मंगलवार, 15 सितंबर 2026

एक मुलाकात- गीत


बोल आजादपुर वाली मइया की जय!
बोल आजादपुर वाली मइया की जय!
छन्द:
साधु जो साधना करे ,रोहि सन्त वही जो शान्त!    मुनि मनन मन से करे ! कुछ तपने के उपरान्त।।
 तपन जपन और साधु पन, तब पराजित होते आक्रन्त।

(मुखड़ा)
ईमान डिग जाते हैं  रोहि जब तिश्नगी के बहावो में।
-नूर ए सीरत मिट जाती है ,तब सूरत के भावों में।
आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है।
एक खोखलापन होता है  उसके सारे दावों में ।
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अन्तरा -
अय्याश की आश, जैसे अग्नि की प्यास।        शान्त होती नही कभी भी ,
न रहता होशो हबास। मन को साधते रहो निरन्तर करते रहो प्रयास!

आग जिन्दा है अब तक देखों आफतावों में।
ईमान डिग जाते हैं,जब तिश्नगी के बहावो में।
नूर ए सीरत मिट जाती है ,रोहि तब सूरत के भावों में ।
आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होगयी है।
एक खोखलापन रह गया है, उसके सारे दावों में ।

अन्तरा-२--

मन ही  गुनाह ओ कुसूर का सबब है ।          रोहि इस मुल्को जहान में।
मन से दिक्कतें, मन से वरक्कतें। मन के ही  किरदार, इन्सान में। 
"रियाज़त ए ख़ुदा के सबक हैं बस कन्हैया की किताबों में। 
ईमान डिग जाते हैं, जब तिश्नगी के बहावो में।
नूर ए सीरत मिट जाती है ,रोहि तब सूरत के भावों में ।
आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत हो गयी है।
एक खोखलापन रह गया है, उसके सारे दावों में ।

अन्तरा (३)

​मोह और माया के जाल में, उलझ-उलझ कर हारा आदमी।

कहता मैने खरीदा है आसमान और जमीं ।    है अक्ल का मारा आदमी।  

बच नहीं पाया है हवश की आग से कोई, पतंगे सा झुलस गया ये आवारा आदमी ।

​ढूँढता है सुकून पर एक लम्पटता है इसके हावभावों में।

​ईमान डिग जाते हैं रोहि जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है, एक खोखलापन होता है उसके सारे दावों में।

अन्तरा-४-

झूठे रिश्तों की आड़ में, करता रहता है ,छल ये पल पल ।

पल-पल बदलता है ये मुखौटे, जब जाते हैं इसके मतलब निकल। 

​मौत का खौफ़ भी छुप जाता है इसका मन्दिर की मूर्त के चढावों में।

​ईमान डिग जाते हैं रोहि जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,

एक खोखलापन होता है उसके सारे दावों में।

५-

दुनियाँ की चौखट पर जो लोग सिर झुकाते हैं। 

वे भीख मांगते हैं भिखारियों से और गिड़गिड़ाते हैं। 

वह लोग ईश्वर को रोहि कहाँ ढूँढ़ पाते हैं। आदमी की जिन्दगी ढल जाती है बस दिखावों में ।

​ईमान डिग जाते हैं रोहि जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि  सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है, एक खोखलापन रह गया है उसके सारे दावों में।




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