इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। वह चलता रहा गुनाह में!
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अनतरा-★१
आज तक वो सिलसिला उसका जारी है ।
उसके ये कर्म मन की दस्तकारी है।
लोभ, मोह मद, जीवन की सरहद , उसके मिटने की तैयारी है।
वह गल्प और लतों में मसगूल । गफलत से उसकी यारी है।
वक्त है इसका गवाह! उसके मंजर ए गवाह में!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही पता। वह करता रहा गुनाह!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही पता। खुद को मिटाया गुनाह में!
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कर्म से कायम है दुनियाँ , रोहि कर्म जीवन की सौगात ।
मन वचन तन से, है इस कर्म की शुरुआत!
कर्म रोहि चलते हैं सदा इन्सान के पीछे।
जैसे चलती है परछाँयी वजूद के पीछे!
जेहन से नीचे है मन, इन्द्रियाँ मन के नीचे।।
इन्द्रियाँ जातीं उधर, मन उनको जिधर खींचे।
इन्सान जब आहत हुआ, एक दर्द था उसकी आह में!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। वह करता रहा गुनाह!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। वह करता रहा गुनाह!
दर्द और आनन्द के पढाव विपरीत विपरीत राह में!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। जनन बिताया गुनाह में !
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। जीवन बिताया गुनाह में !
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