्रमाण यजुर्वेद से:- 

त्रीणि शता त्री सहस्त्राण्यग्निं त्रिंशच्च देवा नव चा सपर्यन।
अनुवाद:-
अर्थात् तीन हजार तीन सौ तीस और नो देवता अग्नि की उपासना करते हैं। अर्थात् यह तो सिद्ध हो ही गया कि केवल तैंतीस देवता हो ही नहीं सकते।

अब प्रशन उठता है कि ये तैंतीस प्रकार के देवता की अवधारणा कहां से उत्पन्न हुई?

तो ये ज्ञान लिया गया है बृहदारण्यक उपनिषद् और वाल्मीकि रामायण से। याज्ञवल्क्य जी से विदग्ध प्रश्न पूछते हैं कि देवता कितने हैं? तब वे उत्तर देते हैं ३३३०६
फिर उनसे प्रश्न पूछते हैं कि देवता कितने हैं तो वे क्रमशः उत्तर देते हैं तैंतीस हजार हैं, फिर तैंतीस हैं, फिर तीन, फिर दो फिर डेढ़, फिर एक।

वाल्मीकि रामायण 

अदित्यां जज्ञिरे देवात्रयस्त्रिंशदरिंदम।
आदित्या वसवो रुद्रा ह्यश्विनौ च परन्तप।।

अर्थात् शत्रुओं का दमन करने वाले रघुवीर ! अदिति के गर्भ से तैतीस देव उत्पन्न हुए, बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनी कुमार। शत्रुओं को ताप देने वाले श्रीराम! ये ही तैतीस देवता हैं। 

👉 अर्थात् ये तैंतीस देवता तो वे हैं जो केवल अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं किंतु इसका तात्पर्य यह नहीं कि केवल इतने ही देवता हैं।



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