ब्रिटिश बैंड, होली और अहीर-जाट-गूजर का शौर्य'
अवधि: 2 मिनट
पात्र/आवाजें:
- सूत्रधार (Voiceover): गहरी, गंभीर और इतिहास की खुशबू समेटे हुई आवाज़।
- ब्रिटिश गायक (लॉर्ड एरिक): शालीन अंग्रेजी लहजे में हिंदी बोलने वाला विदेशी संगीतकार।
- ग्रामीण अहीर बुजुर्ग: अनुभव और गर्व से भरी भारी आवाज़।
[भाग 1: प्रस्तावना]
- ऑडियो (Audio): पृष्ठभूमि में दूर बजते पारंपरिक ढोल, मंजीरों की गूँज और साथ में एक ब्रिटिश क्लासिकल वायलिन या ब्रास की धीमी धुन का सुंदर सम्मिश्रण।
- सूत्रधार: > "इतिहास के बिखरे हुए पन्नों से एक अनसुनी दास्तान... बात फाल्गुन मास की उस पूर्णिमा की है, जब उत्तर भारत के अहीर, जाट और गूजरों के एक साझा गाँव में होली का हुड़दंग मचा था। और उस जश्न को और भी खास बनाने मीलों दूर ब्रिटेन से एक खास मेहमान मंडली पहुँची थी—खुद ब्रिटिश महारानी के दरबार की एक संगीत मंडली!"
[भाग 2: मेहमानों का स्वागत और संगीत]
- ऑडियो (Audio): बैंड के इंस्ट्रूमेंट्स (क्लैरिनेट और ट्रम्पेट) के साथ होली के फाग गीतों की मिलाप वाली धुन। हँसी-ठिठोली और 'होली है' का शोर।
- लॉर्ड एरिक (उत्साहित स्वर में): > "वंडरफुल! अद्भुत! मैंने दुनिया भर के रणक्षेत्र देखे हैं, लेकिन अहीर, जाट और गूजरों का यह भाईचारा और उनकी वीरता का यह पर्व... ऐसा जोश और रंग मैंने कहीं नहीं देखा। आज यह ब्रिटिश संगीत मंडली इन तीनों महान जातियों के शौर्य और संस्कृति की प्रशंसा में अपने सुर मिलाती है!"
[भाग 3: आपसी संवाद और सम्मान]
- ऑडियो (Audio): ढोल की थाप तेज होती है, तालियों की गड़गड़ाहट।
- ग्रामीण अहीर बुजुर्ग: > "साहब, ढोल और नगाड़े तो हमारी रगों में बसते हैं। आज विदेश से आए मेहमानों ने हमारे इन जांबाज़ों—अहीर, जाट और गूजरों—के मान में जो सुर छेड़े हैं, उसने इस होली को हमेशा के लिए अमर कर दिया है।"
[भाग 4: समापन]
- ऑडियो (Audio): संगीत का एक भव्य और उल्लासपूर्ण अंत, जो रंगों की बौछार का अहसास कराए।
- सूत्रधार: > "जब विदेशी सुरों ने देसी लोकगीतों से हाथ मिलाया, तो सरहदें और फासले मिट गए। यह गवाही थी उस संस्कृति की, जिसके आगे हुक्मरानों के बैंड भी नतमस्तक हो गए। देखते रहिए—'इतिहास के बिखरे हुए पन्ने'।"
उद्घोषक:
गीत और संगीत मण्डली का संयोजन किया है— यादव योगेश कुमार, रोहि, जिला अलीगढ़ (आजादपुर वालों ने)।
मुखड़ा
फागुन की आई रे रुत रंगीली,
ब्रज में छाया प्यार का रंग।
गोकुल की गलियों में गूंजे,
हंसी-पिचकारी का उमंग!
अंतरा 1
गुर्जर और जाट सब,
ले पिचकारी हाथों में,
रंग-गुलाल की बरसात हुई,
प्रेम भरे हर बातों में।
बंसी की तान पे झूम उठे,
ग्वाल-बाल सा जहाँ,
होली की इस पावन अवसर पर,
खेळो था हरे मर का गान!
अंतरा 2
फागुन की आई रे रुत रंगीली,
आई होली त्योहार की!
ब्रज में मची धूम भारी है,
बही बयार प्यार की।
गुर्जर और जाट मिले हैं,
ले पिचकारी हाथों में,
आज मचेगी ऐसी होली,
ब्रजवासियों की जमात में!
अंतरा 3
बंदगांव की कुंज गलियों में,
गोलन गा रे बाजे जोर से,
दूध-दही के माप के कूदे,
मस्ती छल्की हर ओर से!
धूल उड़ा के नाचे सब,
छूटे सारे गम के पल,
आन-बान और शान से चमके,
ब्रज के दिल के रंग सर!
अंतरा 4
चौपालों पर मिल कर सब ने,
होई चाय की शपथ ली,
रंग-प्रेम का ऐसा बरसा,
हर दूरी भी कम हो चली!
फागुन की आई रे रुत रंगीली,
आई होली त्योहार की,
ब्रज में मची धूम भारी है,
बही बयार प्यार की!
गुर्जर और जाट मिले हैं,
ले पिचकारी हाथों में,
आज मचेगी ऐसी होली,
ब्रज-वासिण की जमात में!
यह हमेशा अमर भाईचारे की,
ये होली अमर कहानी है,
रोहित की यह पर्व सदा,
दिनों की सबसे प्यारी निशानी है!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें