अध्याय(11)- प्रमुख यादव सामाजिक
कार्यकर्ता।
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित भारत के प्रमुख यादव सामाजिक कार्यकर्ता एवं समाज सेवकों के बारे में जानकारी देना है
(1)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज (2)- गोपाचार्य श्री माता प्रसाद यादव (3)- गोपाचार्य श्रीयोगेश कुमार रोहि
(4)- राव विजेन्द्र सिंह यादव (5)- जाहल बेन अहीर
(6)- रमा भाई अहीर (7) शैलेन्द्र सिंह यादव (इटावा)
(8)- मनोज कुमार यादव (बिहार) (9)- सुनील यादव सुल्तानपुरिया (10)- राजित सिंह यादव।
(2)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज-
गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का जन्म- 25 जुलाई सन् 1972 को उत्तर प्रदेश के (गाजीपुर जिला) में एक किसान परिवार में हुआ है। इनके पिता स्वर्गीय श्री रामाधार सिंह यादव हनुमान सिंह इन्टर कालेज देवकली में संस्कृत के प्रवक्ता पद पर रहे हैं। इनकी माता स्वर्गीय श्रीमती कौशल्या देवी हैं।
इनके माता-पिता दोनों ही श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। जिनका प्रभाव आत्मानन्द जी महाराज पर भी पडा़ और ये भी श्रीकृष्ण भक्त हो गये। ये श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति और साधना में सदैव लीन होकर पौराणिक एवं आध्यात्मिक ग्रन्थों का अध्ययन करके परमेश्वर श्रीकृष्ण के समस्त गूढ़ रहस्यों और सम्पूर्ण आध्यात्मिक चरित्रों को गहराई से जानने का प्रयास करते और परमेश्वर श्रीकृष्ण के स्वरूप को अपने अन्तर्मन में देखते और अनुभव करते। इसके बाद इन्होंने यह संकल्प लिया कि परमेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति और उनके उपदेशों को जन-जन तक पहुँचाना है। इसके लिए उन्होंने अबतक निम्नलिखित कार्य किया।
उपलब्धियाँ-
(क)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज ने श्रीकृष्ण के उपदेशों और उसके वंश विस्तार को जन-जन तक पहुँचाने के लिए 10 जनवरी 2019 को यूट्यूब पर "यादव सम्मान" नाम से एक चैनल बनाकर परमेश्वर श्रीकृष्ण के उपदेशों, उसके गूढ़ रहस्यों और उनके द्वारा सृष्टि सृजन तथा उनके वंश विस्तार को विडियो के माध्यम से बताना प्रारम्भ किया। इनके चैनल के विडियो को अबतक (आज इस किताब को लिखने तक - 07-02-2026) भारत सहित अन्य देशों के कुल- 4 करोड़ से अधिक लोगों ने देखा और श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यो को गहराई से जाना और समझा। इनके चैनल से सबसे ज्यादा लाभ यह हुआ कि यादव समाज के बहुत से लोग एक दूसरे जुड़े सके, जिससे आपसी विचारों का आदान-प्रदान होना और आसान हो गया।
इस सम्बन्ध में लेखक- गोपाचार्य हंस श्रीमाता प्रसाद जी का कहना है कि "आत्मानन्द जी महाराज द्वारा यादवों के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को जगाने के लिए जो प्रयास किया गया है वह अद्वितीय है"।
(ख)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य "श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था" की स्थापना से सम्बन्धित है, जिसका मुख्य उद्देश्य गोपाचार्यों द्वारा श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करना है।
उन्होंने इस महत्वपूर्ण संस्था की स्थापना 20 नवंबर 2023 को गोपाष्टमी के दिन अपने दो सहयोगियों (माताप्रसाद और योगेश कुमार रोहि) को लेकर की। उसी समय उन्होंने (माता प्रसाद और योगेश कुमार रोहि) दोनों को एक साथ औपचारिक घोषणा करते हुए संस्था के गोपाचार्य पद पर अभिषिक्त किया और आप स्वयं संस्था के शीर्ष - गोपाचार्य हंस पद पर आसीन हुए। तभी से इनको गोपाचार्य हंस के नाम जाना जाने लगा।
इस सम्बन्ध में ज्ञात हो कि गोपाचार्य पदनाम एक यूनिक (Unique) अर्थात् इकलौता नाम है, "जिसके समान कोई दूसरा पद न हो"। अर्थात् यह पदनाम सिर्फ गोपों यानि यादवों के आचार्य (गुरू) से ही सम्बन्धित है अन्य किसी से नहीं है, या कहें गोपाचार्य पदनाम का सम्बन्ध ब्राह्मी व्यवस्था के किसी व्यास पीठ या शंकराचार्य इत्यादि से नहीं है। इसलिए यह पदनाम अपने आप में यूनिक (Unique) है।
दूसरी बात यह कि- श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था का मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्तर पर गोपाचार्यों द्वारा श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करना है।
(ग)- इनका तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कार्य श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" और "यदुवंशसंहिता" जैसे दो महत्वपूर्ण ग्रन्थों को लिखवाने का है। इनके ही मार्गदर्शन में "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" और "यदुवंश संहिता" नाम की महत्वपूर्ण ग्रन्थों का लेखन कार्य विद्वान लेखकों- गोपाचार्य श्री योगेश कुमार रोहि और गोपाचार्य श्री माताप्रसाद द्वारा बड़े ही मनोयोग से किया गया है, जो श्रीकृष्ण पर लिखी गई अबतक की सर्वश्रेष्ठ कृति हैं।
अब यहाँ पर कुछ लोगों को यह संशय अवश्य हुआ होगा कि "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" पुस्तक में परमेश्वर श्रीकृष्ण के बारे में ऐसा क्या लिखा गया है वह अबतक की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक हो गई। तो इस सम्बन्ध में ज्यादा तो नहीं किन्तु उसकी विषय सूची को अवश्य बताना चाहेंगे जिससे आप स्वयं निर्णय कर सकते हैं कि यह श्रीकृष्ण पर लिखी गई "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" अबतक की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक क्यों है।
"श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" की विषय सूची-
अध्याय-
(१)- पूजा-अर्चना के विधि- विधान एवं गलत कथाओं को सुनने व कहने के दुष्परिणामों का वर्णन।
[क] - परमेश्वर की सार्थकता व पहचान।
[ख] - तैंतीस (३३) कोटि देवता में किसकी पूजा करें ?
[ग] - श्रीकृष्ण पूजा के लाभ। [घ] - शिव पूजा के लाभ
[ङ] - विष्णु पूजा के लाभ। [च] - श्रीराम पूजा के लाभ।
[छ] - देवी सावित्री व सरस्वती पूजा के लाभ।
[ज] - श्रीकृष्ण कथा कौन कह सकता हैं ?
[झ] - गलत कथा कहने व सुनने के दुष्परिणामों का वर्णन
[ञ] - सच्चे गुरू की पहचान।
(२)- श्रीकृष्ण का स्वरूप एवं उनके गोलोक का वर्णन।
(३)- श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर या परमशक्ति नही है।
(४)- गोलोक में गोप-गोपियों सहित नारायण, शिव, ब्रह्मा आदि देवताओं की उत्पत्ति तथा सृष्टि का विस्तार।
(५)- भगवान श्रीकृष्ण का सदैव गोप होना तथा गोपकुल में उनका अवतरण।
(६)- गोप-कुल के श्रीकृष्ण सहित कुछ महान पौराणिक व्यक्तियों का परिचय।
भाग- (१) गोपेश्वर श्रीकृष्ण का परिचय।
भाग- (२) श्रीराधा का परिचय।
भाग- (३) पुरुरवा और उर्वशी का परिचय।
भाग- (४) आयुष, नहुष, और ययाति का परिचय।
(७)- गोप कुल के यादव वंश का उदय एवं उसके प्रमुख सदस्यपतियों का परिचय।
भाग- (१) महाराज यदु का परिचय।
भाग- (२) हैहय वंशी यादवों का परिचय।
भाग- (३) यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंशज।
(८)- यादवों का मौसल युद्ध तथा श्रीकृष्ण का गोलोक गमन।
भाग- (१)- यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता एवं श्रीकृष्ण को बहेलिए से मारे जाने की बातों का खण्डन
भाग- (२)- श्रीकृष्ण का गोलोक गमन।
(९)- यादवों की जाति, वर्ण, वंश, कुल एवं गोत्र।
भाग- (१) जातियों की मौलिकता (Originality) एवं आभीर जाति की उत्पत्ति।
भाग- (२) भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना।
[क]- पञ्चमवर्ण वर्ण की उत्पत्ति। [ख]- ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति।
[ग] - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य में अन्तर-
[१]- जन्मगत एवं कर्मगत अन्तर।
[२]- यज्ञमूलक एवं भक्तिमूलक अन्तर।
[३]- भेदभाव एवं समतामूलक अन्तर-
भाग- (३) यादवों का वंश।
भाग- (४) यादवों का कुल।
भाग- (५) यादवों का गोत्र।
(१०)- यादवों का वास्तविक गोत्र कार्ष्ण है या अत्रि ?
(११)- वैष्णव वर्ण के सदस्यों के प्रमुख कार्य एवं दायित्व।
भाग- [१] गोपों का ब्राह्मणत्व (धर्मज्ञ) कर्म-
(क)- सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र अहीर हैं।
(ख)- अहीर कन्या वेदमाता गायत्री का परिचय
(ग)- यज्ञों में हवन को ग्रहण करने वाली गोपी स्वाहा और स्वधा का परिचय।
(घ)- ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना का परिचय।
भाग- [२] गोपों का क्षत्रित्व कर्म।
भाग- [३] गोपों का वैश्य कर्म।
भाग- [४] गोपों का शूद्र कर्म।
(१२)- वैष्णव वर्ण" के गोपों की पौराणिक ग्रन्थों में प्रशंसा एवं सांस्कृतिक विरासत-
भाग [१]- गोपों की पौराणिक प्रशंसा।
भाग [२]- भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।
(क)- हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य। (ख)- गोपों की देन "पञ्चम वर्ण"। (ग)- किसान और कृषि शब्द कृष्ण सहित गोपों की देन है। (घ)- आर्य व ग्राम संस्कृति के जनक गोप हैं। (ङ)- आभीर छन्द और आभीर राग।
अतः "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" की विषय सूची को देखने से ही समझ में आता है कि यह पुलाँ अद्भुत, एवं अद्वितीय है।श्रीकृष्ण साराङ्गिणी को मंगवाने के लिए - मोबाइल नंबर- 919452533334 तथा 918077160219 पर कोई भी सम्पर्क कर सकता है। ये दोनों मोबाइल नंबर उन दो विद्वान लेखकों के हैं जिन्होंने दोनों किताबों को लिखा है।
(3)- गोपाचार्य श्री माता प्रसाद यादव
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(4)- गोपाचार्य श्री योगेश कुमार रोही-
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(10)- राजित सिंह यादव
चौधरी राजित सिंह यादव का जन्म 15 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के बरहज क्षेत्र स्थित नरसिंह डांड गाँव में हुआ था। जहाँ आज भी उनकी स्मृति में 'राष्ट्रीय यादव दिवस' का बड़ा आयोजन किया जाता है।
स्व. चौधरी राजित सिंह यादव एक प्रभावशाली सामाजिक सुधारक और विचारक थे, जिन्हें मुख्य रूप से यादव समुदाय को एक नई पहचान देने के लिए जाना जाता है।
उनकी ख्याति तब हुई जब उन्होंने 1897 के आसपास अहीर समुदाय को 'यादव' उपनाम अपनाने के लिए गाँव, शहर, और कस्बों पैदल चलकर प्रेरित किया। उनके प्रयासों के फलस्वरूप 1910 के बाद देश भर में 'यादव' उपनाम का चलन तेजी से बढ़ा। इसके पहले यादव समाज अपनी मूल पहचान को भूल गया था। इसका मुख्य कारण था, भारत का लम्बे समय से गुलाम होना तथा अचानक कुछ चाटुकार जातियों का राजाओं की चाटुकारिता करके अचानक आगे हो जाना। उन चाटुकारों के आगे यादव लोग अत्यन्त पीछे हो गये, क्योंकि यादवों का जन्मगत स्वभाव होता है कि- यादव अपने मान और स्वाभिमान के लिए कभी झुक नहीं सकते। जिसका परिणाम यह हुआ कि यादव समाज अत्यन्त पिछड़ गया और धीरे धीरे अपनी मूल पहचान को भी खोता गया।
किन्तु चौधरी राजित सिंह यादव अपने भूले बिसरे यादवों को पुनः उनकी मूल पहचान को वापस लाने के लिए स्वयं कमर कसी और भारत के प्रत्येक प्रान्तों के लगभग प्रत्येक गाँवों, शहरों और कस्बों में पैदल चलकर यादवों को जगाने का कार्य किया। यादव समाज उनके इस कृत्य का सदैव ऋणी रहेगा। किन्तु दुर्भाग्य है कि जिसने यादवों को जगाया आज यादव समाज उसे ही भूल गया।
प्रमुख उपलब्धियाँ
चौधरी राजित सिंह यादव अखिल भारतीय यादव महासभा के प्रारंभिक विचारकों और संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने समुदाय के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए निरन्तर कार्य किया।
उन्होंने 'यादव' नाम से एक पत्रिका भी निकाली थी। उनकी वैचारिक स्पष्टता इतनी प्रभावी थी कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर जैसे बड़े नेता भी उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करते थे।
उन्होंने यादवों की ऐतिहासिक और क्षत्रिय उत्पत्ति को रेखांकित करने वाले साहित्य के लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था की स्थापना
गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) की स्थापना 20 नवंबर 2023 को गोपाष्टमी के दिन श्री आत्मानन्द जी महाराज ने अपने दो सहयोगियों (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) को लेकर किया। उसी समय उन्होंने (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) दोनों को एक ही साथ औपचारिक घोषणा करते हुए संस्था के गोपाचार्य हंस पद अभिषिक्त किया और अपने स्वयं गोपाचार्य हंस पद पर आसीन हुए। तभी से इन तीनों को गोपाचार्य हंस पदनाम नाम से जाना जाता है। ज्ञात हो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा पदनाम कहीं नहीं है। यह आत्मानन्द जी महाराज के अन्तर्मन की उपज है, जो अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता नाम है। गोपाचार्य नाम के बारे में उन्होंने स्वयं कहा है कि- गोपाचार्य नाम इसलिए इकलौता नाम है, क्योंकि यह पदनाम सिर्फ गोपों यानी यादवों के आचार्य या गुरु से ही सम्बन्धित है अन्य किसी से नहीं है, या कहें गोपाचार्य पदनाम का सम्बन्ध ब्राह्मी व्यवस्था के किसी भी व्यास पीठ, संकराचार्य या अखाड़े इत्यादि से नहीं है। इसलिए यह पदनाम अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में यादव कथावाचकों के अतिरिक्त और किसी का नहीं है।
संस्था के उद्देश्य एवं उसके द्वारा सृजित प्रमुख पद
गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) का मुख्य उद्देश्य विद्वान गोपाचार्यों द्वारा वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करना तथा भारत के प्रत्येक ग्राम सभा स्तर पर राधा कृष्ण मंदिर का निर्माण करना है। संस्था अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए निम्नलिखित पद सृजित किया है -
(1)- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-
राष्ट्रीय स्तर पर संस्था का एक अध्यक्ष और उसके विकल्प में एक उपाध्यक्ष पद होगा जो राष्ट्रीय स्तर पर संस्था के निर्देशन में कार्य करेगा और श्रीकृष्ण कथा की व्यवस्था व संचालन में सहयोग करेगा। इसी तरह से भारत के प्रत्येक राज्यों के लिए एक राज्य- अध्यक्ष और क्रमशः जिला- अध्यक्ष होंगे। जो राष्ट्रीय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के निर्देशन में काम करेंगे।
वर्तमान में इस संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गोपाचार्य हंस श्री माता प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोही जी हैं।
(2)- मंत्री-
संस्था का एक मंत्री पद होगा जिसका मुख्य कार्य निम्नलिखित होगा-
(क) सहमति के आधार पर संस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए समय-समय पर आवश्यक नियम बनाना और स्वीकृति प्रदान करना।
(ख) समयं समयं पर संस्था के पदाधिकारियों की बैठकों का आयोजन करना तथा उनके कार्यों की समीक्षा करके राष्ट्रीय अध्यक्ष (संस्था प्रमुख) को सूचित करना।
(ग) संस्था के पदाधिकारिओं और सदस्यों की प्रत्येक गतिविधियों पर पैनी नजर रखना मंत्री पद का मुख्य कार्य होगा। यदि कोई पदाधिकारी या सदस्य संस्था के नियमों के विपरीत कार्य करता है या कोई ऐसा षड्यंत्र रचता है जिससे संस्था की गरिमा प्रभावित हो सकती है, तो मंत्री को यह सर्वाधिकार होगा कि ऐसे सदस्य को राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुमति से उसकी सदस्यता और उसके पद से बिना देरी किए तत्काल प्रभाव से हटा सकता है। वर्तमान में इस संस्था के मंत्री- श्री श्रवण कुमार यादव जी हैं।
(3)- कोषाध्यक्ष-
संस्था का एक धनकोष होगा जो भारत के किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में संस्था के नाम से एक खाता के रूप में होगा। जिसकी निगरानी यादव (गोप) समाज का एक पदेन कोषाध्यक्ष करेगा। संस्था के बैंक खाते से धन तभी निकला जा सकेगा जब कोषाध्यक्ष सहित संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मंत्री और कोई एक गोपाचार्य हंस, इन तीनों का एक साथ हस्ताक्षर होगा।
संस्था के धन की आय-व्यय की आडिट वर्ष में एक बार संस्था की "निगरानी समिति" द्वारा की जाएगी जिसमें संस्था के पांच पदेन सदस्य- राष्ट्रीय अध्यक्ष, एक गोपाचार्य हंस, एक गोपाचार्य, कोषाध्यक्ष, और मंत्री होंगे। वर्तमान में इस संस्था के कोषाध्यक्ष- श्री पंकज सिंह यादव हैं।
(4)- संस्था के पदेन कथावाचक-
वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करने के लिए संस्था अनिवार्य रूप से यादव समाज से (दो) तरह के कथावाचकों का चयन करेगी जो पूरी तरह से संस्था के नियमों से प्रतिबद्ध होंगे।
(क)- पहले प्रकार के कथावाचकों में गोपाचार्य हंस होंगे जो श्रीकृष्ण कथा के समय दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता रखते हो अर्थात् परम् सत्य की वास्तविकता का बोध कराने की क्षमता रखते हों। गोपाचार्य हंस संस्था के नियमानुसार सफेद वस्त्र व सफेद पगड़ी या साफा को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों और उनके परम् स्वरुप तथा उनकी लीलाओं इत्यादि का वर्णन करेंगे। अभी वर्तमान में केवल तीन गोपाचार्य हंस- श्री आत्मानन्द जी, श्री योगेश कुमार रोही और श्री माता प्रसाद जी हैं। भविष्य में इनकी संख्या बढ़ सकती है।
(ख)-
दूसरे प्रकार के कथावाचक "गोपाचार्य" होंगे जो ज्ञान, अनुभव और श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों को जानने से थोड़ी बहुत पीछे रह गए हैं किन्तु संस्था के प्रति अत्यधिक समर्पित हैं, वे सभी गोपाचार्य होंगे और गोपाचार्य हंस की अनुपस्थिति में संस्था के नियमानुसार हल्के पीले रंग वस्त्र व पगड़ी को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण की कथा कहेंगे।
भविष्य में तीन गोपाचार्य हंसों के द्वारा इनके ज्ञान और अनुभव की परीक्षा लेकर इनको भी गोपाचार्य हंस पद पर अभिषिक्त किया जा सकेगा। वर्तमान में 15 से अधिक गोपाचार्य हैं।
(5)- संस्था के सदस्य-
संस्था के अनंत सदस्य होंगे जो हर वर्ग से होंगे। इनकी कोई निश्चित सीमा नहीं होगी। जो भी श्रीकृष्ण भक्त स्वेच्छा से संस्था सदस्यता लेना चाहते हैं वे कम से कम 1000₹ की सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ले सकते है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अधिक सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ग्रहण करना चाहता है तो उसके लिए संस्था आभार प्रकट करेगी। प्रत्येक सदस्यता ग्रहण करने वाले सदस्यों को सदस्यता प्रमाण पत्र के साथ एक अच्छा सा पहचान पत्र भी मिलेगा जो मौके पर गले मे धारण करने योग्य होगा।
कोई भी व्यक्ति संस्था की सदस्यता ग्रहण कर सकता है किन्तु संस्था को यह आशंका हो जाए कि वह व्यक्ति संस्था के प्रति उतना समर्पित नहीं है जितना चाहिए। तो ऐसे व्यक्ति को किसी (दो) सोशल मीडिया (ह्वाट्सएप और फेसबुक) पर प्रत्यक्ष रूप से यह घोषणा करनी होगी कि-
"मैं......आज दिनांक....को परमेश्वर श्रीकृष्ण को शाक्षी मानकर यह घोषणा करता हूँ कि गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था के प्रति निष्ठा भाव से समर्पित होकर काम करूँगा तथा संस्था के प्रत्येक नियमों का अक्षरशः पालन करूँगा"।
उसके उपरांत संस्था उसकी सदस्यता स्वीकार करेगी और भविष्य में आवश्कतानुसार उसे किसी पद पर भी अभिषिक्त कर सकेगी।
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