गुरुवार, 13 अगस्त 2026

कब्बाली

कब्बाली- 
​पुरुष स्वर:
(संजीदगी और गहरे ठहराव के साथ)
"अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं...
शराफ़तों की हिफाज़तों में, हम वो कीमत चुका रहे हैं!"

​[मुख्य मुखड़ा - युगल स्वर]
​(हारमोनियम और ढोलक की रफ़्तार थोड़ी तेज़ होती है। दोनों स्वर मिलकर पूरी ताकत और दर्द के साथ मुखड़ा गाते हैं)
​स्त्री व पुरुष (साथ मिलकर):

​"अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं।
शराफ़तों की हिफाज़तों में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥"
​(ढोलक की थाप पर ताल गूंजती है)
​[पहला अन्तरा]
​पुरुष स्वर:
अपने गुमान में गुम है बटोही, चले जिन पथों पे, जहाँ मंज़िल ना कोई।
खोजते-खोजते खुद को 'रोहि', मोह के भँवर में ज़िन्दगी डुबोई॥
​स्त्री स्वर:
व्यर्थ ही समय को गंवा रहे हैं, आते हैं पास जो बनके शागिर्द,  इर्द गिर्द वोही सता रहे हैं ।
(तड़प के साथ) वोही हमको समझा रहे हैं!
​युगल स्वर (कोरस):
​"अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥"
​[दूसरा अन्तरा]
​स्त्री स्वर:
हमारे दिल के गमों की शय पर, उभरते जख्मों की हर-एक तह पर।
खुशियों के होते विलय पर...
​पुरुष स्वर:
कुछ तो बिजली गिरा रहे हैं!

अजीब देखे हैं हम मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं...
अपने अपने को खा रहे हैं...!!"
​(ढोलक की एक लंबी थाप और हारमोनियम के अंतिम सुर के साथ कब्बाली समाप्त होती है।)

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