मोह और माया के जाल में, उलझ-उलझ कर हारा आदमी।
कहता मैने खरीदा है आसमान और जमीं । है अक्ल का मारा आदमी।
बच नहीं पाया है हवश की आग से कोई, पतंगे सा झुलस गया ये आवारा आदमी ।
ढूँढता है सुकून पर एक लम्पटता है इसके हावभावों में।
ईमान डिग जाते हैं रोहि जब तिश्नगी के बहावों में।
नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि तब सूरत के भावों में।
आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है, एक खोखलापन होता है उसके सारे दावों में।
अन्तरा-४-
झूठे रिश्तों की आड़ में, करता रहता है ,छल ये पल पल ।
पल-पल बदलता है ये मुखौटे, जब जाते हैं इसके मतलब निकल।
मौत का खौफ़ भी छुप जाता है इसका मन्दिर की मूर्त के चढावों में।
ईमान डिग जाते हैं रोहि जब तिश्नगी के बहावों में।
नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि तब सूरत के भावों में।
आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,
एक खोखलापन होता है उसके सारे दावों में।
५-
दुनियाँ की चौखट पर जो लोग सिर झुकाते हैं।
वे भीख मांगते हैं भिखारियों से और गिड़गिड़ाते हैं।
वह लोग ईश्वर को रोहि कहाँ ढूँढ़ पाते हैं। आदमी की जिन्दगी ढल जाती है बस दिखावों में ।
ईमान डिग जाते हैं रोहि जब तिश्नगी के बहावों में।
नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि सूरत के भावों में।
आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है, एक खोखलापन रह गया है उसके सारे दावों में।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें