यदुवंशस्य संहितेयम्, पावनी लोकधारिणी।अर्पिता गोपैर्हंसैश्च, विष्णोश्चरणपङ्कजयो:।।१।
श्रीकृष्ण-महिमा स्तोत्रम्
१. स्रग्धरा/शार्दूलविक्रीडित छन्द (मिश्रित लय):
गोलोके निवसन्तमृद्धिमधुरं गोपैश्च गोपीगणैः,सृष्टिस्थित्यनुपालनैकचतुरं पूर्णं वपुः केशवम्।
यद्भक्तिः परिनिर्मला च विमला सर्वोत्तमा सर्वदा,
यः संसारसमुद्रतारणपटुस्त्रैलोक्यरक्षाकरः॥१।
२. उपजाति/इन्द्रवज्रा छन्द:
यत्रावतारं कृतवान् स्वयं वै, साक्षात् परब्रह्म जनार्दनो हि।
धर्मप्रतिष्ठापनतत्पराय, तस्मै नमः पावनयादवाय॥
विराट्स्वरूपं परमार्थवित्त्वं, यस्याचलैश्वर्यमपाररूपम्।
यस्मात् परं नास्ति पदं वरिष्ठं, तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम्॥
३. वंशस्थ/इन्द्रवज्रा छन्द:
इन्द्रस्य दर्पं दलयन् सलीलं, गोपेन्द्रगोष्ठस्य च रक्षणाय।
यो धारयामास गिरिं नखाग्रे, तं वन्दनीयं गिरिधारिदेवम्॥कलासमूहैः परिपूर्णदेहं, रत्नाकरं भक्तकृपाविधानम्। सुदर्शनं धारयते करे यः, तस्मै नमः श्रीवरगोविन्दाय॥
४. अनुष्टुप् छन्द (सरल व्याकरण सम्मत):
दुष्टं कंसं शमयितुं, यः प्रेषितवान् यमक्षयम्। यदुकुलस्य पालाय, तस्मै पवनमूर्तये॥
यन्निमेषेण संहर्तुं, शक्यते विश्वमण्डलम्।उन्मेषेण पुनर्व्याप्तं, तं वन्दे विश्वेश्वरं हरिम्॥
५. लीला वर्णन (अनुष्टुप्):
स्वकीयरोमकूपेभ्यः, गोपगोपीः ससर्ज यः।दिव्यलीलाविहाराय, तस्मै लीलात्मने नमः॥
नारायणीं चमूं गृह्य, हत्वा दुष्टान् सलीलया।धर्मसंस्थापनार्थाय, कृष्णाय सततं नमः॥
६. फलश्रुति/उपसंहार:
कृते त्रेतायुगे चैव, द्वापरे कलिकाले तथा।सर्वलोकैकवन्द्याय, कृष्णाय विष्णवे नमः॥
व्याकरणिक एवं छन्द सुधार के मुख्य बिन्दु:
- सन्धि नियम: 'समुद्रतारणपटुः त्रिलोकी' के स्थान पर विसर्ग सन्धि के नियमानुसार 'समुद्रतारणपटुस्त्रैलोक्य' अधिक उपयुक्त है।
- शब्दावली: 'कन्हैया' शब्द मूल संस्कृत का न होकर तद्भव (हिन्दी/ब्रज) है। स्तोत्र की शुद्धता के लिए यहाँ 'केशवम्' या 'कन्हम्' (संस्कृत रूप) का प्रयोग किया गया है।
- कारक शुद्धि: 'शमनस्य लोकं' के स्थान पर 'यमक्षयम्' (यमलोक) या 'शमयितुं' (शान्त करने के लिए/वध के लिए) व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है।
- छन्द बद्धता: श्लोक संख्या ८ और ९ को अनुष्टुप् छन्द (8-8-8-8 वर्ण) के सांचे में ढाला गया है ताकि गायन में सुगमता रहे।
- शब्द चयन: 'पावनयादवाय' में सन्धि के कारण अर्थ स्पष्ट होता है— पावन + यादवाय (पवित्र यादव के लिए)।
विशेष: भगवान श्रीकृष्ण की महिमा अपार है। व्याकरणिक शुद्धि केवल काव्य सौंदर्य के लिए है, भक्ति में भाव ही प्रधान होता है।
श्रीकृष्ण-महिमा स्तोत्रम्
१. स्रग्धरा/शार्दूलविक्रीडित छन्द (मिश्रित लय):
गोलोके निवसन्तमृद्धिमधुरं गोपैश्च गोपीगणैः,सृष्टिस्थित्यनुपालनैकचतुरं पूर्णं वपुः केशवम्।
यद्भक्तिः परिनिर्मला च विमला सर्वोत्तमा सर्वदा,
यः संसारसमुद्रतारणपटुस्त्रैलोक्यरक्षाकरः॥१।
२. उपजाति/इन्द्रवज्रा छन्द:
यत्रावतारं कृतवान् स्वयं वै, साक्षात् परब्रह्म जनार्दनो हि।
धर्मप्रतिष्ठापनतत्पराय, तस्मै नमः पावनयादवाय॥
विराट्स्वरूपं परमार्थवित्त्वं, यस्याचलैश्वर्यमपाररूपम्।
यस्मात् परं नास्ति पदं वरिष्ठं, तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम्॥
३. वंशस्थ/इन्द्रवज्रा छन्द:
इन्द्रस्य दर्पं दलयन् सलीलं, गोपेन्द्रगोष्ठस्य च रक्षणाय।
यो धारयामास गिरिं नखाग्रे, तं वन्दनीयं गिरिधारिदेवम्॥कलासमूहैः परिपूर्णदेहं, रत्नाकरं भक्तकृपाविधानम्। सुदर्शनं धारयते करे यः, तस्मै नमः श्रीवरगोविन्दाय॥
४. अनुष्टुप् छन्द (सरल व्याकरण सम्मत):
दुष्टं कंसं शमयितुं, यः प्रेषितवान् यमक्षयम्। यदुकुलस्य पालाय, तस्मै पवनमूर्तये॥
यन्निमेषेण संहर्तुं, शक्यते विश्वमण्डलम्।उन्मेषेण पुनर्व्याप्तं, तं वन्दे विश्वेश्वरं हरिम्॥
५. लीला वर्णन (अनुष्टुप्):
स्वकीयरोमकूपेभ्यः, गोपगोपीः ससर्ज यः।दिव्यलीलाविहाराय, तस्मै लीलात्मने नमः॥
नारायणीं चमूं गृह्य, हत्वा दुष्टान् सलीलया।धर्मसंस्थापनार्थाय, कृष्णाय सततं नमः॥
६. फलश्रुति/उपसंहार:
कृते त्रेतायुगे चैव, द्वापरे कलिकाले तथा।सर्वलोकैकवन्द्याय, कृष्णाय विष्णवे नमः॥
व्याकरणिक एवं छन्द सुधार के मुख्य बिन्दु:
- सन्धि नियम: 'समुद्रतारणपटुः त्रिलोकी' के स्थान पर विसर्ग सन्धि के नियमानुसार 'समुद्रतारणपटुस्त्रैलोक्य' अधिक उपयुक्त है।
- शब्दावली: 'कन्हैया' शब्द मूल संस्कृत का न होकर तद्भव (हिन्दी/ब्रज) है। स्तोत्र की शुद्धता के लिए यहाँ 'केशवम्' या 'कन्हम्' (संस्कृत रूप) का प्रयोग किया गया है।
- कारक शुद्धि: 'शमनस्य लोकं' के स्थान पर 'यमक्षयम्' (यमलोक) या 'शमयितुं' (शान्त करने के लिए/वध के लिए) व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है।
- छन्द बद्धता: श्लोक संख्या ८ और ९ को अनुष्टुप् छन्द (8-8-8-8 वर्ण) के सांचे में ढाला गया है ताकि गायन में सुगमता रहे।
- शब्द चयन: 'पावनयादवाय' में सन्धि के कारण अर्थ स्पष्ट होता है— पावन + यादवाय (पवित्र यादव के लिए)।
विशेष: भगवान श्रीकृष्ण की महिमा अपार है। व्याकरणिक शुद्धि केवल काव्य सौंदर्य के लिए है, भक्ति में भाव ही प्रधान होता है।
(क)- श्रीकृष्ण का वैदिक परिचय-
(ख)- श्रीकृष्ण का पौराणिक परिचय-
(१) -गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय -
(२) -भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(ग)- ऐतिहासिक परिचय-
(१)- पुरातात्विक साक्ष्य- के अन्तर्गत- मोहन जोदारो में कृष्ण, द्वारिका नगरी की खोज समुद्र के अन्तस्तल में,
आयचियर कुरवई' ४-पुरनानूरु ५-शिलप्पादिकारम ६-शिलप्पादिकारम ७-आण्डाल की भक्ति ।
भाग (क)-
इस भाग में श्रीकृष्ण का वैदिक परिचय अर्थात् ऋग्वेद में श्रीकृष्ण का कब , कहाँ और किस रूप में उल्लेख हुआ है ? इसके विषय में विस्तार पूर्वक जानकारी दी गई है। जिसमें सबसे पहले वेदों में वर्णित श्रीकृष्ण के गोलोक धाम के विषय (बारे) में जानकारी दी गई है। इसके बाद वेदों में वर्णित केशी असुर तथा कृष्ण से इन्द्र के उस युद्ध के बारे में जानकारी दी गई है। जो यमुना (अँशुमती) नदी के तट पर हुआ था। किस तरह भाष्यकारों ने उस युद्ध वाले प्रसंग की ऋचाओं में आये कुछ शब्दों के अर्थों को पूर्वदुराग्रह से ग्रस्त होकर अनर्थ करके कृष्ण को असुर या अदेव रूप में प्रस्तुत किया है।"
(1) वेदों में श्रीकृष्ण के गोप और उनके गोलोक का वर्णन-
ऋग्वेद मण्डल (१) के सूक्त- (१५४) की ऋचा (६) में श्रीकृष्ण के गोप और उनके गोलोक का वर्णन मिलता है। जिसमें लिखा गया है कि- गोलोक में श्रीकृष्ण के साथ गोप और भूरिश्रृँगा गायें रहती हैं। इसीलिए उस परमधाम को गोलोक अर्थात् गायों का लोक कहा जाता है। प्रस्तुत ऋचा में यह वर्णन देखें-
"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयास:। अत्राह तदुरुगायस्य वृष्ण: परमं पदमव भाति भूरि॥६।
यदुवंश संहिता और वैष्णव परम्परा के परिप्रेक्ष्य में इस ऋचा की व्याख्या अत्यन्त भक्तिमय और गूढ़ हो जाती है। यहाँ 'विष्णु' के उस स्वरूप की चर्चा है जो साक्षात् श्रीकृष्ण (गोलोक विहारी) के रूप में यादवों में प्रतिष्ठित उनके इष्ट हैं।
यदुवंश संहिता के अनुरूप हिन्दी अनुवाद-
"हम उन (श्री कृष्ण और बलराम) के उन परम धामों (गोलोक-) को प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं, जहाँ दिव्य स्वरूप वाली स्वर्ण युक्त सुनहरे सींगों वाली गाएँ सदैव विचरण करती हैं। उसी स्थान पर उन उरुगाय अर्थात् (अत्यधिक स्तुति किए जाने वाले) और भक्तों पर कृपा की वर्षा करने वाले प्रभु का वह परम पद (सर्वोच्च लोक- गोलोक) निरन्तर दैदीप्यमान रहता है।६।
विशिष्ट व्याख्या (यदुवंशीय एवं वैष्णव दृष्टिकोण)-
यदुवंश संहिता के सिद्धान्तों के अनुसार, इस ऋचा के शब्दों के गहरे आध्यात्मिक अर्थ निम्नलिखित हैं:
1. 'गावो भूरिशृङ्गा' (स्वर्ण युक्त सींगों वाली गौएँ)
सामान्य अर्थ में यह बड़े सींगों वाली गायें हैं, किन्तु संहिता के अनुसार ये सुनहरे सींग वाली 'सुरभि' गौएँ हैं जो गोलोक में निवास करती हैं। 'भूरि-शृङ्गा' यहाँ गौओं की दिव्यता और उनकी रक्षा करने वाले 'गोपाल' (कृष्ण) की महिमा को दर्शाता है।
2. 'वां' (आप दोनों):
ऋग्वेद में यह द्विवचन यदुवंशीय व्याख्या में इसे श्री कृष्ण और बलराम (संकर्षण) के युगल स्वरूप के रूप में देखा जाता है, जो ब्रज और गोलोक के स्वामी हैं।
3. 'उरुगायस्य वृष्णः' (महान यदुवंशी):
- उरुगाय: जिसका यश गान बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और भक्तगण करते हैं।
- वृष्णः यह शब्द श्लिष्ट अर्थ व्यञ्जना में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 'वृष्णि' वंश (यदुवंश की एक प्रमुख शाखा) की ओर संकेत करता है। यहाँ कृष्ण को 'वृष्णि-कुल-भूषण' माना गया है जो भक्तों की कामनाओं की वर्षा करते हैं।
4. 'परमं पदम्' (गोलोक धाम):
यदुवंश संहिता के अनुसार विष्णु का परम पद ही 'गोलोक' है। यह वह स्थान है जो सूर्य और चन्द्रमा के प्रकाश से परे स्वयं-प्रकाश होता है। ऋचा का अन्तिम भाग क्रिया पद है 'अव भाति भूरि' जो यह बताता है कि भगवान का वह स्वरूप वहाँ प्रचुरता के साथ चमकता है।
अर्थात् यह बात वेदों से भी सुनिश्चित है कि - परमेश्वर श्रीकृष्ण का सनातन निवास गोलोक है, जहाँ वे गोप-वेष में अपनी गायों तथा गोपों के साथ रहते हैं और और वे ही भगवान भूतल पर अपने गोपों के यहाँ समयानुसार गोप-वेष में ही अवतरित होकर धर्म की पुन: पुन: स्थापना करते हैं।
(2) वेदों में श्रीकृष्ण के लिए "विष्णुर्गोपा" विशेषण पद का प्रयोग-
वेद में कृष्ण को 'अवतारी परम पुरुष' के रूप में भी दर्शाया गया है। इसके लिए
ऋग्वेद (1/22/18) में श्रीकृष्ण के लिए "विष्णुर्गोपा" शब्द का प्रयोग विचारणीय है, जिसका अर्थ "अवतारी परम पुरुष जो विष्णु नाम से गोप वेष में रहते हैं।, जिसे श्रीकृष्ण का रूप माना जाता है। और वे स्वराट्- विष्णु (श्रीकृष्ण) वहाँ गोप रूप में अहिंस्य (अवध्य) हैं, और यही स्वराट-विष्णु ही श्रीकृष्ण, वासुदेव, नारायण आदि नामों से परवर्ती युग में लोकप्रिय हुए हैं। क्योंकि इस सम्बन्ध में ऐसा ही वेदों में लिखा गया है कि -
यह ऋचा ऋग्वेद (मण्डल -१, सूक्त -२२, मन्त्र- १८) से उद्धृत है। इसमें भगवान विष्णु के वामन अवतार और उनके द्वारा लोक-मर्यादा की स्थापना का वर्णन है।
ऋचा एवं अन्वय-
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः।अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥
हिन्दी अनुवाद
अविनाशी और सबके रक्षक सदैव गोप रूप में प्रतिष्ठित रहने वाले विष्णु ने (इस ब्रह्माण्ड को नापने के लिए) तीन कदम रखे। उन्हीं तीन कदमों के माध्यम से उन्होंने समस्त धर्मों (मर्यादाओं) और लोकों को धारण किया है।
वेदों में कृष्ण का ही गोप रूप में स्वराट् विष्णु नाम से वर्णन है। अन्यत्र भी
"वैदिक वाङ्मय में श्रीकृष्ण का गोप एवं धर्म-रक्षक का स्वरूप-
ऋग्वेद के कतिपय सूक्तों में श्रीकृष्ण के 'गोप' रूप और 'धर्म-संस्थापक' स्वरूप के बीज निहित हैं। विशेषकर प्रथम मण्डल का 'अस्य वामीय सूक्त' आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि सेएक अक्षय निधि है।
१. गोप रूप में परमात्मा का वर्णन (ऋग्वेद १.१६४)
ऋग्वेद के (१६४)वें सूक्त की ऋचा -२१ और -३१ में 'गोपा' शब्द का प्रयोग उस परम तत्व के लिए हुआ है जो विश्व का संरक्षक व गोप वेषधारी है।
(क) ऋचा २१: अमृतत्व और ज्ञान के अधिष्ठाता-
"यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाभिस्वरन्ति।इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश॥२१॥
-
- विश्लेषणात्मक भावार्थ: उस परमधाम में, जहाँ मुक्त आत्माएँ (सुपर्ण) निरन्तर सजग रहकर ज्ञान के माध्यम से परमानन्द का अनुभव करती हैं, उस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामी और 'गोप' (रक्षक) स्वरूप धैर्यवान परमात्मा मुझ परिपक्व जिज्ञासु के अन्तःकरण में प्रविष्ट हो गया है। यहाँ 'गोपा' शब्द श्रीकृष्ण के उस स्वरूप की ओर संकेत करता है जो चराचर जगत का पालन करता है।
(ख) ऋचा ३१: सर्वव्यापी अच्युत गोप-
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम् । स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥३१॥
- व्याकरणिक वैशिष्ट्य:
- अपश्यम्: मैंने साक्षात्कार किया (दृश् + लङ्)।
- गोपाम्: उस रक्षक/गोप रूप परमात्मा को।
- अनिपद्यमानम्: जिसका पतन नहीं होता, जो कभी थकता नहीं (अच्युत)।
- आ च परा च: इहलोक और परलोक में, सर्वत्र।
- पथिभिः चरन्तम्: विभिन्न मार्गों( से सञ्चरण करते हुए।
- आ वरीवर्ति: (वृत् + यङ् लुगन्त) बार-बार प्रकट होता है, पुनः-पुनः अवतार लेता है।
- विश्लेषणात्मक भावार्थ:- ऋषि कहते हैं कि मैंने उस 'अविनाशी गोप' को देखा है, जो कभी विचलित नहीं होता। वह नाना प्रकार के मार्गों से इस संसार में आता-जाता (अवतार ग्रहण करता) है। वह अपनी समस्त शक्तियों (कलाओं) को धारण कर सम्पूर्ण लोकों के भीतर निरन्तर व्याप्त रहता है।
अथर्ववेद (4.37.1)
संस्कृत ऋचा:–
'त्वया वयं मघवन्यन्त्सहस्वता सहामहे सहस्वता। यत्त्वा कृष्णो ह वै अङ्ग सप्रथः केश्यसुरो जघान॥
शब्दार्थ और भावार्थ:–
- कृष्णो ह वै: यहाँ 'कृष्ण' शब्द का स्पष्ट उल्लेख है।
- केश्यसुरो जघान: 'केशी' नामक असुर का हनन (वध) किया।
- भाव: इस मन्त्र में कहा गया है कि जिस प्रकार प्रभावशाली 'कृष्ण' ने केशी नामक असुर का विनाश बकरे के सींग से निर्मित शस्त्र द्वारा-
- हमारे शत्रुओं और पिशाचों का नाश करे।
अथर्ववेद (4.37.2)
संस्कृत ऋचा:
यः कृष्णः केश्यसुर स्तम्बज उत तुण्डिकः। अजशृङ्ग्या तं ह्मोजसाऽर्वाञ्चं प्र मृणीमसि॥
अनुवाद:- हे कृष्ण झाड़ियों से उत्पन्न जो केशी असुर है तुम उस झुके हुए, विकराल मुख वाले असुर को बकरे के सींग से निर्मित शस्त्र द्वारा अपने ओज से मारते हो -
अथर्ववेद के इस मन्त्र (4.37.2) का कृष्ण-परक अर्थ अत्यन्त गूढ़ है, जो भगवान श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता और उनके असुर-निवारक स्वरूप को वैदिक काल से जोड़ता है। शोध और लेखन की दृष्टि से इसका अर्थ निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है:
ऋचा का कृष्ण-परक व्याख्यात्मक अर्थ-
"जो श्रीकृष्ण हैं, जिन्होंने केशों वाले (घोड़े के रूप में) भयंकर केशी असुर का विनाश किया, जो झाड़ियों या गुच्छों में छिपकर वार करने वाले (स्तम्बज) तथा विकराल मुख वाले (तुण्डिक) असुरों का दमन करने वाले हैं; भगवान कृष्ण ने अज (बकरा) के सींग से निर्मित शस्त्र द्वारा केश्यसुर जो उनकी और झुका हुआ था अपने ओज से "हम कुचल देते हो ।"
पदों का विशिष्ट कृष्ण-परक विश्लेषण:
इस ऋचा में प्रयुक्त विशेषण साक्षात श्रीकृष्ण की लीलाओं की ओर संकेत करते हैं:
- केश्यसुर: पौराणिक ग्रन्थों में वर्णन है कि कंस द्वारा भेजा गया 'केशी' असुर घोड़े का रूप धारण कर आया था, जिसके गर्दन के बाल (केश) अत्यन्त भयंकर थे। अथर्ववेद में 'केश्यसुर' शब्द का प्रयोग सीधे उस ऐतिहासिक/दैवीय घटना की पुष्टि करता है जिसे हम पुराणों में वर्णित 'केशी-वध' के रूप में जानते हैं।
- स्तम्बज: इसका अर्थ है 'झाड़ियों या गुच्छों से उत्पन्न' या 'वहां छिपकर रहने वाला'। कृष्ण की बाल-लीलाओं और वन-विहार के दौरान कई असुर (जैसे तृणावर्त या अघासुर) प्राकृतिक आवरणों में छिपकर आक्रमण करते थे। यह शब्द उन छद्मवेषी असुरों की ओर संकेत करता है जिनका दमन कृष्ण ने किया।
- तुण्डिक : 'तुण्ड' का अर्थ मुख या थूथन होता है। केशी असुर जब घोड़े के रूप में आया, तो उसका मुख (थूथन) ही उसका मुख्य अस्त्र था, जिसे उसने कृष्ण को निगलने के लिए खोला था। श्रीकृष्ण ने अपनी भुजा उसके मुख (तुण्ड) में डालकर उसका वध किया था। अतः यह विशेषण कृष्ण द्वारा किए गए मुख-प्रधान असुरों के वध को परिभाषित करता है।
- अजशृङ्ग्या तं ह्मोजसा: बकरे के सींग से निर्मित शस्त्र द्वारा हे श्रीकृष्ण ! अपने ओज (शक्ति) से इन विकराल असुरों का संहार करते हो !
शोधपरक महत्व:–
यह ऋचा इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि यह श्रीकृष्ण को केवल एक 'गोपाल' के रूप में नहीं, बल्कि एक 'असुरहंता' (असुरों का नाश करने वाले) महानायक के रूप में वेदों में प्रतिष्ठित करती हैं।
संस्कृत श्लोक-
केशिहन्ता च यो देवः स्तम्बजं तुण्डिकं तथा। अजशृङ्गेण शस्त्रेण ह्योजसा तं मृद्नासि॥
शब्दों का विश्लेषण-
- मृद्नासि: (मृद् + ना + सि) – इसका अर्थ है "आप मर्दन करते हैं" या "आप कुचल देते हैं"। यह मध्यम पुरुष एकवचन का रूप है, जो सीधे भगवान के शौर्य को संबोधित करता है।
- केशिहन्ता: केशी असुर का अंत करने वाले।
- स्तम्बजं-तुण्डिकं: जैसा कि आपने उल्लेख किया—झाड़ियों से छिपकर वार करने वाले और विकराल मुख वाले असुर।
- अजशृङ्गेण शस्त्रेण: अज (बकरे) के सींग से बने शस्त्र द्वारा।
अर्थ-"हे भगवान ! आप ही वह हैं जिन्होंने भयंकर केशी का विनाश किया। जो असुर झाड़ियों (स्तम्बज) में छिपकर घात लगाते हैं और जो विकराल मुख वाले (तुण्डिक) हैं, आप उन्हें अज-शृङ्ग रूपी शस्त्र और अपने अपार ओज से कुचल देते हो (मृद्नासि)।"
तस्यास्ये भगवान् बाहुं प्रविष्टं तद्द्विषोऽनघ ।
वर्धयामास सहसा विदीर्णमुखमण्डनः ॥ (१०.३७.७)
२. धर्म-रक्षक के रूप में कृष्ण-अर्जुन (ऋग्वेद १०.२१.३)
ऋग्वेद के (१०) वें मण्डल में अग्नि की स्तुति के माध्यम से कृष्ण और अर्जुन (नर-नारायण) के धर्म-रक्षक स्वरूप का वर्णन प्राप्त होता है।
"त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव। कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे॥
इस ऋचा के भाव को गोपाचार्य हंस "श्री योगेश कुमार रोहि" ने निम्नलिखित श्लोकों में व्याख्यायित किया है:
"यथा जुह्विर्घृतं वह्नौ त्वयि धर्मास्तथा स्थिताः। त्वं धारयसि धर्मान् वै विश्वं स्वस्ति च विन्दति॥ कृष्णार्जुनस्वरूपेण बहुधा वदसि प्रभो। धर्मान् सनातनांश्चापि नमोऽस्तु परमात्मने॥
- व्याकरणिक विश्लेषण:
- जुह्विः/जुहूभिः: यज्ञपात्र या आहुति देने की क्रिया।
- वह्नौ: अग्नि में (सप्तमी विभक्ति)।
- कृष्णार्जुनस्वरूपेण: कृष्ण और अर्जुन के नर-नारायण स्वरूप द्वारा।
- स्वस्ति: कल्याण।
- विन्दति: प्राप्त करता है (विद् लाभे)।
- अर्थ-संक्षेप: जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि में आहुति सुरक्षित रहती है, वैसे ही समस्त सनातन धर्म आपमें (श्रीकृष्ण में) स्थित हैं। हे प्रभु! आप ही 'कृष्ण' और 'अर्जुन' के रूप में प्रकट होकर धर्म का उपदेश देते हैं और लोक का कल्याण करते हैं।
३. गीता से समन्वय (ऐतिहासिक एवं दार्शनिक निष्कर्ष)-
ऋग्वेद की इन ऋचाओं का सीधा सम्बन्ध श्रीमद्भगवद्गीता के प्रसिद्ध श्लोक से जुड़ता है:
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ (गीता ४.७)
निष्कर्ष:-वैदिक 'गोपा' और 'कृष्ण-अर्जुन' का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व मात्र पौराणिक नहीं, अपितु वेदों के दार्शनिक धरातल पर प्रतिष्ठित है। वे गोप रूप और 'धर्म-गोप्ता' (धर्म के रक्षक) हैं, जो युग-युग में सत्य की पुनर्स्थापना के लिए 'आ वरीवर्ति' (बार-बार) गडेरिया अथवा गोप रूप में प्रकट होते हैं।
(6)- वेदों में श्रीकृष्ण के साथ इन्द्र के युद्ध का
वर्णन-
ऋग्वेद के मण्डल अष्टम (8) के सूक्त (96) की ऋचा संख्याएँ क्रमशः ( 13 -14 -और 15 ) में कृष्ण से इन्द्र के युद्ध होने का वर्णन मिलता है। जिससे कृष्ण की वैदिक कालीन उपस्थिति( सत्ता) सिद्ध होती है। जो ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से अतीव महत्वपूर्ण हैं। किन्तु इन भाष्यकारों ने युद्ध वाले प्रसंग की ऋचाओं में आये कुछ शब्दों के अर्थ का पूर्वदुराग्रह से ग्रस्त होकर अनर्थ करके कृष्ण को असुर या अदेव रूपों में दर्शाया है।
"गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि का मत है कि -
"यद्यपि ऋग्वेद की मूल ऋचा में कृष्ण को कहीं भी असुर नहीं कहा गया है परन्तु उन्हें अदेव पद से अवश्य सम्बोधित किया गया है। जिसे आधार मान कर वेदों में सायण आदि भाष्यकर्ताओं ने उसी "अदेव" को असुर अथवा दैत्यों के परवर्ती व पौराणिक अर्थ में देव जाति के विपरीत एक असीरिया के जनसमुदाय विशेष से सम्बन्धित कर अर्थ ग्रहण किया है।ज्ञात हो- असीरिया के मूल निवासी असुर ही थे। जो दजला और फरात नदीयों के दुआव में स्थित असीरिया देश में रहते थे जो आजकल ईरान और ईराक का मिश्रित भूभाग है। परन्तु कृष्ण असीरियन अथवा असुर कभी नहीं थे।
अब प्रश्न यह भी है कि भाष्यकारों ने श्रीकृष्ण को अदेव या असुर क्यों घोषित किया ? इन्हीं सब प्रश्नों का समाधान यहाँ पर हम विश्लेषणात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं जो निम्नलिखित है।
तो सबसे पहले ऋग्वेद के मण्डल- (8) सूक्त (96) की उन तीनों ऋचाओं (13-14-15) को देखें, जिसमे कृष्ण और इन्द्र के युद्ध को दर्शाया गया है। ऋचाओं का संयुक्त सन्दर्भ और अनुवाद सायण भाष्य पर ही आधारित है। पहले हम उसको प्रस्तुत करेंगे उसके बाद हम उन ऋचाओं के वास्तविक अर्थ और अनुवाद को प्रस्तुत करेंगे।
"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः।आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥
सायण भाष्य मूल सस्कृत रूप--अत्रेतिहासमाचक्षते किल। कृष्णो नामासुरो दशसहस्रसंख्यैरसुरैः परिवृतः सन्नंशुमतीनामधेयाया नद्यास्तीरेऽतिष्ठत् । तत्र तं कृष्णमुदकमध्ये स्थितमिन्द्रो बृहस्पतिना सहागच्छत्। आगत्य तं कृष्णं तस्यानुचरांश्च बृहस्पतिसहायो जघानेति।
केचिदन्यथा वदन्ति । तेषां कथा हेतुः । द्रप्स इत्युदककणोऽभिधीयते स तु सोमो ‘द्रप्सश्चस्कन्द '(ऋ. सं. १०/ १७/११ ) इत्यादिषु सोमपरत्वेनोक्तत्वात्। एतत्पदमाश्रित्याहुः- ‘अपक्रय तु देवेभ्यः सोमो वृत्रभयार्दितः॥ नदीमंशुमतीं नामाभ्यतिष्ठत् कुरून प्रति। तं बृहस्पतिनैकेन सोऽभ्ययाद्वृत्रहा सह॥ योत्स्यमानः सुसंहृष्टैर्मरुद्भिर्विविधायुधैः। दृष्ट्वा तानायतः सोमः स्वबलेन व्यवस्थितः॥ मन्वानो वृत्रमायान्तं जिघांसुमरिसेनया । व्यवस्थितं धनुष्मन्तं तमुवाच बृहस्पतिः॥ मरुत्पतिरयं सोम प्रेहि देवान् पुनर्विभो। सोऽब्रवीन्नेति तं शक्रः स्वर्ग एव बलाद्बली। इयाय देवानादाय तं पपुर्विधिवत्सुराः॥ जघ्नुः पीत्वा च दैत्यानां समरे नवतीर्नव। तदव द्रप्स इत्यस्मिन् तृचे सर्वं निगद्यते' (बृहद्दे. ६. १०९-११५ ) । एतदनार्षत्वेनानादरणीयं भवति । एषोऽर्थः क्रमेणर्क्षु वक्ष्यते । तथा चास्या ऋचोऽयमर्थः। “द्रप्सः । द्रुतं सरति गच्छतीति द्रप्सः। पृषोदरादिः। द्रुतं गच्छन् "दशभिः “सहसैः दशसहस्रसंख्यैरसुरैः “इयानः “कृष्णः एतन्नामकोऽसुरः "अंशुमतीं नाम नदीम् “अव “अतिष्ठत् अवतिष्ठते । ततः “शच्या कर्मणा प्रज्ञानेन वा “धमन्तम् उदकस्यान्तरुच्छ्वसन्तं यद्वा जगद्भीतिकरं शब्दं कुर्वन्तं “तं कृष्णमसुरम् “इन्द्रः मरुद्भिः सह “आवत् प्राप्नोत् । पश्चात्तं कृष्णमसुरं तस्यानुचरांश्च हतवानिति वदति । “नृमणाः नृषु मनो यस्य सः । यद्वा । कर्मनेतृष्वृत्विक्ष्वेकविधं मनो यस्य स तथोक्तः । तादृशः सन् “स्नेहितीः । स्नेहतिर्वधकर्मसु पठितः । सर्वस्य हिंसित्रीस्तस्य सेनाः “अप “अधत्त । अपधानं हननम् । अवधीदित्यर्थः । ‘अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' (सा. सं. १. १.४.४.१) इति छन्दोगाः पठन्ति । तस्यानुचरान् हत्वा तं द्रुतं गच्छन्तमसुरमपाधत्त । हतवान् ॥
"सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद-
इस विषय में एक प्राचीन इतिहास (कथा) कही जाती है। कृष्ण नाम का एक असुर दस हजार असुरों के साथ अंशुमती नाम की नदी के तट पर खड़ा था। वहाँ जल के बीच स्थित उस कृष्णासुर के पास इन्द्रदेव बृहस्पति जी के साथ आए। आकर बृहस्पति की सहायता से इन्द्रदेव ने उस कृष्ण और उसके अनुचरों (साथियों) का वध कर दिया।
कुछ लोग इसे दूसरी तरह से कहते हैं। उनके अनुसार कथा का आधार यह है: 'द्रप्स' शब्द का अर्थ "जल की बूँद" है, लेकिन 'द्रप्सश्चस्कन्द' (ऋग्वेद १०.१७.११) आदि मन्त्रों में इसका प्रयोग सोम के लिए हुआ है। इस पद का सहारा लेकर वे कुछ विद्वान कहते हैं—कि "वृत्र के भय से पीड़ित सोम सभी देवताओं को छोड़कर कुरुक्षेत्र की ओर अञ्शुमती नदी में जाकर छिप गया। वृत्रहन्ता इन्द्र अकेले बृहस्पति के साथ वहाँ पहुँचे। युद्ध के लिए तैयार और विविध शस्त्रों से सुसज्जित मरुद्गणों को देखकर, सोम ने अपनी सेना के साथ मोर्चा संभाल लिया। उस (सोम को) धनुष ताने खड़ा देख, बृहस्पति ने उसे शत्रु की सेना समझकर मारने की इच्छा से कहा— 'हे समर्थ सोम ! यह मरुतों के स्वामी इन्द्र हैं, तुम पुनः देवताओं के पास चलो।' सोम ने मना कर दिया, तब बलवान इन्द्र उसे बलपूर्वक स्वर्ग ले आए। देवताओं ने विधिपूर्वक उसका पान किया और उसे पीकर युद्ध में निन्यानवे (९९) असुरों को मार गिराया। यह सब 'द्रप्स' से शुरू होने वाली तीन ऋचाओं में कहा गया है।" (बृहद्देवता ६.१०९-११५)।
किन्तु, यह मत (बृहद्देवता वाला) ऋषियों के मूल अभिप्राय के अनुकूल न होने के कारण स्वीकार करने योग्य नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ ऋचाओं के क्रम के अनुसार आगे बताया जाएगा।
इस ऋचा (मन्त्र) का अर्थ इस प्रकार है: 'द्रप्सः' का अर्थ है शीघ्र जाने वाला। वह 'दशभिः सहसैः' अर्थात् दस हजार असुरों के साथ 'इयानः' (जाता हुआ) 'कृष्णः' नाम का असुर 'अंशुमतीम्' नाम की नदी के पास 'अव अतिष्ठत्' (ठहरा हुआ था)। तब 'शच्या' अर्थात् अपनी शक्ति या बुद्धि से, 'धमन्तम्' (जल के भीतर श्वास लेते हुए या संसार को डराने वाला शब्द करते हुए) उस कृष्ण असुर को इन्द्र ने मरुतों के साथ 'आवत्' (प्राप्त किया/खोज निकाला)। इसके बाद उन्होंने उस कृष्ण और उसके साथियों का वध कर दिया।
'नृमणाः' (मनुष्यों या ऋत्विजों के प्रति हितकारी मन वाले इन्द्र ने) 'स्नेहितीः' अर्थात् हिंसा करने वाली उसकी (कृष्ण असुर की) सेनाओं को 'अप अधत्त' (नष्ट कर दिया या मार डाला)। छन्दोग (सामवेदी) इसे 'अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' पढ़ते हैं। तात्पर्य यह है कि उसके साथियों को मारकर, इन्द्र ने उस तेजी से भागते हुए असुर का वध कर दिया।
"द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः। नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥
सायण भाष्य का संस्कृत रूप-तुरीयपादो मारुतः । मरुतः प्रति यद्वाक्यमिन्द्र उवाच तदत्र कीर्त्यते । हे मरुतः “द्रप्सं द्रुतगामिनं कृष्णमहम् “अपश्यम् अदर्शम् । कुत्र वर्तमानम् । “विषुणे विष्वगञ्चने सर्वतो विस्तृते देशे । यद्वा । विषुणो विषमः । विषमे परैरदृश्ये गुहारूपे देशे। “चरन्तं परितो गच्छन्तम् । किञ्च “अंशुमत्याः एतन्नामिकायाः “नद्यः नद्याः “उपह्वरे अत्यन्तं गूढे स्थाने “नभो “न नभसि यथादित्यो दीप्यते तद्वत्तत्र दीप्यमानम् “अवतस्थिवांसम् उदकस्यान्तरवस्थितं “कृष्णम् एतन्नामकमसुरमपश्यम् । तस्मिन् दृष्टे सति हे “वृषणः कामानामुदकानां वा सेक्तारो मरुतः “वः युष्मान् युद्धार्थम् “इष्यामि अहमिच्छामि । ततो यूयं तमिमं कृष्णम् "आजौ । अजन्ति गच्छन्त्यत्र योद्धार आयुधानि प्रक्षेपयन्तीति वाजिः संग्रामः । तस्मिन् "युध्यत संहरत । वाक्यभेदादनिघातः । केचित् इष्यामि वो मरुतः इति पठन्ति । तत्र हे मरुतः वो युष्मानिच्छामीत्यर्थो भवति।
सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद-
"ऋचा का चतुर्थ पाद (तुरीयपाद) 'मारुतः' है। इन्द्र ने मरुतों के प्रति जो वाक्य कहा, उसका यहाँ वर्णन किया जा रहा है। हे मरुतों ! मैंने 'द्रप्सं' अर्थात् तीव्र गति वाले 'कृष्णम्' (कृष्ण नामक असुर) को 'अपश्यम्' (देखा)। वह कहाँ स्थित था ? 'विषुणे' अर्थात् चारों ओर फैले हुए विस्तृत प्रदेश में। अथवा, 'विषुण' का अर्थ विषम भी है; अर्थात् शत्रुओं के लिए अदृश्य, गुफा रूपी दुर्गम स्थान में। वह वहाँ 'चरन्तं' (विचरण करते हुए को)। इसके अलावा, 'अंशुमत्याः' इस नाम वाली 'नद्यः' (नदी) के 'उपह्वरे' अर्थात् अत्यन्त गोपनीय स्थान पर, 'नभो न' (आकाश में सूर्य के समान) चमकते हुए और जल के भीतर 'अवतस्थिवांसम्' (स्थित) उस 'कृष्ण' नामक असुर को मैंने देखा। उसके दिखने पर, हे 'वृषणः' (कामनाओं या जल की वर्षा करने वाले मरुतों), मैं 'वः' (तुम्हें) युद्ध के लिए 'इष्यामि' (चाहता हूँ/प्रेरित करता हूँ)। अतः तुम सब उस कृष्ण को 'आजौ' (युद्ध क्षेत्र में, जहाँ योद्धा और अस्त्र चलते हैं) 'युध्यत' (उससे युद्ध करो)। यहाँ वाक्य भेद होने के कारण (इष्यामि में) निघात स्वर नहीं हुआ है। कुछ लोग 'इष्यामि वो मरुतः' ऐसा पाठ पढ़ते हैं, जिसका अर्थ है—हे मरुतों, मैं तुम्हारी इच्छा करता हूँ।"
"अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः।विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
अध अथ “द्रप्स सः द्रुतगामी कृष्णः “अंशुमत्याः नद्याः “उपस्थे समीपे “तित्विषाणः दीप्यमानः सन् “तन्वम् आत्मीयं शरीरम् “अधारयत् । परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा सहायेन “अदेवीः अद्योतमानाः । कृष्णरूपा इत्यर्थः । यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । “आचरन्तीः आगच्छन्तीः “विशः= असुरसेनाः "अभि "ससहे जघान । तमवधीदित्यर्थः प्रसङ्गादवगम्यते ।
सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद-
फिर वह द्रुतगामी कृष्ण (असुर) 'अंशुमती' नदी के किनारे दीप्तिमान होकर अपने शरीर को धारण किए हुए था (अर्थात् शत्रुओं द्वारा अपराजित होकर खड़ा था। अथवा, बल प्राप्ति के लिए अपने शरीर को आहार आदि से पुष्ट कर रहा था)। वहाँ इन्द्र ने जाकर बृहस्पति नामक देव की सहायता से, उन प्रकाशहीन (अन्धकारमय या पापयुक्त होने के कारण स्तुति के अयोग्य) और अपनी ओर बढ़ती हुई कृष्ण असुर की सेनाओं को पराजित किया (अर्थात् उनका संहार किया, यह अर्थ प्रसंग से समझा जाता है)।"
उपरिलिखित ऋचाओं का संयुक्त सन्दर्भ और अनुवाद सायण भाष्य पर ही आधारित है ।
सायण भाष्य के अनुयायी-
इन ऋचाओं में प्रयुक्त हुए निम्नलिखित शब्दों के दार्शनिक और प्रतीकात्मक अर्थ इस प्रकार करते हैं-
1. द्रप्स-
साधारण अर्थ में इसका अर्थ 'बूँद' या 'कण' होता है, लेकिन यहाँ यह 'गतिशील तत्व' के लिए सायण ने इसका अर्थ किया है। दार्शनिक रूप से यह उस भटकती हुई शक्ति का प्रतीक है जो अभी स्थिर नहीं हुई है। कुछ विद्वान इसे 'सोम' की बूँद( Drops) मानते हैं, तो कुछ इसे 'अन्धकार का पुञ्ज' अथवा कृष्ण के विशेषण रूप में ग्रहण करते हैं।
2. अंशुमती-
'अंशु' का अर्थ है किरण। अंशुमती का अर्थ हुआ 'किरणों वाली' या 'प्रकाशमयी' होता है। भौतिक स्तर पर: यह कुरुक्षेत्र के पास की यमुना का विशेषण है। आध्यात्मिक स्तर पर: यह 'बुद्धि' या 'चेतना' का प्रतीक है। जब ज्ञान की किरणें (अंशु) मन में बहती हैं, तो वह अंशुमती है।
3. कृष्ण-
ऋग्वेद के इस सूक्त में 'कृष्ण' किसी व्यक्ति के बजाय 'अन्धकार' का प्रतीक है।
यह वह अवरोध है जो प्रकाश को रोकता है। दस हजार (दशभिः सहस्रैः) सेनाऐं हमारी अनगिनत वृत्तियों या बुराइयों को दर्शाती हैं जो चेतना के तट पर घेरा डाले रहती हैं।
4. इन्द्र और बृहस्पति का योग -
सायण आदि भाष्य कर्ताओं के अनुसार इन्द्र 'संकल्प शक्ति' हैं और बृहस्पति 'ज्ञान/वाणी'। ऋचा संख्या (१५) स्पष्ट करती है कि केवल बल से काम नहीं चलता, जब संकल्प को ज्ञान (बृहस्पति) का साथ मिलता है, तभी भीतर के 'अदेव' (अन्धकारमयी) तत्वों पर विजय मिलती है।
5-विश-वेदों में सायण ने विश विशेषण पद का अर्थ "विशो अदेवीर्" के रूप में देवों को न मानने वाले की प्रजा से किया है। सायण उन्होंने "विश" पद को केवल प्रजा मात्र मान लिया है। और विशो अदेवीर् पद का भाष्य असुरों की प्रजा अथवा असुर-सेना से किया है।
इतिहासकारों,भाष्यकारों और शोधकर्ताओं ने ऋग्वेद की इन ऋचाओं (8/96/13-14-15) को अलग-अलग दृष्टिकोण (एंगल) से देखा है। इस कारण मुख्य रूप से दो बड़े ऐतिहासिक मत उभरकर सामने आते हैं-
1- जनजातीय संघर्ष का मत-
डी.डी. कौशाम्बी और कई अन्य इतिहासकारों का मानना है कि ऋग्वेद के 'कृष्ण' एक आर्य-पूर्व (Non-Aryan) जनजातीय नायक या नेता थे। उनके अनुसार 'अंशुमती' सम्भवतः यमुना नदी का ही प्राचीन नाम है।
कृष्ण की शक्ति- उपर्युक्त ऋचा में 'दशभिः सहस्रैः' (दस हजार के द्वारा ) पद का उल्लेख यह संकेत देता है कि कृष्ण एक शक्तिशाली स्थानीय राजा या कबीले के प्रधान थे।
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचाऐं इन्द्र (जो ऋग्वेद में किलों को तोड़ने वाले 'पुरन्दर' कहे गए हैं) और स्थानीय कृष्ण कबीले के बीच हुए वास्तविक ऐतिहासिक युद्ध की स्थिति को दर्शाती हैं।
2- पौराणिक विकास का मत-
कुछ शोधकर्ता इसे 'पौराणिक कृष्ण' के चरित्र निर्माण का प्रारम्भिक सोपान मानते हैं। किन्तु आश्चर्य और दिलचस्प बात यह है कि ऋग्वेद में इन्द्र 'कृष्ण' को हरा रहे हैं, जबकि पुराणों (जैसे गोवर्धन लीला) आदि के प्रकरण में श्रीकृष्ण इन्द्र के अहंकार को चूर कर रहे हैं। कृष्ण और इन्द्र के चरित्र तथा पौरुष को लेकर यहाँ दो विरोधाभासी बातें ही प्रकाशित हो रही हैं।
इन ऋचाओं के प्रति इतिहासकारों, भाष्यकारों और शोधकर्ताओं के बीच अर्थ विन्यास को लेकर जो मत-मतान्तर पूर्वाग्रह से युक्त हैं, वह सब सायण भाष्य से ही प्रेरित है। इस पर कुछ इतिहासकारों का तो मानना यह भी हैं कि समय के साथ समाज की धार्मिक मान्यताओं में बदलाव आया। जिसके परिणामस्वरूप जो 'कृष्ण' ऋग्वेद में एक असुर या अदेव के रूप में चित्रित थे, वे ही बाद में भागवत धर्म के उदय के साथ सर्वोच्च देवता (भगवान श्रीकृष्ण) के रूप में स्थापित हुए।
3- भाषाविद् और निरुक्तकारों का विचार-
वेदों के भाष्यकार सायणाचार्य ने स्पष्ट किया है कि वैदिक 'कृष्ण' एक असुर का नाम है। उनके अनुसार, 'कृष्ण' शब्द का अर्थ 'काले रंग वाला' है, जो किसी व्यक्ति विशेष के बजाय अन्धकार के समूह या काले मेघों की ओर इशारा करता है इन्द्र पद प्रकाश का वाचक है।
कुल मिलाकर यदि भाष्यकार सायणाचार्य की मानें तो ऋग्वेद के कृष्ण गोपेश्वर श्रीकृष्ण नहीं बल्कि कोई काले शरीर का असुर है। और ऐसे में भाष्यकार सायणाचार्य श्रीकृष्ण का वर्णन वेदों में नहीं मानते हैं।
सायण भाष्य की समीक्षा और वास्तविक समाधान-
यह समीक्षा पूरी तरह से सायण भाष्य के विपरीत है। इसे स्वयं भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ व संस्कृत व्याकरणज्ञ और भारोपीय परिवार की भाषाओं के विश्लेषक- गोपाचार्य हंस श्रीयोगेश कुमार रोहि जी ने प्रस्तुत किया है। जो निम्नलिखित है-
गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी का मनना है कि "वैदिक ऋचाओं में जिस कृष्ण का उल्लेख हुआ है, वह गोपेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही हुआ है। हाँ ये बात अलग है कि भाष्यकार सायणाचार्य ने श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त अदेव पद को असुर के अर्थ में भाष्य कर उसे पौराणिक व परवर्ती दैत्य अर्थ में ग्रहण किया है। जोकि अप्रासंगिक व कालवाधित है।
जिसे व्याकरणीय दृष्टि से भी पूर्णतया स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।" क्योंकि इन ऋचाओं में आये कुछ प्रमुख शब्दों को देखा जाए तो उनके व्याकरणीय अर्थ निम्नलिखित हैं-
सर्व प्रथम हम असुर शब्द को ही अपने विश्लेषण का विषय बनाए-
जैसा कि आपलोगों ने उपर्युक्त सन्दर्भों में देखा कि सारण ने अपने भाष्य में श्रीकृष्ण को असुर बनाने का भरसक प्रयास किया है। श्रीकृष्ण कृष्ण के लिए असुर शब्द को लेकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि पुराणों में केवल श्रीकृष्ण को ही असुर नहीं कहा गया है बल्कि वरुण, अग्नि, सूर्य, शिव (रूद्र) और इन्द्र का भी असुर कहा गया है। और यह भी सत्य है कि ऋग्वेद में 'असुर' शब्द का प्रयोग लगभग (105) बार हुआ है। इनमें से अधिकांश स्थानों पर लगभग (90) बार) प्रयोग हुआ है जो मुख्य रूप से इन्द्र, वरुण, अग्नि और रूद्र (शिव) जैसे देवों के विशेषण के रूप में उनकी दिव्य शक्ति औरसामर्थ्य को दर्शाने के लिए हुआ है। ऋग्वेद के उत्तरार्द्ध (विशेषकर दसवें मण्डल) में ही यह शब्द धीरे-धीरे नकारात्मक अर्थों (राक्षस या देव-विरोधी) शक्तियों में प्रयुक्त होने लगा था।
पुराणों में असुर शब्द कब और किसके लिए प्रयुक्त हुआ है उसे क्रमशः नीचे उद्धृत किया जा रहा है।
स्वयं सायण ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त संख्या (10) की ऋचा संख्या (2) में असुर शब्द का अर्थ वरुण देव के अर्थ में करते हैं। जैसे-
(क) वरुण देव के लिए असुर शब्द-
"न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति ।महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥२॥
यह मन्त्र ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 10वें सूक्त (यम-यमी संवाद) का 11वां मन्त्र है। इसमें यमी (बहन) यम (भाई) से शारीरिक सम्बन्ध बनाने का आग्रह करती है, जिस पर यम उन्हें अनैतिकता और पाप से सचेत करते हैं।
ऋग्वेद 10.10.11
न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति ।
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥
1. हिन्दी अनुवाद-
यम यमी से कहते हैं:
"हे यमी ! जो साथ में पैदा हुए (सहोदर) होने के बावजूद भी विषमरूप (विपरीत चरित्र वाले) हो जाते हैं, वैसा सख्य (मैत्री या शारीरिक सम्बन्ध) सखा (भाई) नहीं चाहता है। महान असुर (द्युलोक के स्वामी, परमेश्वर) के पुत्र और वीर, जो द्युलोक (स्वर्ग/आकाश) को धारण करने वाले हैं, वे हर जगह (हमारा पाप) देख रहे हैं।"
अर्थ: यम समझाते हैं कि सहोदर भाई-बहन का शारीरिक सन्बन्ध पापपूर्ण है और आकाश में रहने वाले दिव्य पुरुष (देवता) इसे देख रहे हैं, इसलिए हमें मर्यादा में रहना चाहिए।
4. मन्त्र का भावार्थ-
यह मन्त्र यम-यमी संवाद का महत्वपूर्ण भाग है, जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की मर्यादा को दर्शाता है। यमी का तर्क है कि वे साथ पैदा हुए हैं, इसलिए सखा (प्रेमी) बन सकते हैं। यम इस तर्क को खारिज करते हैं और कहते हैं कि सहोदर होने के कारण ही हमें ऐसा नहीं करना चाहिए (समान शरीर से जन्मे)। वे 'असुरस्य वीराः' ( वरुण देव के वीर पुत्र) का हवाला देकर नैतिक जिम्मेदारी की याद दिलाते हैं कि जो दिव्य पुरुष (धर्तार) हैं, वे सब देख रहे हैं और पाप से हमें बचना चाहिए।यम का उत्तर: यम कहते हैं कि "तेरा यह सखा (भाई) इस प्रकार के सम्बन्ध (सख्यं) की इच्छा नहीं रखता, क्योंकि तू एक ही लक्षण वाली (जुड़वाँ बहन) है और तेरा रूप (समान उत्पत्ति के कारण) मुझ जैसा ही है"।
नैतिक पक्ष: यम आगे कहते हैं कि "असुर (शक्तिशाली वरुण देव) के पुत्र, स्वर्ग को धारण करने वाले वीर हैं जो सब कुछ देख रहे हैं।" वे मर्यादा और धर्म का पालन करने के लिए यमी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं।
ऋग्वेदः - मण्डल- १० सूक्त- १० ऋचा- २ का
सायण भाष्य के असुर मूलक अंश- महः= महतः( महान) “असुरस्य= प्राणवतः प्रज्ञावतो वा प्रजापतेः( प्राणवान प्रज्ञावान वरुण प्रजापति के “पुत्रासः =पुत्रभूताः “वीराः पुत्रगण।
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा में
प्राण और प्रज्ञा (तीव्र बुद्धि) से सम्पन्न वरुण देव को ही असुर कहा गया है। जो नैतिकता और धर्म के अधिष्ठाता हैं।
(ख) अग्नि देव के लिए असुर शब्द-
ऋग्वेद में अग्नि देव को कई स्थानों पर 'असुर' शब्द से सम्बोधित किया गया है। जिसका अर्थ यहाँ शक्तिशाली, प्राणदाता या प्रज्ञा शक्ति से युक्त होता है, न कि दैत्य अथवा राक्षस। अग्नि के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग करने वाली प्रमुख ऋचा अथवा मन्त्र निम्नलिखित हैं:
-
प्र वेधसे कवये वेद्याय गिरं भरे यशसे पूर्व्याय।
घृतप्रसत्तो असुरः सुशेवो रायो धर्ता धरुणो वस्वो अग्निः॥ऋग्वेद-१/१५/१
हिन्दी अनुवाद (अर्थ)-
"मैं (यजमान) मेधावी (विवेकशील), सर्वज्ञ, स्तुति के योग्य और अनादि (प्राचीन) अग्निदेव के लिए अपनी स्तुति (वाणी) को प्रविष्ट (अर्पित) करता हूँ। वे अग्निदेव घृत (घी) से प्रसन्न होने वाले, प्राणदाता (असुरः - बलवान्), कल्याणकारी, धन के धारण करने वाले और वसु (धन/ऐश्वर्य) के आधार हैं।"
ऋग्वेद 3/3/4 इसमें भी अग्नि को 'असुर' के रूप में सम्बोधित किया गया है: "पिता यज्ञानाम्-असुरो विपश्चितां विमानमग्निर्वयुनं च वाघताम्। आ विवेश रोदसी भूरिवर्पसा पुरुप्रियो भन्दते धामभिः कविः॥४॥
हिन्दी अनुवाद-
"यज्ञों के जनक, विद्वानों के प्राणदाता (असुर), देवताओं के रथ-स्वरूप, स्तोताओं के ज्ञान और कर्म के आधार अग्नि देव ने अपने महान वैभव के साथ आकाश और पृथ्वी में प्रवेश किया है। सबको प्रिय लगने वाले वे ज्ञानी (कवि) अग्नि देव अपने विविध दिव्य धामों (तेजों) के साथ शोभायमान हो रहे हैं।"
व्याकरणिक विश्लेषण-
पिता यज्ञानाम्: यहाँ 'पिता' (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) का अर्थ उत्पादक या पोषक है। 'यज्ञानाम्' में षष्ठी विभक्ति, बहुवचन है (यज्ञों के)।
असुरो (असुरः) यह 'असु' (प्राण) शब्द से बना है। वैदिक संस्कृत में 'असुर' का अर्थ 'प्राणशक्ति देने वाला' या 'बलवान' होता है, जो यहाँ अग्नि के लिए प्रयुक्त है।
विपश्चिताम्: (षष्ठी, बहुवचन) - मेधावियों या विद्वानों का।
विमानम्: 'वि + मा' धातु (नापना)। जो यज्ञ को विशेष रूप से मापता या निर्मित करता है (रथ के समान गमनशील)।
वयुनम्: इसका अर्थ 'ज्ञान' या 'नियम' (Order) है।
वाघताम्: (षष्ठी, बहुवचन) - स्तुति करने वाले ऋत्विकों या भक्तों का।
आ विवेश: 'आ' उपसर्ग के साथ 'विश्' धातु (लिट् लकार)। इसका अर्थ है—'सब ओर से प्रवेश किया'।
रोदसी: (द्वितीया, द्विवचन) - आकाश और पृथ्वी (द्यावापृथिवी)।
भूरिवर्पसा: 'भूरि' (बहुत) + 'वर्पस' (रूप/तेज)। अपने विशाल रूप या सामर्थ्य के साथ।
धामभि: (तृतीय, बहुवचन) - अपने विभिन्न स्थानों, रूपों या तेजपुंजों के द्वारा।
कवि: (प्रथमा, एकवचन) - क्रान्तदर्शी या त्रिकालज्ञ (अग्नि का विशेषण)।
"असुर" का पुराना और सही अर्थ "दैत्य" नहीं है। वैदिक कोश में लिखा है कि असुराति ददाति इति असुर अर्थात् जो असु (प्राण) दे, वह असुर (प्राणदाता) है।
संस्कृत के प्रख्यात कोशकार वी. एस. आप्टे व मोनियर विलियम्स ने भी "असु" का अर्थ "प्राण" प्रज्ञा ( मेधा शक्ति) किया है।
दरअसल हिंदी और संस्कृत का "असुर" शब्द इसी "असु" (प्राण) शब्द से निर्मित हुआ है।"असुर का निर्माण "असु + र" से हुआ है जबकि अज्ञानियों ने इसे "अ+सुर" से निर्मित कमाना है। जो कि एक भ्रान्ति है।
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे (ऋग्वेद 2.1.6)
ऋग्वेद 2/1/6 इस ऋचा में भी अग्नि को असुर कहा गया है
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे । त्वं वातैररुणैर्यासि शंगयस्त्वं पूषा विधतः पासि नु त्मना ॥६॥
वैदिक साहित्य में "असुर" का अर्थ प्रारम्भ में ' प्राणवान्' और प्रज्ञावान् ही रहा है, जो बाद के समय में नकारात्मक अर्थों में प्रयुक्त होने लगा है।
(ग) इन्द्र के लिए असुर शब्द-
इन्द्र के लिए असुर विशेषण पद का प्रयोग भी वैदिक है। देखें निम्नलिखित ऋचा जो इन्द्र को असुर रूप में दर्शाती है।
तमु त्वा नूनमसुर प्रचेतसं राधो भागमिवेमहे ।
महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन् ॥ ऋग्वेद ८/९०/
सायण भाष्य के अंश "हे असुर बलवन् प्राणवन् हे इन्द्र य उक्तगुणोऽस्ति"
(घ) शिव के लिए असुर शब्द-
वेदों (विशेषकर ऋग्वेद) में 'असुर' शब्द का प्रयोग शिव के वैदिक स्वरूप रुद्र के लिए भी कई स्थानों पर हुआ है, लेकिन यहाँ इसका अर्थ 'राक्षस' न होकर 'अत्यन्त शक्तिशाली', 'प्राणवान' या 'दैवीय गुणों से युक्त' जनसमुदाय से है।
वेदों में रूद्र के लिए प्रयुक्त असुर शब्द के प्रमुख सन्दर्भ निम्नलिखित हैं:
ऋग्वेद- ऋग्वेद में रुद्र (शिव) को असुर और देव दोनों ही विशेषणों से सम्बोधित किया गया गया है। ऋग्वेद में रुद्र को (6) बार असुर के रूप में महिमामण्डित किया गया है।
प्र सा क्षितिरसुर या महि प्रिय ऋतावानावृतमा घोषथो बृहत् ।
युवं दिवो बृहतो दक्षमाभुवं गां न धुर्युप युञ्जाथे अपः ॥ ऋग्वेद १/१५१/४
हिन्दी अनुवाद-
"हे मित्र और वरुण! आप दोनों विशाल आकाश के समान, सबको सन्मार्ग पर प्रवृत्त करने वाले बल (सामर्थ्य) को और कर्मों को अपने वश में करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे बैल को धुरी (जुए) से जोड़ा जाता है।"ऋग्वेद १/१५१/४
वेदों में शिव (रुद्र) के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग अत्यन्त दिव्य शक्ति के सन्दर्भ में हुआ है, न कि नकारात्मक अर्थ में अत: सायण ने "असुर" शब्द को दो विरोधी अर्थों में प्रस्तुत किया है-
"को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति ।
भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत् ॥४।
ऋग्वेदः - मण्डल (१/१६४/४) उपर्युक्त इस ऋचा में असुर पद प्राणोंवाली आत्मा का वाची है।
प्रसंग के अनुरूप वैदिक ऋचाओं में असुर का अर्थ "प्राण व प्रज्ञा से सम्पन्न व्यक्ति" के लिए ही अधिक मान्य है। परन्तु दशम मण्डल के कुछ उत्तरकालीन सूक्तो में तथा लौकिक संस्कृत भाषा में असुर पद शक्ति के प्राचुर्य व भयंकरता के कारण दैत्यों का वाचक भी बन गया है। परन्तु ऋग्वेद में सायण ने इस अर्थ परिवर्तन क्रम को अनदेखा किया है। जो अनर्थ का कारण बना।
इस प्रकार से आप लोगों ने वेदों में असुर शब्द की महत्ता और वास्तविकता को जाना कि असुर शब्द- दैत्य इत्यादि का वाचक न होकर प्राण देने वाले या प्रज्ञा (ज्ञान) का वाचक था जिसे सारण जैसे भाष्यकारों ने दैत्यों के लिए परिभाषित किया जो किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है।
अब हमलोग उपर्युक्त ऋचा में हम , विश, द्रप्स , कृष्ण, शचि, और बृहस्पति आदि पदों के आधार पर कृष्ण के वैदिक और पौराणिक काल की विवेचना अथवा समीक्षा करेंगे हमारी यह प्रतिक्रिया सायण भाष्य के सापेक्ष होगी !
(१) विश शब्द की समीक्षा-
विश- शब्द भी वैदिक ऋचाओं में प्रयुक्त है विशेषत: उपर्युक्त ऋचा में विश कृष्ण पक्ष के जन समुदाय का वाचक है। परन्तु इसका अर्थ तृतीय वर्ण के व्यक्ति वैश्य अथवा कृषि कर्म और गोपालन करने वाले के अर्थ को ध्वनित करता है। गोप ही ये सब कार्य (कृषि और गोपालन) करने वाले हैं।
समीक्षा-वेदों में विश' एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और प्राचीन शब्द है,और जो वैदिक सामाजिक संरचना का आधार स्तम्भ था। इसका अर्थ केवल साधारण जनसमूह ही नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सामाजिक इकाई से था जो वंश परम्परागत रूप से कृषि और गोपलन करती है अत: विश का अर्थ वैश्यवृत्ति(कृषि औक गोपालन) करने वाले गोपों से है।।
गोपालक के रूप में: वैदिक संस्कृत में "विश" का एक अर्थ "पशुपालक" या "गोपालक" भी होता है, क्योंकि उस काल में धन और सम्पत्ति का मुख्य आधार पशुधन (विशेषकर गायें) ही थे।
सामाजिक संरचना: वैदिक काल में समाज के तीन मुख्य स्तर थे: ब्राह्मण (पुरोहित), क्षत्र (योद्धा) और विश (सामान्य जन, जिसमें किसान और गोपालक शामिल थे)। यही "विश" शब्द आगे चलकर "वैश्य" वर्ण का आधार बना, जिनका प्राथमिक कर्तव्य पशुपालन, कृषि और व्यापार था।
प्रस्तुत भाषाई और सांस्कृतिक विश्लेषण अत्यंत गूढ़ और शोधपरक है। यह स्पष्ट करता है कि कैसे प्राचीन भारत की 'विश' (जनसमूह) और पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था ने न केवल संस्कृत, बल्कि समस्त भारोपीय (Indo-European) भाषाओं के शब्दकोश को निर्मित किया।
आपके द्वारा दिए गए तथ्यों को व्यवस्थित कर, पुनरावृत्ति रहित अंतिम सार यहाँ प्रस्तुत है:
वैदिक 'विश' से आधुनिक अर्थव्यवस्था: एक भाषाई यात्रा
प्राचीन भारोपीय समाज में संपत्ति का अर्थ 'भूमि' नहीं, बल्कि 'पशु' था। इसी आर्थिक आधार ने भाषा के उन बीजों को जन्म दिया जो आज भी वैश्विक शब्दावली में जीवित हैं।
1. पशु और धन का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध
वैदिक काल में 'विश' (सामान्य जन/गोपालक) की समृद्धि का मापदंड पशुधन था। ऋग्वेद में प्रयुक्त शब्द 'रयि' (सम्पत्ति) का वास्तविक अर्थ पशुओं (गाय, अश्व) से परिपूर्ण धन ही है।
- गोपति: यह शब्द न केवल राजा के लिए, बल्कि उस संरक्षक के लिए प्रयुक्त होता था जो पशुधन की रक्षा में सक्षम हो।
- बलि: प्राचीन काल में दी जाने वाली स्वैच्छिक भेंट भी पशु-उत्पादों (दुग्ध, घी) के रूप में ही थी।
2. 'पशु' और यूरोपीय शब्दावली (Pecus से Pecuniary)
संस्कृत का 'पशु' भारोपीय मूल धातु *peku- से निकला है, जिसका अर्थ 'बन्धन' (पाश) है। पालतू पशुओं को बाँधकर रखने की इसी क्रिया ने संपत्ति के बोध को जन्म दिया।
- Pecuniary (वित्तीय): लैटिन के Pecus (पशु) से बना, जिसका अर्थ 'पशु आधारित धन' है।
- Fee (शुल्क): जर्मनिक Fhu/Fehu (मवेशी) से विकसित हुआ।
- Impecunious: वह व्यक्ति जिसके पास पशु (धन) न हो, अर्थात निर्धन।
- चरागाह: वह स्थान जहाँ पशुओं के लिए 'ग्रास' (चारा) उपलब्ध हो।
- खूँटा गाड़ना: पशुओं को रोकने के लिए किए गए प्रयास ने 'स्थायित्व' को जन्म दिया।
- ग्राम संस्कृति: पशुओं के समूह और घास के मैदानों के इर्द-गिर्द बसी बस्ती ही कालांतर में 'ग्राम' कहलाई।
भ्रम निवारण: 'पैसा' शब्द संस्कृत के 'पदांश' (चौथा हिस्सा) से आया है, जबकि 'पशु' का सम्बन्ध सीधे 'Pecuniary' और 'Fee' से है।
3. 'ग्राम' और 'ग्रास' (घास): स्थायित्व का विकास
'ग्राम' शब्द की व्युत्पत्ति 'ग्रस्' (खाना/निगलना) धातु से मानी जाती है। यह विकासक्रम मानव सभ्यता के यायावर जीवन से स्थायी निवास की ओर बढ़ने को दर्शाता है:
4. तुलनात्मक भाषाई विश्लेषण (संस्कृत बनाम यूरोपीय)-
अन्तिम निष्कर्ष-
यह विश्लेषण सिद्ध करता है कि प्राचीन मानव की बुनियादी क्रियाएँ—पशु को बाँधना (पशु), घास चरना (ग्रस्/ग्राम) और भूमि जोतना (कृष्/कृषि)—ही वे आधार स्तंभ हैं जिनसे संस्कृत और यूरोपीय भाषाओं का विशाल शब्द-वृक्ष विकसित हुआ। जहाँ 'ग्रस/Grass' उपभोग और जीविका का प्रतीक बना, वहीं 'कृष्/Cross' अंकन और व्यवस्था का।
उपर्युक्त ऋचा में आया हुआ कृष्णपद भी लाक्षणिक शब्द शक्ति मूलक है। कृष्ण का धातुज अर्थ "कर्षण- अर्थात(कृषि-कार्य करने वाला अथवा आकर्षण करने वाला" ही है। और कृषि करने वाले कृषक भी जलवायु और उष्णता के प्रभाव से श्याम वर्ण( साँवले रंग ) के ही होते हैं। और पौराणिक पात्र कृष्ण भी श्यामल (साँवले) रंग के थे जो यमुना की तलहटी में प्राय: गायें चराया करते थे।
आपका विश्लेषण भाषा विज्ञान और निरुक्त (Etymology) की दृष्टि से अत्यंत सटीक और विचारोत्तेजक है। आपने 'कृष्ण' शब्द के धात्विक अर्थ को सामाजिक और भौगोलिक परिवेश से जोड़कर एक सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया है।
इस विषय पर विस्तृत विवेचना निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से की जा सकती है:
1. शब्द की व्युत्पत्ति और धात्विक अर्थ
'कृष्ण' शब्द मुख्य रूप से 'कृष्' धातु से बना है, जिसके दो प्रमुख अर्थ निकलते हैं:
- कर्षण (खींचना/आकर्षित करना): "कर्षति इति कृष्णः" अर्थात जो अपनी ओर आकर्षित करे। यह कृष्ण के उस रूप को दर्शाता है जो अपने सौंदर्य और गुणों से जनमानस को मोह लेते हैं।
- विलेखन (जोतना/कृषि): "कृषिर्भूवाचकः शब्दो" - यहाँ 'कृष्' धातु पृथ्वी को जोतने या कृषि कर्म का द्योतक है।
2. वर्ण (रंग) और परिवेश का अन्तर्सम्बन्ध-
आपने सही संकेत दिया है कि कृष्ण का 'श्याम वर्ण' केवल एक रंग मात्र नहीं है, बल्कि वह उनकी जीवनशैली और प्रकृति से जुड़ाव का परिणाम है।
- भौगोलिक प्रभाव: यमुना के तटवर्ती क्षेत्रों में गाय चराना और निरंतर धूप, वर्षा एवं प्रकृति के सान्निध्य में रहने के कारण शरीर का वर्ण श्यामल होना स्वाभाविक है।
- सांस्कृतिक प्रतीक: भारतीय परंपरा में 'श्याम' रंग को उर्वरता (Fertility) और मेघ (बादल) से भी जोड़ा जाता है, जो कृषि के लिए अनिवार्य हैं।
3. कृष्ण और संकर्षण: कृषि के दो स्तम्भ-
भगवान कृष्ण और उनके अग्रज बलराम (संकर्षण) का स्वरूप पूर्णतः कृषि संस्कृति को समर्पित दिखाई देता है:
पात्र | मुख्य आयुध/प्रतीक | सांकेतिक अर्थ |
|---|---|---|
कृष्ण | चक्र और बाँसुरी | व्यवस्था का चक्र और आनंद (गोपालन संस्कृति) |
संकर्षण (बलराम) | हल और मूसल | कृषि कर्म का प्रत्यक्ष उपकरण |
संकर्षण शब्द का अर्थ ही है 'भली-भांति खींचना' या 'सम्यक रूप से हल चलाना है'। हल के द्वारा भूमि को खींचना (जोतना) संकर्षण की प्रधानता है। इस प्रकार कृष्ण (आकर्षण/बीज) और संकर्षण (कर्षण/हल) मिलकर एक सुदृढ़ कृषि-प्रधान समाज की नींव रखते हैं।
4. लाक्षणिक शब्द शक्ति का महत्व
साहित्यिक दृष्टि से जब हम कृष्ण को 'कृषक' का समानार्थक मानते हैं, तो यहाँ लक्षणा शब्द शक्ति प्रभावी होती है। यहाँ कृष्ण शब्द केवल एक व्यक्ति विशेष का नाम न रहकर, उस समूचे वर्ग का प्रतिनिधि बन जाता है जो:
- मिट्टी से जुड़ा है (कृषि)।
- पशुधन का रक्षक है (गोपालन)।
- प्रकृति के अनुरूप वर्ण धारण करता है।
निष्कर्ष
आपका यह मत कि "कृष्ण और संकर्षण कृषि कर्म और गोपालन करने वाले कृषक के समानार्थक हैं", पूरी तरह न्यायसंगत है। यह व्याख्या कृष्ण को अलौकिकता के ऊंचे सिंहासन से उतारकर लोक-मानस के निकट लाती है और सिद्ध करती है कि वे वास्तव में 'मिट्टी के पुत्र' और 'श्रम की संस्कृति' के महानायक हैं।
गर्ग संहिता के 'गिरिराज खण्ड' से उद्धृत यह श्लोक आपके द्वारा पूर्व में किए गए भाषाई विश्लेषण—'ग्रस्' (Grass/Grama) और 'कृष्' (Agriculture/Cross)—को एक आध्यात्मिक और व्यावहारिक धरातल पर पूर्णता प्रदान करता है।
यहाँ इस श्लोक का व्यवस्थित पदच्छेद, अर्थ और आपके शोध के परिप्रेक्ष्य में इसकी विवेचना प्रस्तुत है:
श्लोक और पदच्छेद-
श्रीभगवानुवाच -
कृषीवला वयं गोपाः सर्वबीजप्ररोहकाः। क्षेत्रे मुक्ताप्रबीजानि विकीर्णीकृतवाहनम् ॥२६॥
(गर्गसंहिता, गिरिराजखण्ड, अध्याय (६)
भावार्थ-
श्री भगवान (कृष्ण) ने कहा:"हम खेती करने वाले (कृषीवल) और पशुपालक (गोप) हैं, जो समस्त बीजों को अंकुरित करने वाले (सृजनकर्ता) हैं। हम खेतों में अपने हलों और साधनों के माध्यम से श्रेष्ठ बीजों का वपन (बुवाई) करते हैं।"
उनकी श्यामलता उनके कठिन परिश्रम और प्रकृति के साथ उनके एकाकार होने का जीवंत प्रमाण है।
श्रीमद्भागवतम् (दशम स्कन्ध - १९.२) ॥
पूर्ण श्लोक:
अजा गावो महिष्यश्च निर्विशन्त्यो वनाद् वनम् ।दावाग्निना परियता विलपन्त्यो नृप प्रभो ॥
श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध (अध्याय १९) से उद्धृत यह श्लोक न केवल उस समय की प्राकृतिक आपदा (दावाग्नि) का वर्णन करता है, बल्कि तत्कालीन गोप संस्कृति और उनकी अर्थव्यवस्था के स्वरूप पर भी महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है।
आपकी जिज्ञासा के आधार पर इस श्लोक की समालोचनात्मक विवेचना निम्नलिखित बिंदुओं में की जा सकती है:
शांति पर्व के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने 'कृष्ण' नाम की बहुत ही अनूठी और कर्म-प्रधान व्याख्या करते हैं। यहाँ इसका व्याकरणिक विश्लेषण और सटीक अर्थ प्रस्तुत है:
श्लोक एवं व्याकरणिक विच्छेद
मूल श्लोक:
कृषामि मेदिनीं पार्थ भूत्वा कार्ष्णायसो महान्।कृष्णो वर्णश्च मे यस्मात् तस्मात् कृष्णोऽहमर्जुन॥
पद-विच्छेद (व्युत्पत्ति):-
- कृषामि: 'कृष्' धातु (खींचना/जोतना) + लट् लकार (वर्तमान काल), उत्तम पुरुष, एकवचन। (अर्थ: मैं जोतता हूँ या खींचता हूँ)
- मेदिनीम्: मेदिनी (पृथ्वी) + द्वितीया विभक्ति, एकवचन। (अर्थ: पृथ्वी को)
- भूत्वा: 'भू' धातु + क्त्वा प्रत्यय। (अर्थ: होकर/बनकर)
- कार्ष्णायसो: कृष्ण + अयस् (लोहा) + अण्। (अर्थ: काले लोहे का बना हुआ हल)
- यस्मात् / तस्मात्: जिससे / इसलिए।
शब्दार्थ (Word-to-Word Meaning)
- पार्थ/अर्जुन: कुन्तीपुत्र अर्जुन के लिए संबोधन।
- महान् कार्ष्णायसो भूत्वा: एक विशाल काले लोहे के हल का रूप धारण करके।
- मेदिनीं कृषामि: मैं पृथ्वी को जोतता हूँ (कर्षण करता हूँ)।
- च मे वर्णः कृष्णः: और क्योंकि मेरा रंग भी श्याम (काला) है।
- तस्मात् कृष्णोऽहम्: इसी कारण से मैं 'कृष्ण' हूँ।
सटीक अनुवाद-
"हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मैं एक महान लोहे के हल से इस पृथ्वी को जोतता हूँ/ हल चलाता हूँ तथा मेरा वर्ण (रंग) भी इसी कारण से श्याम है; अत: मैं 'कृष्ण' कहलाता हूँ।"
व्याकरणिक और दार्शनिक विशेष टिप्पणी-
इस श्लोक में 'कृष्ण' शब्द की व्याख्या दो दृष्टिकोणों से की गई है:
- क्रिया (Action): यहाँ 'कृष्' धातु का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ है 'कर्षण' (खेत जोतना)। जैसे हल पृथ्वी की अशुद्धियों को दूर कर उसे उपजाऊ बनाता है, वैसे ही भगवान पृथ्वी के अधर्म को दूर कर उसे धर्म-योग्य बनाते हैं।
- विशेष शब्द: 'कार्ष्णायसो' (Kārṣṇāyaso) - यह शब्द 'कृष्ण' (काला) और 'आयस' (लोहा) से बना है। प्राचीन काल में लोहे का हल सबसे शक्तिशाली माना जाता था।
- गुण (Attribute): 'कृष्ण' का अर्थ काला या गहरा नीला होता है। भगवान अपने घनश्याम स्वरूप (रंग) को भी इस नाम का आधार बताते हैं।
रोचक तथ्य: अन्य पुराणों में 'कृष्ण' की व्याख्या 'कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृत्तिवाचकः' कहकर भी की गई है, जहाँ 'कृष्' का अर्थ सत्ता (अस्तित्व) और 'ण' का अर्थ आनंद (मोक्ष) बताया गया है। लेकिन महाभारत के इस श्लोक में वे अपने कृषि-पालक और श्याम वर्ण रूप को प्रधानता देते हैं।
अर्थात-
महाभारत के शान्ति पर्व (मोक्षधर्म पर्व) में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने 'कृष्ण' नाम की व्युत्पत्ति इसी संदर्भ में बताते हैं। आपके द्वारा दिए गए भाव को व्याकरणिक शुद्धता के साथ निम्नलिखित संस्कृत श्लोक (अनुष्टुप छन्द) में अनुदित किया गया है:
संस्कृत श्लोक
कृषामि मेदिनीं पार्थ लाङ्गलेन महता विभो।
कृष्णवर्णोऽस्मि तेनैव तस्मात् कृष्णोऽहमर्जुन॥
शब्दार्थ एवं व्याकरण
- कृषामि: मैं जोतता हूँ (कृष् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन)।
- मेदिनीम्: पृथ्वी को।
- पार्थ/अर्जुन: हे कुन्तीपुत्र! (सम्बोधन)।
- लाङ्गलेन: हल से (तृतीय विभक्ति, करण कारक)।
- महता: महान/बड़े।
- कृष्णवर्णोऽस्मि: मेरा वर्ण 'कृष्ण' (श्याम) है।
- तेनैव: उसी कारण से (तेन + एव)।
- तस्मात्: अतः/इसलिये।
१. पशुधन की विविधता (Animal Husbandry)
श्लोक की पहली पंक्ति स्पष्ट रूप से तीन प्रकार के पशुओं का उल्लेख करती है:
- अजा (बकरियाँ): ये छोटे पशु थे जो दुर्गम स्थानों पर भी चर सकते थे।
- गाव: (गायें): ब्रज की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार।
- महिष्य: (भैंसें): भारी और अधिक दूध देने वाले पशु।
विवेचना: यह इस बात का प्रमाण है कि कृष्ण और उनके साथी केवल 'ग्वाले' (गायों के पालक) ही नहीं थे, बल्कि वे एक समृद्ध पशुपालन संस्कृति का हिस्सा थे। वे केवल एक विशेष प्रजाति पर निर्भर न होकर मिश्रित पशुपालन (Mixed Livestock Farming) करते थे, जो उनके आर्थिक प्रबंधन और जीविकोपार्जन की विविधता को दर्शाता है।
२. सामूहिक चरागाह पद्धति-
श्लोक में प्रयुक्त 'निर्विशन्त्यो वनाद् वनम्' (एक वन से दूसरे वन में प्रवेश करती हुई) वाक्यांश यह दर्शाता है कि उस समय पशुओं को पालने के लिए चरागाहों का विस्तार बहुत बड़ा था।
- गोप लोग अपने पशुओं को लेकर किसी एक स्थान पर सीमित नहीं रहते थे।
- वे पारिस्थितिक संतुलन और घास की उपलब्धता के अनुसार 'वनान्तरण' (वन बदलना) करते थे।
३. 'ईषीकाटवीं' और संकट की स्थिति
जब दावाग्नि (जंगल की आग) लगी, तो प्यास और भय से व्याकुल (दावतर्षिताः) पशु 'ईषीकाटवीं' (मूंज या ईख के जंगल) में जा घुसे।
- समालोचना: यहाँ 'क्रन्दन्त्यो' (रंभाना/चिल्लाना) शब्द पशुओं और उनके पालकों के बीच के गहरे भावनात्मक संबंध की ओर संकेत करता है। जब पशु संकट में थे, तो कृष्ण और बलराम उन्हें खोजने निकले। यह दर्शाता है कि उनके लिए पशु केवल संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह थे।
४. सामाजिक एवं आर्थिक संरचना-
इस श्लोक से यह निष्कर्ष निकलता है कि तत्कालीन समाज (विशेषकर नन्द बाबा का गोकुल) एक 'पशुपालक समाज' था जहाँ:
- धन का मापदण्ड: जिसके पास जितने अधिक और विविध पशु (गाय, भैंस, बकरी) होते थे, वह उतना ही समृद्ध माना जाता था।
- श्रम विभाजन: कृष्ण और उनके साथी स्वयं इन पशुओं को चराने जाते थे, जो उनके कर्मठ और प्रकृति से जुड़े व्यक्तित्व को पुष्ट करता है।
निष्कर्ष-
उपर्युक्त श्लोक इस धारणा को पुष्ट करता है कि कृष्ण की लीलाओं का परिवेश अत्यंत व्यावहारिक और जमीनी था। वे केवल गायों के रक्षक नहीं थे, बल्कि 'सर्व-पशु-पालक' थे। उनके साथ 'अजा' (बकरियों) और 'महिष्य' (भैंसों) का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि ब्रजवासी एक संपूर्ण डेयरी और पशुपालन पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का संचालन करते थे।
विशेष टिप्पणी: यह श्लोक कृष्ण के 'गोपाल' स्वरूप को और अधिक व्यापक बनाता है, जिसमें वे केवल गायों के ही नहीं बल्कि समस्त मूक प्राणियों के आश्रयदाता के रूप में उभरते हैं।
वैदिक शब्द पशु और यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित शब्द pice तथा पेकुस दर्शाते वहां कि पशु अर्थ व्यवस्था व मुद्रा के आधार स्तम्भ थे जहाँ पशुओं के लिए घास के स्थान ग्रास भूमि( होते थे वहीं ग्राम संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ
नि:सन्देह सायण ने अपने वैदिक ऋचाओं के भाष्य में "द्रप्स" पद का वैकल्पिक व आनुमानित अर्थ ही ग्रहण किया हैं।
परन्तु हमारी जानकारी और शोधों के अनुसार "द्रप्स" पद भारोपीय परिवार की भाषाओं में अंग्रेज़ी शब्द (Drops)के समानार्थी है। जिसका अर्थ "जल-बिन्दु" होता है। वैदिक संस्कृत में भी द्रप्स पद जल बन्दु का ही अर्थ प्रकाशक है।
अत: द्रप्स पद का रूढ़ अर्थ ही ग्रहण करना चाहिए।
(४) अंशुमती शब्द की समीक्षा-
अंशुमती पर सायण का भाष्य भी अभिधा शब्द शक्ति मूलक है। रूढ़ अर्थ युक्त नहीं है जोकि वैदिक कथाओं के अनुरूप होना चाहिए था। पुराण वेदों की ही व्याख्याऐं हैं- पुराणों में अंशुमती पद यमुना नदी का वाचक व उसके लिए ही रूढ़ है। क्योंकि वह सूर्य की पुत्री बतायी जाती है। यमुना नदी को अंशुमति (और मुख्य रूप से सूर्यसुता, कहने के पीछे पौराणिक और धार्मिक कारण हैं, जो यमुना नदी को सूर्य देव से जोड़ते हैं-
(५) इन्द्र और शचि शब्द की समीक्षा-
सर्वविदित है कि इन्द्र और शचि दोनों पति- पत्नी के रूप में पौराणिक पात्र हैं जो उपर्युक्त ऋचा में प्रयुक्त हुए हैं। इन्द्र एक पौराणिक पात्र है वेदों में भी एक देव विशेष का नाम इन्द्र है जो कृष्ण का प्रतिद्वन्द्वी है। अत: उपर्युक्त ऋचा में इन्द्र का वही अर्थ ग्रहण करना चाहिए जो पौराणिक ग्रन्थों में ग्रहण किया जाता है। और बृहस्पति इन्द्र के गुरु भी पौराणिक पात्र ही हैं।
अब हम ऋग्वेद की क्रमशः तीनों ऋचाओं में कृष्ण और इन्द्र सम्बन्धी युद्ध की सम्यक भाष्य और विवेचना प्रस्तुत करते हैं। ताकि आप लोग सायण और मेरे भाष्य की सम्यक तुलना करके कृष्ण और इन्द्र सम्बन्धी युद्ध की वास्तविकता को जान सकें।
"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियान: कृष्णो दशभि: सहस्रै: आवत्तमिन्द्रःशच्याधमन्तमपस्नेहितीर्नृमणा अधत्त॥
(ऋग्वेद८/९६/१३/)
उपर्युक्त ऋचा पर योगेश रोहि का भाष्य-
"कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन् अँशुमतीनामधेयाया नद्या: यमुनाया: तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।
अनुवाद-
कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं अशुमती अथवा यमुना के तट पर स्थित कृष्ण नाम से प्रसिद्ध उस गोप को इन्द्र ने यमुना नदी के जल में स्थित देखा वह इन्द्र अपनी पत्नी शचि के साथ आया हुआ है- और दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप धन भी दिया।१३।
तात्पर्य- हे कृष्ण! आप यमुना के तट पर स्थित इस जल के रक्षा करने वाले हैं आप इसकी रक्षा करो। कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं। इन्द्र ने अपनी पत्नी शचि के साथ अग्नि से संयोजित होते हुए अर्थात् दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप धन दिया।
"कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन् अँशुमतीनामधेयाया नद्या यमुनाया वा तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।
१. हिन्दी अनुवाद-
दस हजार गोपों (ग्वालों) से घिरे हुए श्रीकृष्ण यमुना नदी के तट पर स्थित अँशुमती नामक नदी अथवा यमुना के किनारे ठहरे थे। वहां कृष्ण के नाम से प्रसिद्ध उस गोप (कृष्ण) को नदी के जल के बीच स्थित (बैठा हुआ) इन्द्र ने देखा। इन्द्र ने अपनी पत्नी शची के साथ आकर जल के बीच उस स्नेही (या स्निग्ध/शान्त) जलाभिषिक्त गोप कृष्ण और उनके अनुचर (साथी) उपगोपों को बहुत सारा धन दिया।
२. व्याकरण सम्मत विश्लेषण-
वाक्य १: कृष्णो दशसहस्रैर्गोपैर्परिवृत: सन् अँशुमतीनामधेयाया नद्या: यमुनाया: तटेऽतिष्ठत्
कृष्णो (कृष्ण:): कर्ता (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)।
दशसहस्रैर्गोपै: (दशसहस्रै: + गोपै:): तृतीया विभक्ति, बहुवचन (करण कारक - गोपों के द्वारा)।
परिवृत: सन्: परिवृत (घिरे हुए) + सन् (होकर) - यह वर्तमान कालिक कृदन्त का प्रयोग है।
अँशुमतीनामधेयाया (अँशुमती + नामधेयाया:): षष्ठी विभक्ति, एकवचन (नदी का विशेषण)।
नद्या: यमुनाया:: षष्ठी विभक्ति, एकवचन (सम्बन्ध कारक)।
तटेऽतिष्ठत् (तटे + अतिष्ठत्): 'तटे' (अधिकरण कारक - तट पर), 'अतिष्ठत्' (स्था धातु, लङ् लकार/भूतकाल, प्रथम पुरुष, एकवचन - ठहरे थे)।
वाक्य २: तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये स्थितं इन्द्रो ददर्श
तत्र: अव्यय (वहां)।
कृष्णस्य नाम्न:: षष्ठी विभक्ति (नाम से प्रसिद्ध)।
तम गोपं: द्वितीय विभक्ति, एकवचन (कर्म कारक)।
नद्यार्जलेमध्ये (नद्या: + जले + मध्ये): षष्ठी और अधिकरण कारक का प्रयोग (नदी के जल के बीच में)।
स्थितं: द्वितीया विभक्ति (स्थित/बैठे हुए, गोपं का विशेषण)।
इन्द्रो (इन्द्र:): कर्ता (प्रथमा विभक्ति)।
ददर्श: दृश् धातु, लिट् लकार/परोक्ष भूतकाल, प्रथम पुरुष, एकवचन (देखा)।
वाक्य ३: स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्
स इन्द्र:: तच्छब्द (वह), इन्द्र (प्रथमा, एकवचन)।
स्वपत्न्या शच्या: तृतीया विभक्ति, एकवचन (सहार्थे तृतीया - पत्नी के साथ)।
सार्धं: अव्यय (साथ)।
आगत्य: आ + गम् + ल्यप् प्रत्यय (आकर)।
जले स्निग्धे: अधिकरण कारक (जल में)। 'स्निग्धे' यहाँ स्निग्ध/स्नेहपूर्ण के अर्थ में है।
तम गोपं कृष्णं: द्वितीया विभक्ति (कर्म कारक)।
तस्यानुचरानुपगोपाञ्च (तस्य + अनुचर + उपगोपान् + च): षष्ठी (उसके) + द्वितीया, बहुवचन (साथी गोपों को) + अव्यय (और)।
अतीवानि धनानि: विशेषण + विशेष्य (बहुत सारा धन - द्वितीया, बहुवचन)।
अदात्: दा (धातु) + लङ् लकार/भूतकाल, प्रथम पुरुष, एकवचन (दिया)।
मुख्य व्याकरण बिन्दु:-
सन्धि: तटेऽतिष्ठत् (तटे + अतिष्ठत् - पूर्वरूप संधि), नद्यार्जलेमध्ये (नद्या: + जले - विसर्ग संधि का लोप/परिवर्तन), तस्यानुचरानुपगोपाञ्च (अनुचरान् + उपगोपान् + च - अनुस्वार/चत्व संधि)।
प्रत्यय: आगत्य (आ + गम + ल्यप् - 'आकर' अर्थ में)।
समास: दशसहस्रैर्गोपै: (बहुव्रीहि/तत्पुरुष), अँशुमतीनामधेयाया: (बहुव्रीहि), अनुचरानुपगोपान् (द्वन्द्व)।
द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥ ऋग्वेद ८/९६/१४
योगेश रोहि का भाष्य-
मया खलु यमुनाजलस्य विविधानि रूपाणि दृष्टानि, तथैव अञ्शुमत्याः निर्जने प्रदेशे चरन् एको वृषभोऽपि दृष्टः। अहं तं वृषभं युध्यन्तं कृष्णेन सह द्रष्टुम् इच्छामि। अर्थात् सो वृषभः स्थान-अडिग-स्थित-कृष्णेन सह युद्धं करोतु, एतादृशं मया वाञ्छितम्। सः स्थानो यत्र जलम् मेघश् च न भवेत् (इन्द्रः कृष्णस्य शक्तिमापनार्थम् एतत् इच्छति)।"
भाष्यानुवाद :-
इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए एक बैल अथवा साँड़ को भी देखा और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं कृष्ण के साथ देखना चाहूँगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़ हुए कृष्ण से युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा। वह स्थान जहाँ जल और- (नभ) बादल भी न हो (अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह सब इच्छा जाहिर करता है )।१४।
व्याकरणिक विश्लेषण:-
मया - (अस्मद् शब्द, तृतीया विभक्ति, एकवचन) - कर्ता के अर्थ में =मेरे द्वारा।
यमुनाजलस्य - (षष्ठी तत्पुरुष समास) - यमुना के जल का।
विविधानि रूपाणि - (विशेषण-विशेष्य) - विविध रूप (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन)।
अंशुमत्याः - (पञ्चमी/षष्ठी विभक्ति) - यनुनानदी का ।
निर्जने प्रदेशे - (विशेषण-विशेष्य, सप्तमी विभक्ति) - निर्जन स्थान पर।
चरन् - (शतृ प्रत्यय) - चरता हुआ।
द्रष्टुम् - (दृश् धातु + तुमुन् प्रत्यय) - देखने के लिए।
युध्यन्तं - (युध् धातु + शतृ प्रत्यय) - युद्ध करते हुए को।
अडिग-स्थित-कृष्णेन - (तृतीया तत्पुरुष) - स्थिर कृष्ण के द्वारा।
व्याख्या:-
इन्द्र अंशुमती नदी के तट पर निर्जन स्थान पर एक उग्र वृषभ को देखकर, कृष्ण की अद्भुत शक्ति को मापने के लिए, उन्हें निहत्थे और एक स्थान पर अडिग रहकर उस साँड से युद्ध करने की चुनौती देने की कामना करते हैं। यह भगवान कृष्ण के पराक्रम को सिद्ध करने का दृश्य है।
पदों के हिन्दी अनुवाद सहित अर्थ-
विषुण=विभिन्न रूप।
३-वृ॒ष॒णश्चर॑न्तम्= चरते हुए साँड को।
४-आजौ = संग्रामे = युद्ध में।
५-अ॒व॒ = उपसर्ग
६- त॒स्थि॒ऽवांस॑म्= तस्थिवस् शब्द का द्वितीया विभक्ति एकवचन का रूप तस्थिवांसम् है । तस्थिवस्= स्था--क्वसु स्थितवति (स्थिर)= अडिग अथवा जो एक ही स्थान पर खड़ा होते हुए है उस स्थिति में।
७-व:= युष्मभ्यम् । युष्माकम् । यष्मच्छब्दस्य द्बितीया चतुर्थी षष्ठी बहुवचनान्तरूपोऽयम् इति व्याकरणम् = युष्मान् - तुम सबको । ॥
८-उपह्वरे= निर्जन देशे।
९-वृ॒ष॒णः॒ = साँड ने ।
१०-युध्य॑त= युद्ध करते हुए।
११-आजौ= युद्ध में ।
१२-इष्या॑मि= मैं इच्छा करुँगा।।।१४।
हिन्दी अर्थ-इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए एक बैल अथवा साँड़ को भी देखा और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं कृष्ण के साथ देखना चाहूँगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़ हुए कृष्ण से युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा। वह स्थान जहाँ जल और (नभ) बादल भी न हो
(अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह सब इच्छा जाहिर करता है )।१४।
शब्दार्थ व्याकरणिक विश्लेषण-
१-द्र॒प्सम्= जल को -कर्मकारक द्वित्तीया विभक्ति।अपश्यम्=अदर्शम् -दृश् धातु का लङ्लकार (सामान्य भूतकाल ) क्रिया पदरूप - मैंने देखा ।
२- वि + सवन(सुन) रूप विषुण =(विभिन्न रूप)। षु (सु)= प्रसवऐश्वर्ययोः - परस्समैपदीय सवति सोता [ कर्मणि- ] सुषुवे सुतः सवनः सवः अदादौ (234) सौति स्वादौ षुञ् अभिषवे (51) सुनोति (911) सूनुः, पुं, (सूयते इति । सू + “सुवः कित् ।” उणादिसूत्र्र ३।३५। इति (न:) स:च कित् ) पुत्त्रः । (यथा, रघुः । १ । ९५ ।
“सूनुः =सुनृतवाक् स्रष्टुः विससर्ज्जोदितश्रियम् ) अनुजः । सूर्य्यः । इति मेदिनी ॥ अर्कवृक्षः । इत्यमरः कोश ॥
व्याकरणिक निर्देश-
षत्व विधान सन्धि :-"विसइक्कु हयण्सि षत्व" :- इक् स्वरमयी प्रत्याहार के बाद 'कु(कखगघड•) 'ह तथा यण्प्रत्याहार ( य'व'र'ल) के वर्ण हो और फिर उनके बाद 'स'आए तो वहाँ पर 'स'का'ष'हो जाता है:- यदि 'अ' 'आ' से भिन्न कोई स्वर जैैैसे इ उ आदि हो अथवा 'कवर्ग' ह् य् व् र् ल्' के बाद तवर्गीय 'स' उष्म वर्ण आए तो 'स' का टवर्गीय मूर्धन्य 'ष' ऊष्म वर्ण हो जाता है ।
शर्त यह कि यह "स" आदेश या प्रत्यय का ही होना चाहिए जैसे :- दिक् +सु = दिक्षु । चतुर् + सु = चतुर्षु। हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु । मातृ + सु = मातृषु । परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है
परन्तु अ' आ 'स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 'हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु । वि+सम=विषम । वि+सुन =विषुण अथवा विष्+ उणप्रत्यय=विषुण।
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
योगेश कुमार रोहि का भाष्य-
इस प्रसंग का संस्कृत अनुवाद और व्याकरणिक विश्लेषण नीचे दिया गया है।
संस्कृत -
"कृष्णो यमुनायाः (अंशुमत्याः) गर्भे जलस्याधः स्वकीयं देदीप्यमानं शरीरं धारयामास, यः स्वगोपानां विशाम् (वैश्यवृत्तिसम्पन्नानां) सखा आसीत्। परितः चरन्तीभिर् गौभिः सह निवसन्तः ते गोपाः इन्द्रेण बृहस्पतेः साहाय्येन शिशासिषाञ्चक्रे।"
व्याकरणिक टिप्पणी:-
देदीप्यमानं शरीरम्: 'दीप्' धातु में यङ्-प्रत्यय (बार-बार चमकने के अर्थ में) लगाकर 'देदीप्यमान' शब्द बनता है। यह 'शरीरम्' का विशेषण है।
धारयामास: 'धृ' धातु (धारण करना) का लिट् लकार (परोक्ष भूतकाल) है।
विशाम्: 'विश्' शब्द का षष्ठी बहुवचन, जिसका अर्थ प्रजा या वैश्य वृत्ति[ गोपालन व कृषि करने] वाले लोग होता है।
चरन्तीभिः गौभिः सह: 'सह' के योग में तृतीया विभक्ति (गौभिः) का प्रयोग हुआ है। 'चरन्तीभिः' यहाँ विशेषण है।
शिशासिषाञ्चक्रे का अर्थ है— "शासन करने की इच्छा की"।
यह शब्द 'शास्' (शासन करना/उपदेश देना) धातु से बना है। इसकी व्याकरणिक संरचना इस प्रकार है:
धातु: शास् - शासन करना, उपदेश देना या अनुशासित करना।
प्रत्यय: सन् - यह प्रत्यय 'इच्छा' के अर्थ में जोड़ा जाता है। 'शास् + सन्' मिलकर 'शिशासिष्' बनता है, जिसका अर्थ है 'शासन करने की इच्छा'।
लकार: लिट् लकार - यह परोक्ष भूतकाल (जो आँखों के सामने न हुआ हो) को दर्शाता है।
रूप: यह आत्मनेपद, प्रथम पुरुष, एकवचन का रूप है।
शब्दार्थ-
“अध =अथ अधो वा = नीचे ।
“द्रप्सः= द्रव्य अथवा जल बिन्दु: ( Drops)
“अंशुमत्याः=यमुनाया: नद्याः = यमुना नदी के “(उपस्थे=समीपे) पास में अथवा गोद में।
“त्विष धातु =दीप्तौ अर्थे = त्विष् धातु का अर्थ- चमकना है।
तित्विषाणः= दीप्यमानः= चमकता हुआ।
सन् =भवन्= होता हुआ।
“तन्वम् द्वितीया कर्मणि वैदिके रूपे = शरीरम्
“(अधारयत् = शरीर धारण किया)।
परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् = बल प्राप्ति के लिए अपने शरीर को आहार आदि से पोषित( पुष्ट) किया।
“इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा =सहायेन = इन्द्र ने जाकर बृहस्पति के साथ “अदेवीः = देवानाम् ये न पूजयन्ति इति अदेवी:। कृष्णरूपा इत्यर्थः = जो देवताओं को नहीं पूजता वह कृष्ण ।१५।
यद्वा। पापयुक्तत्वादस्तुत्याः = अथवा पाप युक्त “आचरन्तीः =आगच्छन्तीः= चलती हुईं। “विशः=गोपालका: = कृषि कर्म और गोपालन करने वाले "अभि "ससहे षह् (सह्) लिट्लकार (अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) । शक्यार्थे =चारो और से सख्ती की अथवा शासन किया।
सह्- सह्यति विषह्यति ससाह सेहतुः सिसाहयिषति सुह्यति सुषोह अधेः प्रसहने (1333) इत्यत्र सह्यतेः सहतेर्वा निर्देश इति
विशेष-
पुराणों में भी कृष्ण समस्त देवों के यज्ञों को बन्द करा देते हैं। क्योंकि उन यज्ञों में निरीह पशुओं का वध होता है। जो विशेष रूप से इन्द्र देव को लक्ष्य करके किए जाते हैं।
इसी सन्दर्भ में हम यह भी सुनिश्चित कर दें की कृष्ण को वैदिक ऋचाओं में असुर कहीं नहीं कहा गया है। ऋग्वेद की मूल ऋचा में उपस्थित अदेवी पद का की सायण ने भाष्य "असुर" के समानार्थक किया है। उसी को आधार मान कर वेदों का हिन्दी अनुवाद पढ़ने वाले जन- साधारण ने कृष्ण को असुर मान लिया है।
सारांश-
असुर शब्द का प्रयोग तो कृष्ण के लिए सायण ने अपने भाष्य में ही किया है। अन्यथा मूल ऋचा में असुर पद न. होकर अदेव पद है जैसा हम पूर्व में बता चुके हैं।
परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों को कहा गया है। इसी कारण सायण आचार्य ने कृष्ण को ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या (96) की कुछ ऋचाओं की अपने भाष्य में अदेवी: पद के आधार पर (13,14,15,) में कृष्ण को असुर अथवा "अदेव कहकर कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ ऐसा वर्णित किया है। सायण का सम्पूर्ण भाष्य इस अदेवी पद को लेकर भ्रान्तिजनक है।
परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ "प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों से है। इन्द्र, वरुण और शिव को भी वेदों में असुर कहा गया है।
अतः उपर्युक्त ऋचा के अनुसार स्पष्ट हुआ कि कृष्ण यमुना की तलहटी में इन्द्र से युद्ध करते हैं। और यह बात वैदिक सत्य है। किन्तु श्रीकृष्ण तो वैदिक काल से भी प्राचीन हैं।
कुल मिलाकर अन्तोतोगत्वा यहीं निष्कर्ष निकलता है कि सायण जैसे भाष्यकारों द्वारा श्रीकृष्ण से सम्बन्धित शब्दों के अर्थ का अनर्थ करके वेदों से श्रीकृष्ण की सत्ता को समाप्त करने को जो खड्यन्त्र किये हैं वे सफल नहीं हो सके। क्योंकि गोपेश्वर श्रीकृष्ण किसी न किसी रूप में वेदों में सदैव उपस्थित रहे और रहेंगे, यह ध्रुव सत्य है।
ऋग्वेद के खिलभाग में कृष्ण का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वैदिक परम्परा और परवर्ती पौराणिक परम्परा के बीच एक सेतु का काम करता है। खिलभाग ऋग्वेद के वे सूक्त हैं जो मुख्य संहिताओं के अन्त में परिशिष्ट के रूप में जोड़े गए हैं।
ऋग्वेद के खिलभाग में कृष्ण का वर्णन मुख्य रूप से निम्नलिखित सन्दर्भों और नामों में मिलता है:
1. वासुदेव कृष्ण -
खिलभाग के 'अश्वसूक्त' और अन्य अंशों में कृष्ण का उल्लेख एक वीर पुरुष और देवत्व के रूप में होने लगा था। यहाँ उन्हें 'वासुदेव' के नाम से भी सम्बोधित किया गया है, जो उन्हें वसुदेव के पुत्र के रूप में स्थापित करता है।
2. महाविष्णु के रूप में (As Maha-Vishnu)
खिलभाग के श्रीसूक्त (जो ऋग्वेद का एक अत्यन्त प्रसिद्ध खिल सूक्त है) में 'विष्णु' और उनकी शक्ति 'लक्ष्मी' का वर्णन है। यहाँ कृष्ण को विष्णु के अवतार या उनके स्वरूप के रूप में संकेतित किया गया है।
3. देवकीपुत्र-
यद्यपि 'देवकीपुत्र कृष्ण' का स्पष्ट उल्लेख मुख्य रूप से छान्दोग्य उपनिषद में मिलता है, लेकिन ऋग्वेद के खिल सूक्तों में कृष्ण के मानवीय और ईश्वरीय रूपों का सम्मिश्रण मिलता है, जहाँ उन्हें दुष्टों का संहार करने वाला बताया गया है।
महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण-
ऋग्वेद के मुख्य मण्डल (8)वें मण्डल में भी 'कृष्ण' का उल्लेख आता है, लेकिन उनके संदर्भ में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं
- ऋषि कृष्ण: ऋग्वेद के 8 वें मण्डल के कुछ सूक्तों के द्रष्टा (रचयिता) 'कृष्ण' नामक ऋषि हैं, जिन्हें 'कार्ष्ण' (कृष्ण का पुत्र अथवा अनुयायी) या आंगिरस कुल का माना गया है।
- देव कृष्ण: कुछ स्थानों पर इन्द्र द्वारा 'कृष्ण' नामक देव सत्ता को स्वीकार न करने वाले या कबीले के प्रमुख के युद्ध का वर्णन है (ऋग्वेद 8.96.13)।
निष्कर्ष:-
खिलभाग (परिशिष्ट) तक आते-आते कृष्ण का स्वरूप एक महापुरुष, योद्धा और विष्णु के अंश के रूप में उभर चुका था, जो आगे चलकर महाभारत और पुराणों में पूर्ण ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
ऋग्वेद के खिलभाग में अश्व सूक्त और श्रीसूक्त अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ये सूक्त वैदिक काल के उत्तरार्द्ध और पौराणिक काल के उदय के बीच की कड़ियों को दर्शाते हैं।
यहाँ इनके विशिष्ट सन्दर्भ और श्लोक दिए गए हैं:
1. श्रीसूक्त (Sri Suktam)
श्रीसूक्त ऋग्वेद के परिशिष्ट (खिलभाग) का सबसे प्रसिद्ध सूक्त है। इसमें देवी लक्ष्मी की आराधना की गई है और इसमें 'विष्णु' तथा 'कृष्ण' के वैष्णव स्वरूप के संकेत मिलते हैं।
प्रमुख श्लोक:-
कांसोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥ (श्लोक 4)
- अर्थ: जो मन्द मुस्कान वाली हैं, स्वर्ण के प्राकार (दीवारों) से घिरी हैं, दया से आर्द्र हैं, तेजोमय हैं, स्वयं तृप्त हैं और भक्तों को तृप्त करने वाली हैं, कमल पर विराजमान उन पद्मवर्णा लक्ष्मी का मैं यहाँ आह्वान करता हूँ।
इस सूक्त के अन्त में आने वाली 'फलश्रुति' में विष्णु की पत्नी के रूप में लक्ष्मी का वर्णन मिलता है, जो कृष्ण के 'विष्णु स्वरूप' को पुष्ट करता है:
लक्ष्मीं क्षीरसमुद्रराजतनयां श्रीरंगधामेश्वरीम्...
2. अश्व सूक्त (Asva Suktam)
अश्व सूक्त में दिव्य अश्वों और सूर्य के रथ के घोड़ों की स्तुति है। खिलभाग के अन्तर्गत अश्व सूक्त में 'वासुदेव' शब्द का प्रयोग मिलता है, जो कृष्ण के पौराणिक स्वरूप की प्राचीनता को सिद्ध करता है।
सन्दर्भ: ऋग्वेद खिलभाग (अश्व सूक्त)
प्रमुख सन्दर्भ श्लोक (वासुदेव गायत्री का बीज):
खिलभाग के अश्व सूक्त के बाद आने वाले संकलन में विष्णु और वासुदेव की एकता पर बल दिया गया है:
नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
- सन्दर्भ: यह मन्त्र खिल सूक्तों के अन्तर्गत 'विष्णु गायत्री' के रूप में प्रसिद्ध है।
- महत्व: यहाँ 'वासुदेव' और 'विष्णु' को एक ही परम तत्व माना गया है। यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है कि खिलभाग की रचना के समय तक कृष्ण (वासुदेव) को सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा जाने लगा था।
यदा यदा युजो यथासि गोविन्द सखीनां विता।
तदा तदा न आ भर धनमस्मभ्यं सुवेदिदम्॥
- यदा यदा युजो यथासि: जब-जब भी आप हमारे सहायक या मित्र बनते हैं।
- गोविन्द सखीनां विता: हे गोविन्द (रक्षक)! आप अपने मित्रों और सखाओं के रक्षक (विता) हैं।
- तदा तदा न आ भर: तब-तब आप हमारे लिए लेकर आएं।
- धनमस्मभ्यं सुवेदिदम्: वह श्रेष्ठ धन जो हमारे लिए कल्याणकारी और आसानी से प्राप्त होने वाला हो।
ऋग्वेद संहिता (मण्डल 1, सूक्त 82, ऋचा 4)
संस्कृत पाठ:
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परितस्थुषः। रोचन्ते रोचना दिवि॥
उपो षु शृणुही गिरो मघवन्मातभिष्टये। यदा यदा युजो यथासि गोविन्द सखीनां विता ॥
शब्दार्थ और सन्दर्भ:
- गोविन्द (Govinda): यहाँ इन्द्र को 'गोविन्द' कहकर पुकारा गया है। इसका अर्थ है—"खोई हुई गौओं को खोजने या प्राप्त करने वाला।"
- मघवन: ऐश्वर्यवान इन्द्र।
- विता: रक्षा करने वाला।
भावार्थ:
"हे ऐश्वर्यवान इन्द्र (मघवन)! हमारी स्तुतियों को सुनिए। आप हमारे रक्षक हैं। हे गोविन्द! जब भी आप हमारे साथ होते हैं, आप अपने सखाओं (भक्तों) की रक्षा करने वाले और उन्हें अभीष्ट फल (गौएँ/ज्ञान) प्रदान करने वाले होते हैं।"
अन्य सन्दर्भ:
1. ऋग्वेद 9.96.18 (सोम के लिए):
नवम मण्डल में सोम पवमान की स्तुति में भी इसी धातु से बना विशेषण मिलता है:
ऋषिमना य ऋषिंकृत्स्वर्षाः सहस्रणीथः पदवीः कवीनाम् ।
तृतीयं धाम महिषः सिषासञ्छ्येनो विचाकाशद् गोविद् अन्तः ॥
(यहाँ 'गोविद्' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ भी 'गौओं को जानने वाला' या 'प्राप्त करने वाला' है।)
निष्कर्ष:
ऋग्वेद की इन ऋचाओं में 'गोविन्द' शब्द उस शक्ति का परिचायक है जो अंधकार (असुर पणि) से प्रकाश (गौओं) को मुक्त कराती है। यही दार्शनिक आधार आगे चलकर श्रीकृष्ण के नाम के साथ जुड़ा, जहाँ उन्होंने इन्द्र के स्थान पर स्वयं को 'गोविन्द' के रूप में प्रतिष्ठित किया (गोवर्धन लीला के पश्चात)।
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