यशोदा जी का पारिवारिक स्वरूप और वर्ण
[आरंभिक संगीत - हल्का और गंभीर, पारंपरिक पृष्ठभूमि धुन]
नियोजक/वाचक (उत्साह और स्पष्टता के साथ):
नमस्कार श्रोताओं! आज हम "यादव योगेश कुमार रोहि" के शोधों से उद्धृत तथ्यों के आधार पर, इतिहास और पुराणों के पन्नों से, एक बेहद रोचक और महत्वपूर्ण सत्य पर चर्चा कर रहे हैं।
अक्सर लोक-कथाओं में पात्रों के रूप-रंग को लेकर कई धारणाएं प्रचलित हो जाती हैं, लेकिन जब हम मूल आर्ष ग्रंथों और पुराणों की गहराई में उतरते हैं, तो कुछ अनछुए और प्रामाणिक तथ्य सामने आते हैं।
आइए, आज बात करते हैं भगवान श्रीकृष्ण की माता, यशोदा जी के परिवार की—विशेष तौर पर उनके पिता, भाइयों और बहनों के शारीरिक वर्ण और स्वरूप की, जो हमें "श्रीश्रीराधाकृष्णगणोद्देश्य दीपिका" जैसे ग्रंथों से प्राप्त होते हैं।
[संगीत परिवर्तन - थोड़ा सा मद्धम और संवाद शैली]
वाचक:
सबसे पहले बात करते हैं यशोदा जी के पिता सुमुख (जिन्हें गिरिभानु भी कहा गया है) की। ग्रंथों में उनका बड़ा ही अनूठा वर्णन मिलता है:
“लम्बकम्बुसमश्रु: पक्वजम्बूफलच्छवि:।”
अर्थात्: श्रीकृष्ण के नाना यशोदा के पिता सुमुख की लम्बी दाढ़ी शंख के समान सफेद थी, और उनकी अंगकान्ति पके हुए जामुन के फल जैसी यानी श्यामल (साँवला) थी।
अब आगे बढ़ते हैं और स्वयं माता यशोदा के स्वरूप को देखते हैं। श्रीश्रीराधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका और गर्गसंहिता के मूल संदर्भ बताते हैं:
“माता गोपान् यशोदात्री यशोदा श्यामलद्युति:।”
अर्थात्: गोप जाति को यश देने वाली माता यशोदा की अंगकान्ति भी श्यामल वर्ण की ही थी। हालांकि, बाद के कालखंड में (विशेषकर उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में) कुछ प्रक्षेप या बदलाव करके इन्हें गौरवर्णा दिखाने का प्रयास किया गया, लेकिन मूल परंपरा और ग्रंथ यही गवाही देते हैं कि उनका वर्ण सांवला ही था। और विष्णु यामल तन्त्र व कृष्ण यामल तन्त्र के अनुसार ये यशोदा से उत्पन्न थे। यामल तन्त्र में वर्णन है।
श्रीकृष्ण का प्राकट्य
श्रीगौड़ीय सम्प्रदाय के अनुयायी सन्तों की मान्यता है कि जिस समय कारागार में श्रीवसुदेव-देवकी के सम्मुख चतुर्भुजरूप में भगवान् प्रकट हुए थे, उसी समय नन्दबाबा के घर पर भी यशोदानन्दन के रूप में द्विभुजरूप में भगवान प्रकट हुए थे।
और यशोदा माता ने जुड़वाँ रूप में दो सन्तानों को जन्म दिया था—पुत्र का नाम गोविन्द और पुत्री का नाम अम्बिका था। विदित हो कि भगवान का द्विभुजधारी गोप रूप गोलोक का शाश्वत रूप है, जबकि चतुर्भुज रूप वैकुण्ठ वासी विष्णु रूप है।
श्रीमद्भागवत, दशमस्कन्ध के पञ्चम अध्याय के प्रथम श्लोक में वर्णन आया है—
नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताह्नादो महामनाः।
यह श्लोक श्रीमद्भागवतपुराण (स्कन्ध १०, अध्याय ५, श्लोक १) से है, जो कहता है कि पुत्र के उत्पन्न होने पर महान हृदय वाले नन्द को आनन्द हुआ, और उन्होंने स्नान व शुद्ध होकर अलंकार धारण किए तथा वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलाया। यह नन्द के पुत्र प्राप्ति के आनंद और जातकर्मादि उत्सव की प्रारम्भिकता का वर्णन करता है। पूर्ण श्लोक निम्नलिखित है:
नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताह्लादो महामनाः।
आहूय विप्रान् वेदज्ञान् स्नातः शुचिरलंकृतः॥ १॥
वाचयित्वा स्वस्त्ययनं जातकर्मात्मजस्य वै।
कारयामास विधिवत् पितृदेवार्चनं तथा॥ २॥
अनुवाद:
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित् ! नन्दबाबा बड़े मनस्वी और उदार थे। पुत्र का जन्म होने पर तो उनका हृदय विलक्षण आनन्द से भर गया। उन्होंने स्नान किया और पवित्र होकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये। फिर वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलवाकर स्वस्तिवाचन और अपने पुत्र का जातकर्म-संस्कार करवाया। साथ ही देवता और पितरों की विधिपूर्वक पूजा भी करवायी ॥१-२॥
[संगीत - ध्यान खींचने वाला मधुर वाद्ययंत्र]
वाचक:
अब बात करते हैं यशोदा जी के भाइयों की। ब्रह्मवैवर्त पुराण और अन्य संदर्भों के अनुसार, यशोदा जी के तीन भाई थे—यशोधर, यशोदेव और सुदेव।
इन तीनों भाइयों के शारीरिक वर्ण के बारे में ग्रन्थ बताता है:
“अतसी पुष्परुचय: पाण्डराम्बर-संवृता:”
यानी इन तीनों भाइयों की अंगकान्ति नीले रंग के अलसी के फूल (अतसी पुष्प) के समान श्यामल थी, और ये हल्का पीलापन लिए हुए श्वेत वस्त्र धारण करते थे।
भाइयों के साथ-साथ यशोदा जी की बहनों का विवरण भी उतना ही स्पष्ट है। यशोदा जी की दो सहोदरा बहनें थीं—यशोदेवी और यशस्विनी (जिन्हें दधिस्सारा और हविस्सारा भी कहा गया है)। इनमें से बड़ी बहन यशोदेवी की अंगकान्ति स्पष्ट रूप से श्याम वर्ण (श्यामली) बताई गई है।
[समापन संगीत - गम्भीर और प्रेरणादायक]
वाचक:
तो इन सभी प्रमाणों से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि नंद-यशोदा का यह पूरा परिवार—चाहे वह उनके पिता सुमुख हों, उनके तीनों भाई (यशोधर, यशोदेव, सुदेव) हों, या स्वयं माता यशोदा और उनकी बहनें हों—प्राचीन आर्ष परंपरा के अनुसार श्यामल (साँवले) वर्ण और अपनी विशिष्ट आभीर संस्कृति की प्राकृतिक विशेषताओं से युक्त था।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें