मुखड़ा )
घनश्याम मुरली वाले, हम हैं तेरे हवाले
अरदास तुझ से करते, तू ही हमें संभाले
तू ही हमें संभाले,
तेरे भजनों को गाएंगे, सजदे में सर झुकाएंगे।
पुकार हमारी सुन ले ओ भक्तों के रखवाले।
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माया का यह प्रपंच, जग झूठी शान दिखाता है
जो दिखता है चोले में, मन में नहीं वो पाता है
यह झूठा जगत मुसाफिर, मतलब का सब नाता है ।
जिसने करके पाया यहाँ, खाली वो जाता है।
उम्र से गुजर जाएंगे,तब पढाब अनुभव के पाऐंगे।
ज्ञान की ज्योति को जलाएंगे, अज्ञान का तमस मिटाएंगे
घनश्याम मुरली वाले, हम हैं तेरे हवाले
अरदास तुझ से करते, तू ही हमें संभाले
तू ही हमें संभाले,
तेरे भजनों को गाएंगे, सजदे में सर झुकाएंगे।
ये भाव हमारे सुन ले ओ भक्तों के रखवाले।
सुख और दुःख की लहरों में, मन क्यों घबराता है पगले।
जो आया है वो जाएगा, आये कितने गये काफिले।
जीवन की प्रयोग शाला में, हर जीव है अपनी उलझन में,
तू धीरज धर, विश्वास बढ़े, प्रभु का सिमरन कर ले मन में ,
कर्म की डोरी थाम के हम तो, भवसागर तर जाएंगे
तेरे भजनों को हम गाएंगे, सजदे में सर को झुकाएंगे।
घनश्याम मुरली वाले, हम हैं तेरे हवाले
अरदास तुझ से करते, तू ही हमें संभाले
तू ही हमें संभाले,
ये भाव हमारे सुन ले ओ भक्तों के रखवाले ।
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घट-घट वासी वो अंतर्यामी, हर कोने में वो रहता है।
बिन पग के वो सब जग चलता, बिन कानन के बह सुनता है।
जो शरणागत हो जाता है, उसके सारे कष्ट वो हरता है।
अब भेद मिटे द्विविधाओं के, उस मोहन से चित्त को लगाले
प्रेम की धारा में बह कर, प्रभु चरणन में मिल जाएंगे
तेरे भजनों को हम गाएंगे, सजदे में सर को झुकाएंगे।
घनश्याम मुरली वाले, हम हैं तेरे हवाले
अरदास तुझ से करते, तू ही हमें संभाले
तू ही हमें संभाले,
ये भाव हमारे सुन ले ओ भक्तों के रखवाले ।
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उत्तरी भारतीय लोक संगीत शैली में हारमोनियम चीमटा व ढोलक की ताल पर गीत स्त्री पुरुष स्वर में गायें !
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं।
शराफ़तों की हिफाजतो में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥
अपने अहम में गुम है बटोही , चले जिन पथों पे मंज़िल ना कोई।
व्यर्थ ही समय को गंवा रहे हैं, आते हैं पास जो बनके अपने, वो ही आंखें दिखा रहे हैं॥
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥
हमारे दिल के गमों की शह पर, उभरते जख्मों की हर एक तह पर।
कुछ तो बिजली गिरा रहे हैं, मंदिर से जारत की महकमें, प्रसाद अब विष मिला रहे हैं॥
थोड़ी सी जिंदगी अब सुधरलो, जीवन के सफर को पाथेय धरलो ।
न वक्त ऐसा, रहे हमेशा, पल पल चलना तुम संभल के॥
अरमाँ खाक हो गए जल के, आग अभी भी दहक रही है।
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने ही खंजर दिखा रहे हैं॥
ईश्वर के नामों पर कर्म गन्दे, मंदिर में धन्धे चला रहे हैं॥
अपने गमों के संग तू अकेला, खुशियों का तेरा झूठा मेला।
फिर भी वफ़ा की राहों पे चल के, ठोकरों में खुद ही संभल के॥
जंझाबतों से खुद निकल के, अब भी हम तो घबरा रहे हैं।
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥
शराफ़तों की हिफाजतो में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥
हमारे दिल के गमों की शह पर, उभरते जख्मों की हर एक तह पर।
कुछ तो बिजली गिरा रहे हैं, अजीब देखे हैं हम मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥
प्रस्तुत गजल को सुगम संगीत की शैली में
राग काफी (Kafi Raga) पर आधारित करके गायें और इसे आमतौर पर कहरवा ताल में गाया-बजायें इस अर्ध-शास्त्रीय और गंधार (गा) और निषाद (नी) कोमल स्वरों का प्रयोग इसकी मिठास को और बढ़ाऐं।
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