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मुञ्जाटव्यां गवां गोपानां च दावानलाद् रक्षणम् -
श्रीशुक उवाच ।
( अनुष्टुप् )
क्रीडासक्तेषु गोपेषु तद्गावो दूरचारिणीः ।
स्वैरं चरन्त्यो विविशुः तृणलोभेन गह्वरम् ॥ १ ॥
अजा गावो महिष्यश्च निर्विशन्त्यो वनाद् वनम् ।
ईषीकाटवीं निर्विविशुः क्रन्दन्त्यो दावतर्षिताः॥२।
तेऽपश्यन्तः पशून् गोपाः कृष्णरामादयस्तदा ।
जातानुतापा न विदुः विचिन्वन्तो गवां गतिम् ।३।
तृणैस्तत्खुरदच्छिन्नैः गोष्पदैः अंकितैर्गवाम् ।
मार्गं अन्वगमन् सर्वे नष्टाजीव्या विचेतसः ॥ ४ ॥
मुञ्जाटव्यां भ्रष्टमार्गं क्रन्दमानं स्वगोधनम् ।
सम्प्राप्य तृषिताः श्रान्ताः ततस्ते संन्यवर्तयन् ।५।
ता आहूता भगवता मेघगम्भीरया गिरा ।
स्वनाम्नां निनदं श्रुत्वा प्रतिनेदुः प्रहर्षिताः ॥६॥
( मिश्र )
ततः समन्ताद् वनधूमकेतुः
यदृच्छयाभूत् क्षयकृत् वनौकसाम् ।
समीरितः सारथिनोल्बणोल्मुकैः
विलेलिहानः स्थिरजङ्गमान् महान् ॥७॥
तं आपतन्तं परितो दवाग्निं
गोपाश्च गावः प्रसमीक्ष्य भीताः ।
ऊचुश्च कृष्णं सबलं प्रपन्ना
यथा हरिं मृत्युभयार्दिता जनाः ॥ ८ ॥
( अनुष्टुप् )
कृष्ण कृष्ण महावीर हे रामामित विक्रम ।
दावाग्निना दह्यमानान् प्रपन्नान् त्रातुमर्हथः ॥ ९ ॥
नूनं त्वद्बान्धवाः कृष्ण न चार्हन्त्यवसीदितुम् ।
वयं हि सर्वधर्मज्ञ त्वन्नाथाः त्वत्परायणाः ॥ १० ॥
श्रीशुक उवाच ।
वचो निशम्य कृपणं बन्धूनां भगवान् हरिः ।
निमीलयत मा भैष्ट लोचनानीत्यभाषत ॥ ११ ॥
तथेति मीलिताक्षेषु भगवान् अग्निमुल्बणम् ।
पीत्वा मुखेन तान्कृच्छ्राद् योगाधीशो व्यमोचयत् ॥ १२ ॥
ततश्च तेऽक्षीण्युन्मील्य पुनर्भाण्डीरमापिताः ।
निशाम्य विस्मिता आसन् आत्मानं गाश्च मोचिताः ॥ १३ ॥
कृष्णस्य योगवीर्यं तद् योगमायानुभावितम् ।
दावाग्नेरात्मनः क्षेमं वीक्ष्य ते मेनिरेऽमरम् ।१४॥
गाः सन्निवर्त्य सायाह्ने सहरामो जनार्दनः ।
वेणुं विरणयन् गोष्ठं अगाद् गोपैरभिष्टुतः ॥ १५ ॥
गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्ददर्शने ।
क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत् ॥ १६ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
दशम स्कन्ध: एकोनविंश अध्याय (पूर्वार्ध) श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कन्ध: एकोनविंश अध्यायः श्लोक 1-11 का हिन्दी अनुवाद:-
गौओं और गोपों को दावानल से बचाना श्री शुकदेव जी कहते हैं -
परीक्षित! उस समय जब ग्वालबाल खेल-कूद में लग गये, तब उनकी गौएँ बेरोक-टोक चरती हुई बहुत दूर निकल गयीं और हरी-हरी घास के लोभ से एक गहन वन में घुस गयीं।
अजा गावो महिष्यश्च निर्विशन्त्यो वनाद् वनम् ।
ईषीकाटवीं निर्विविशुः क्रन्दन्त्यो दावतर्षिताः॥२
उसकी बकरियाँ, गायें और भैंसे एक वन से दूसरे वन में होती हुई आगे बढ़ गयीं तथा गर्मी के ताप से व्याकुल हो गयीं।
वे बेसुध-सी होकर अन्त में डकराती हुई मुंजाटवी में घुस गयीं। जब श्रीकृष्ण, बलराम आदि ग्वालबालों ने देखा कि हमारे पशुओं का तो कहीं पता-ठिकाना ही नहीं है, तब उन्हें अपने खेल-कूद पर बड़ा पछतावा हुआ और वे बहुत कुछ खोज-बीन करने पर भी अपनी गौओं का पता न लगा सके।
गौएँ ही तो व्रजवासियों की जीविका का साधन थीं। उनके न मिलने से वे अचेत-से हो रहे थे। अब वे गौओं के खुर और दाँतो से कटी हुई घास तथा पृथ्वी पर बने हुए खुरों के चिह्नों से उनका पता लगाते हुए आगे बढ़े।
अन्त में उन्होंने देखा कि उनकी गौएँ मुंजाटवी में रास्ता भूलकर डकरा रही हैं।
उन्हें पाकर वे लौटाने की चेष्टा करने लगे। उस समय वे एकदम थक गये थे और उन्हें प्यास भी बड़े जोर से लगी हुई थी।
इससे वे व्याकुल हो रहे थे। उनकी यह दशा देखकर भगवान श्रीकृष्ण अपनी मेघ के समान गम्भीर वाणी से नाम ले-लेकर गौओं को पुकारने लगे। गौएँ अपने नाम की ध्वनि सुनकर बहुत हर्षित हुईं।
वे भी उत्तर में हुंकारने और रँभाने लगीं। परीक्षित! इस प्रकार भगवान उन गायों को पुकार ही रहे थे कि उस वन में सब ओर अकस्मात दावाग्नि लग गयी, जो वनवासी जीवों का काल ही होती है।
साथ ही बड़े जोर की आँधी भी चलकर उस अग्नि के बढ़ने में सहायता देने लगी। इससे सब ओर फैली हुई वह प्रचण्ड अग्नि अपनी भयंकर लपटों से समस्त चराचर जीवों को भस्मसात करने लगी।
जब ग्वालों और गौओं ने देखा कि दावनल चारों ओर से हमारी ही ओर बढ़ता आ रहा है, तब वे अत्यन्त भयभीत हो गये और मृत्यु के भय से डरे हुए जीव जिस प्रकार भगवान की शरण में आते हैं, वैसे ही वे श्रीकृष्ण और बलरामजी के शरणापन्न होकर उन्हें पुकारते हुए बोले - ‘महावीर श्रीकृष्ण! प्यारे श्रीकृष्ण! परम बलशाली बलराम! हम तुम्हारे शरणागत हैं।
देखो, इस समय हम दावानल से जलना ही चाहते हैं। तुम दोनों हमें इससे बचाओ। श्रीकृष्ण! जिनके तुम्हीं भाई-बन्धु और सब कुछ हो, उन्हें तो किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिये। सब धर्मों के ज्ञाता श्यामसुन्दर! तुम्हीं हमारे एकमात्र रक्षक एवं स्वामी हो; हमें केवल तुम्हारा ही भरोसा है।' श्री शुकदेव जी कहते हैं - अपने सखा ग्वालबालों के ये दीनता से भरे वचन सुन्दर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - ‘डरो मत, तुम अपनी आँखें बंद कर लो।'
अजा गावो महिष्यश्च निर्विशन्त्यो वनाद् वनम् ।
ईषीकाटवीं निर्विविशुः क्रन्दन्त्यो दावतर्षिताः॥२
उसकी बकरियाँ, गायें और भैंसे एक वन से दूसरे वन में होती हुई आगे बढ़ गयीं तथा गर्मी के ताप से व्याकुल हो गयीं।
श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध (अध्याय १९) से उद्धृत यह श्लोक न केवल उस समय की प्राकृतिक आपदा (दावाग्नि) का वर्णन करता है, बल्कि तत्कालीन गोप संस्कृति और उनकी अर्थव्यवस्था के स्वरूप पर भी महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है।
आपकी जिज्ञासा के आधार पर इस श्लोक की समालोचनात्मक विवेचना निम्नलिखित बिंदुओं में की जा सकती है:
१. पशुधन की विविधता (Animal Husbandry)
श्लोक की पहली पंक्ति स्पष्ट रूप से तीन प्रकार के पशुओं का उल्लेख करती है:
- अजा (बकरियाँ): ये छोटे पशु थे जो दुर्गम स्थानों पर भी चर सकते थे।
- गाव: (गायें): ब्रज की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार।
- महिष्य: (भैंसें): भारी और अधिक दूध देने वाले पशु।
विवेचना: यह इस बात का प्रमाण है कि कृष्ण और उनके साथी केवल 'ग्वाले' (गायों के पालक) ही नहीं थे, बल्कि वे एक समृद्ध पशुपालन संस्कृति का हिस्सा थे। वे केवल एक विशेष प्रजाति पर निर्भर न होकर मिश्रित पशुपालन (Mixed Livestock Farming) करते थे, जो उनके आर्थिक प्रबंधन और जीविकोपार्जन की विविधता को दर्शाता है।
२. सामूहिक चरागाह पद्धति
श्लोक में प्रयुक्त 'निर्विशन्त्यो वनाद् वनम्' (एक वन से दूसरे वन में प्रवेश करती हुई) वाक्यांश यह दर्शाता है कि उस समय पशुओं को पालने के लिए चरागाहों का विस्तार बहुत बड़ा था।
- गोप लोग अपने पशुओं को लेकर किसी एक स्थान पर सीमित नहीं रहते थे।
- वे पारिस्थितिक संतुलन और घास की उपलब्धता के अनुसार 'वनान्तरण' (वन बदलना) करते थे।
३. 'ईषीकाटवीं' और संकट की स्थिति
जब दावाग्नि (जंगल की आग) लगी, तो प्यास और भय से व्याकुल (दावतर्षिताः) पशु 'ईषीकाटवीं' (मूंज या ईख के जंगल) में जा घुसे।
- समालोचना: यहाँ 'क्रन्दन्त्यो' (रंभाना/चिल्लाना) शब्द पशुओं और उनके पालकों के बीच के गहरे भावनात्मक संबंध की ओर संकेत करता है। जब पशु संकट में थे, तो कृष्ण और बलराम उन्हें खोजने निकले। यह दर्शाता है कि उनके लिए पशु केवल संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह थे।
४. सामाजिक एवं आर्थिक संरचना
इस श्लोक से यह निष्कर्ष निकलता है कि तत्कालीन समाज (विशेषकर नन्द बाबा का गोकुल) एक 'पशुपालक समाज' था जहाँ:
- धन का मापदंड: जिसके पास जितने अधिक और विविध पशु (गाय, भैंस, बकरी) होते थे, वह उतना ही समृद्ध माना जाता था।
- श्रम विभाजन: कृष्ण और उनके साथी स्वयं इन पशुओं को चराने जाते थे, जो उनके कर्मठ और प्रकृति से जुड़े व्यक्तित्व को पुष्ट करता है।
निष्कर्ष
उपर्युक्त श्लोक इस धारणा को पुष्ट करता है कि कृष्ण की लीलाओं का परिवेश अत्यंत व्यावहारिक और जमीनी था। वे केवल गायों के रक्षक नहीं थे, बल्कि 'सर्व-पशु-पालक' थे। उनके साथ 'अजा' (बकरियों) और 'महिष्य' (भैंसों) का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि ब्रजवासी एक संपूर्ण डेयरी और पशुपालन पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का संचालन करते थे।
विशेष टिप्पणी: यह श्लोक कृष्ण के 'गोपाल' स्वरूप को और अधिक व्यापक बनाता है, जिसमें वे केवल गायों के ही नहीं बल्कि समस्त मूक प्राणियों के आश्रयदाता के रूप में उभरते हैं।
वैदिक शब्द पशु और यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित शब्द pice तथा पेकुस दर्शाते वहां कि पशु अर्थ व्यवस्था व मुद्रा के आधार स्तम्भ थे जहाँ पशुओं के लिए घास के स्थान ग्रास भूमि( होते थे वहीं ग्राम संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ
प्रस्तुत गद्य तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Linguistics) और नृवंशविज्ञान (Ethnology) के अंतर्संबंधों को बहुत गहराई से रेखांकित करता है। यह न केवल शब्दों की उत्पत्ति, बल्कि उनके सामाजिक-आर्थिक निहितार्थों की भी सुंदर व्याख्या करता है।
इसकी सम्यक विवेचना निम्नलिखित प्रमुख शीर्षकों के अंतर्गत की जा सकती है:
१. भाषावैज्ञानिक साक्ष्य: 'पशु' और 'Pecus' का अंतर्संबंध
संस्कृत का 'पशु' शब्द और लैटिन का 'Pecus' (पेकुस) दोनों एक ही भारोपीय (Proto-Indo-European) मूल से निकले हैं।
- व्युत्पत्ति: ये शब्द PIE मूल *peku- से संबंधित हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसी 'पेकुस' से आधुनिक अंग्रेजी का शब्द 'Pecuniary' (वित्तीय/धन संबंधी) बना है।
- सांस्कृतिक सूत्र: वैदिक संस्कृति में 'पशु' का अर्थ केवल चौपाया जानवर नहीं था, बल्कि वह 'संपत्ति' का पर्यायवाची था। ठीक इसी प्रकार प्राचीन रोम में 'Pecus' शब्द आर्थिक इकाई का आधार था।
२. पशु: मुद्रा और अर्थव्यवस्था के आधार (Livestock as Currency)
प्राचीन काल में विनिमय का कोई धातु-आधारित सिक्का (Coinage) प्रचलित होने से पहले, पशु ही 'मुद्रा' का कार्य करते थे।
- वैदिक संदर्भ: ऋग्वेद में गायों को 'धन' (गो-धन) माना गया है। दक्षिणा के रूप में गायों का दान देना इसी आर्थिक महत्ता को दर्शाता है।
- यूरोपीय संदर्भ: लैटिन शब्द 'Pecunia' (धन) सीधे तौर पर 'Pecus' (पशु) से जुड़ा है। यह इस तथ्य का भाषाई प्रमाण है कि प्राचीन यूरोप में व्यक्ति की अमीरी उसके पास मौजूद पशुओं की संख्या से मापी जाती थी।
३. 'ग्रास भूमि' (Pasture) और 'ग्राम' संस्कृति का उदय
गद्य का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पशुपालन, भूगोल और सामाजिक संरचना के बीच के संबंध को जोड़ना है:
- घास और ग्रास: जहाँ पशुओं के लिए प्रचुर मात्रा में 'घास' उपलब्ध थी, वहीं समुदायों का ठहराव शुरू हुआ। संस्कृत का 'ग्रास' (कौर या आहार) और अंग्रेजी का 'Grass' केवल ध्वन्यात्मक रूप से समान नहीं हैं, बल्कि ये उस प्राथमिक संसाधन की ओर संकेत करते हैं जिसके इर्द-गिर्द जीवन का पहिया घूमता था।
-
ग्राम (Village) का प्रादुर्भाव: 'ग्राम' शब्द की व्युत्पत्ति के पीछे एक तर्क यह भी है कि यह उन पशुपालक परिवारों का समूह था जो चरागाहों (Grasslands) के समीप बस गए थे।
- जहाँ पर्याप्त घास थी, वहाँ पशु थे।
- जहाँ पशु थे, वहाँ आर्थिक सुरक्षा थी।
- जहाँ आर्थिक सुरक्षा थी, वहाँ 'ग्राम' (स्थायी बस्ती) का निर्माण हुआ।
४. आर्थिक से सामाजिक संक्रमण
यह विवेचना स्पष्ट करती है कि सभ्यता का विकास 'पशुपालक (Pastoralists)' से 'कृषक (Agriculturalists)' की ओर हुआ। 'पशु' न केवल भोजन और परिवहन के साधन थे, बल्कि वे पूंजी (Capital) के प्रथम रूप थे।
तालिका: भाषाई और आर्थिक तुलना
|
शब्द (संस्कृत) |
शब्द (लैटिन/यूरोपीय) |
साझा मूल (PIE) |
आधुनिक अर्थ/प्रभाव |
|---|---|---|---|
|
पशु |
Pecus |
*peku- |
संपत्ति / धन (Pecuniary) |
|
गा: (Gauh) |
Cow / Bos |
*gwou- |
आर्थिक इकाई / जीविका |
|
ग्रास |
Grass |
*ghras- |
चरागाह आधारित संस्कृति |
निष्कर्ष
आपका गद्य इस सत्य को उद्घाटित करता है कि 'ग्राम संस्कृति' कोई अचानक हुआ आविष्कार नहीं था, बल्कि यह पशुपालन की आर्थिक आवश्यकता और भौगोलिक अनुकूलता (घास भूमि) का स्वाभाविक परिणाम था। भाषा यहाँ एक 'जीवाश्म' (Fossil) की तरह कार्य कर रही है, जो हजारों साल पुरानी उस अर्थव्यवस्था की गवाही दे रही है जहाँ 'पशु' ही बैंक और 'चरागाह' ही बाजार थे।
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