📌 1. भगवद्गीता 4:13 — वर्ण व्यवस्था
श्लोक (संक्षेप):
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः…
हिंदी अर्थ:
मैंने चार वर्णों की रचना गुण और कर्म के आधार पर की है।
🔍 विवाद क्यों?
कुछ लोग इसे जन्म आधारित जाति व्यवस्था का समर्थन मानते हैं, जबकि कई विद्वान कहते हैं कि यह कर्म आधारित सामाजिक वर्गीकरण था, जन्म से नहीं।
इसी श्लोक के समर्थन में अन्यत्र भी गीता नें वर्णन है-
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 (मोक्षसन्न्यासयोग) का 41वाँ श्लोक है:
"ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥" (18.41)
"ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥" (18.41)
अर्थ: हे परंतप (अर्जुन)! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य (विशाम्) और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों (सत्व, रज, तम) के आधार पर बंटे हुए हैं।
मुख्य विवरण:
- गुणों के अनुसार विभाजन: कर्म का विभाजन जन्म से नहीं, बल्कि व्यक्ति के स्वभाव और गुणों (स्वभाव-प्रभवैर्गुणैः) के अनुसार होता है।
- ब्राह्मण: जिसमें सात्विक स्वभाव (ज्ञान, शम, दम, तप, शौच)आदि गुण हों।
- क्षत्रिय: रजोगुण की अधिकता जिसमें (शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध में न भागना)।
- वैश्य (विशाम्): रज और तमोगुण (कृषि, गोपालन, व्यापार)।
- शूद्र: तमोगुण की अधिकता (सेवा करना)।
- परंतप: अर्जुन का संबोधन, जिसका अर्थ है 'शत्रुओं को तपाने वाला'।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि समाज में कार्य विभाजन व्यक्ति की आंतरिक प्रकृति और गुणों पर आधारित है जन्म के आधार पर नहीं।
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