वर्ण-व्यवस्था

नरेश आर्य published a note. हिन्दू वर्ण व्यवस्था या जातिवाद का सच और रहस्य जिसे पढ़ कर भारत की लाखो साल पुरानी ऊँचनीच जातिवाद की समस्या हमेशा के लिए खत्म ! वेद कर्म से वर्ण या जाति व्यवस्था ! ...जन्म से वर्ण नहीं .. प्राचीन काल में जब बालक समिधा हाथ में लेकर पहली बार गुरुकुल जाता था तो कर्म से वर्ण का निर्धारण होता था .. यानि के बालक के कर्म गुण स्वभाव को परख कर गुरुकुल में गुरु बालक का वर्ण निर्धारण करते थे ! यदि ज्ञानी बुद्धिमान है तो ब्राह्मण ..यदि निडर बलशाली है तो क्षत्रिय ...आदि ! यानि के एक ब्राह्मण के घर शूद्र और एक शूद्र के यहाँ ब्राह्मण का जन्म हो सकता था ! ..लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवस्था लोप हो गयी और जन्म से वर्ण व्यवस्था आ गयी ..और हिन्दू धर्म का पतन प्रारम्भ हो गया !...नरेश आर्य ! इतिहास में ऐसे कई जाति बदलने उद्धरण है .. ..यह एक विज्ञान है ..ऋतु दर्शन के सोलहवीं अट्ठारहवीं और बीसवी रात्रि में मिलने से सजातीय संतान और अन्य दिनों में विजातीय संतान उत्पन्न होते है . एकवर्ण मिदं पूर्व विश्वमासीद् युधिष्ठिर ।। कर्म क्रिया विभेदन चातुर्वर्ण्यं प्रतिष्ठितम्॥ सर्वे वै योनिजा मर्त्याः सर्वे मूत्रपुरोषजाः ।। एकेन्दि्रयेन्द्रियार्थवश्च तस्माच्छील गुणैद्विजः ।। शूद्रोऽपि शील सम्पन्नों गुणवान् ब्राह्णो भवेत् ।। ब्राह्णोऽपि क्रियाहीनःशूद्रात् प्रत्यवरो भवेत्॥ (महाभारत वन पर्व) पहले एक ही वर्ण था पीछे गुण, कर्म भेद से चार बने ।। सभी लोग एक ही प्रकार से पैदा होते हैं ।। सभी की एक सी इन्द्रियाँ हैं ।। इसलिए जन्म से जाति मानना उचित नहीं हैं ।। यदि शूद्र अच्छे कर्म करता है तो उसे ब्राह्मण ही कहना चाहिए और कर्तव्यच्युत ब्राह्मण को शूद्र से भी नीचा मानना चाहिए ।। ब्राम्हण क्षत्रिय विन्षा शुद्राणच परतपः। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभाव प्रभवे गुणिः ॥ गीता॥१८-१४१॥ चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ गीता॥४-१३॥ अर्तार्थ ब्राह्मण, क्षत्रिया , शुद्र वैश्य का विभाजन व्यक्ति के कर्म और गुणों के हिसाब से होता है, न की जन्म के. गीता में भगवन श्री कृष्ण ने और अधिक स्पस्ट करते हुए लिखा है की की वर्णों की व्यवस्था जन्म के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर होती है. षत्रियात् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात् तथैव च॥ (मनुस्मृति) आचारण बदलने से शूद्र ब्राह्मण हो सकता है और ब्राह्मण शूद्र ।। यही बात क्षत्रिय तथा वैश्य पर भी लागू होती है ।। वेदाध्ययनमप्येत ब्राह्मण्यं प्रतिपद्यते ।। विप्रवद्वैश्यराजन्यौ राक्षसा रावण दया॥ शवृद चांडाल दासाशाच लुब्धकाभीर धीवराः ।। येन्येऽपि वृषलाः केचित्तेपि वेदान धीयते॥ शूद्रा देशान्तरं गत्त्वा ब्राह्मण्यं श्रिता ।। व्यापाराकार भाषद्यैविप्रतुल्यैः प्रकल्पितैः॥ (भविष्य पुराण) ब्राह्मण की भाँति क्षत्रिय और वैश्च भी वेदों का अध्ययन करके ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर लेता है ।। रावण आदि राक्षस, श्वाद, चाण्डाल, दास, लुब्धक, आभीर, धीवर आदि के समान वृषल (वर्णसंकर) जाति वाले भी वेदों का अध्ययन कर लेते हैं ।। शूद्र लोग दूसरे देशों में जाकर और ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि का आश्रय प्राप्त करके ब्राह्मणों के व्यापार, आकार और भाषा आदि का अभ्यास करके ब्राह्मण ही कहलाने लगते हैं ।। जातिरिति च ।। न चर्मणो न रक्तस्य मांसस्य न चास्थिनः ।। न जातिरात्मनो जातिव्यवहार प्रकल्पिता॥ जाति चमड़े की नहीं होती, रक्त, माँस की नहीं होती, हड्डियों की नहीं होती, आत्मा की नहीं होती ।। वह तो मात्र लोक- व्यवस्था के लिये कल्पित कर ली गई ।। अनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात् ।। आलस्यात् अन्न दोषाच्च मृत्युर्विंप्रान् जिघांसति॥ (मनु.) वेदों का अभ्यास न करने से, आचार छोड़ देने से, कुधान्य खाने से ब्राह्मण की मृत्यु हो जाती है ।। अनध्यापन शीलं दच सदाचार बिलंघनम् ।। सालस च दुरन्नाहं ब्राह्मणं बाधते यमः॥ स्वाध्याय न करने से, आलस्य से ओर कुधान्य खाने से ब्राह्मण का पतन हो जाता है ।। एक ही कुल (परिवार) में चारों वर्णी-ऋग्वेद (9/112/3) में वर्ण-व्यवस्था का आदर्श रूप बताया गया है। इसमें कहा गया है- एक व्यक्ति कारीगर है, दूसरा सदस्य चिकित्सक है और तीसरा चक्की चलाता है। इस तरह एक ही परिवार में सभी वर्णों के कर्म करने वाले हो सकते हैं।कर्म से वर्ण-व्यवस्था को सही ठहराते हुए भागवत पुराण (7 स्कंध, 11वां अध्याय व 357 श्लोक) में कहा गया है- जिस वर्ण के जो लक्षण बताए गए हैं, यदि उनमें वे लक्षण नहीं पाए जाएं बल्कि दूसरे वर्ण के पाए जाएं हैं तो वे उसी वर्ण के कहे जाने चाहिए। भविष्य पुराण ( 42, श्लोक35) में कहा गया है- शूद्र ब्राह्मण से उत्तम कर्म करता है तो वह ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ है। ‘भृगु संहिता’ में भी चारों वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख इस प्रकार है कि सर्वप्रथम ब्राह्मण वर्ण था, उसके बाद कर्मों और गुणों के अनुसार ब्राह्मण ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण वाले बने तथा इन वर्णों के रंग भी क्रमशः श्वेत, रक्तिम, पीत और कृष्ण थे। बाद कें तीनों वर्ण ब्राह्मण वर्ण से ही विकसित हुए। यह विकास अति रोचक है जो ब्राह्मण कठोर, शक्तिशाली, क्रोधी स्वभाव के थे, वे रजोगुण की प्रधानता के कारण क्षत्रिय बन गए। जिनमें तमोगुण की प्रधानता हुई, वे शूद्र बने। जिनमें पीत गुण अर्थात् तमो मिश्रित रजो गुण की प्रधानता रही, वे वैश्य कहलाये तथा जो अपने धर्म पर दृढ़ रहे तथा सतोगुण की जिनमें प्रधानता रही वे ब्राह्मण ही रहे। इस प्रकार ब्राह्मणों से चार वर्णो का गुण और कर्म के आधार पर विकास हुआ। इसी प्रकार ‘आपस्तम्ब सूत्रों’ में भी यही बात कही गई है कि वर्ण ‘जन्मना’ न होकर वास्तव में ‘कर्मणा’ हता है - “धर्मचर्ययाजधन्योवर्णः पूर्वपूर्ववर्णमापद्यतेजातिपरिवृत्तौ। अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जधन्यं जधन्यं वर्णमापद्यते जाति परिवृत्तौ।। अर्थात् धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है और वह उसी वर्ण में गिना जाता है - जिस-जिस के वह योग्य होता है । वैसे ही अधर्म आचरण से पूर्व अर्थात् उत्तम वर्ण वाला मनुष्य अपने से नीचे-नीचे वाले वर्ण को प्राप्त होता है और उसी वर्ण में गिना जाता है। मनु’ने ‘मनुस्मृति’ में बताया है – “शूद्रो बा्रह्मणतामेति ब्राह्मणश्चेति शूद्रताम्। क्षत्रियाज्जात्मेवन्तु विद्याद् वैश्यात्तथैव च।। अर्थात् शूद्र कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण, क्षत्रिय के समान गुण, कर्म स्वभाव वाला हो, तो वह शूद्र, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। वैसे ही जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कुल में उत्पन्न हुआ हो, उसके गुण व कर्म शूद्र के समान हो, तो वह शूद्र हो जाता है, वैसे ही क्षत्रिय या वैश्य कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण व शूद्र के समान होने पर, ब्राह्मण व शूद्र हो जाता है। ऋग्वेद में भी वर्ण विभाजन का आधार कर्म ही है। निःसन्देह गुणों और कर्मो का प्रभाव इतना प्रबल होता है कि वह सहज ही वर्ण परिवर्तन कर देता है; यथा विश्वामित्र जन्मना क्षत्रिय थे, लेकिन उनके कर्मो और गुणों ने उन्हें ब्राह्मण की पदवी दी। राजा युधिष्ठिर ने नहुष से ब्राह्मण के गुण - यथा, दान, क्षमा, दया, शील चरित्र आदि बताए। उनके अनुसार यदि कोई शूद्र वर्ण का व्यक्ति इन उत्कृष्ट गुणों से युक्त हो तो वह ब्राह्मण माना जाएगा। वर्ण परिवर्तन के कुछ उदाहरण - (a) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की | ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है | (b) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये |ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९) (c) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए | (d) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४) अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए? (e) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३) (f) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२) (g) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२) (h) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए | (i) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने | (j) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.३.५) (k) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं | (l) मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने | (m) ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना | (n) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ | (o) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे | (p) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया | (q) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया | (r) वत्स शूद्र कुल में उत्पन्न होकर भी ऋषि बने (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९) | (s) मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोकों से भी पता चलता है कि कुछ क्षत्रिय जातियां, शूद्र बन गईं | वर्ण परिवर्तन की साक्षी देने वाले यह श्लोक मनुस्मृति में बहुत बाद के काल में मिलाए गए हैं | इन परिवर्तित जातियों के नाम हैं – पौण्ड्रक, औड्र, द्रविड, कम्बोज, यवन, शक, पारद, पल्हव, चीन, किरात, दरद, खश | (t) महाभारत अनुसन्धान पर्व (३५.१७-१८) इसी सूची में कई अन्य नामों को भी शामिल करता है – मेकल, लाट, कान्वशिरा, शौण्डिक, दार्व, चौर, शबर, बर्बर| (u) आज भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और दलितों में समान गोत्र मिलते हैं | इस से पता चलता है कि यह सब एक ही पूर्वज, एक ही कुल की संतान हैं | लेकिन कालांतर में वर्ण व्यवस्था गड़बड़ा गई और यह लोग अनेक जातियों में बंट गए | उच्च वर्ण में विजातीय संतान उत्पन्न होने की बात गले नहीं उतर रही है परन्तु यही सत्य है और शास्त्रोक्त भी ..इसी से भारत में वर्ण व्यवस्था और मजबूत होगी और ऊँच नीच का भेदभाव भी समाप्त होगा ! हिन्दू एकता बढेगी !सौ सुनार की तो एक लुहार की ..इस लेख से भारतवर्ष में चली आ रही लाखो साल पुरानी ऊँचनीच जातिवाद आदि की समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जायेगी ! नरेश आर्य ओउम् ..! March 12, 2015 at 2:22pm · Public Like React Comment Share प्रणव भट्टाचार्य and 137 others View previous comments… Anand Kumar Gupta योनि के अनुसार हमारा स्वभाव, व्यवहार और व्यक्तित्व होता है। Like · Report · May 20 नरेश आर्य मानव योनि तो केवल एक ही है , वर्ण अलग है कन्फ्यूज़ मत होइए Like · Report · May 20 Vijay Patel Like · Report · May 20 Bharati Prasad Shah जन्मजात जाति वर्णव्यवस्था एकात्मक भारत विनाशक अधर्म आतंकवाद है। Like · 1 · Report · May 20 Nandan Jha सही में कोई जन्म से जाति लेके पैदा नही होता।ब्राह्मण जाति नही उपाधि है जो जगत रचयता ब्रह्मा जी से संबंधित है।जितने भी ग्रंथ जिनमे ब्राह्मण की जाति से सूचित किया गया है इनमें से किसी भी ग्रंथ की रचना कोई ब्राह्मण कुल उत्प्पन ऋषि ने नही किया।वर्ण जन्म आधारित जाति समाज जब बना तब राजतंत्र का उदय हो रहा था।राजतंत्र में राज राजा के हिसाब से ही संचालित होता है,ओर प्राम्भिक जनपद में एक भी जनपद के राजा ब्राह्मण नही थे ओर बाद में भी ब्राह्मण बिरले ही राजा बने हो।अर्थात जन्म आधारित जातिय समाज की स्थापना ब्राह्मणों ने नही उस समय के क्षत्रिय,यादव जो मूलतः अखंड भारत के राजा रहे उनकी देन है।कहा जाता है मनुवादी ब्राह्मण जबकि मनु ब्राह्मण नही क्षत्रिय थे,जिनसे आगे क्षत्रिय की पांच शाखा बना जिनमे प्रमुख रूप से क्षत्रिय ओर यादव(यदु) जो यदु वंशी के नाम से विख्यात हुई।यादव(यदु) मूलतः क्षत्रिय है जो हमेशा से भारत पर राजा के रूप में सभी वर्गों पर शासन किया है।तुर्क काल मे भी यादव राज कायम रहा है।भारतीय समाज मे जन्म आधारित जाति समाज उस समय के राजाओं की ही देन है।ऋग्वेद में कही भी जन्म आधारित जातीय समाज का वर्णन नही मिलता ,ये इस बात का प्रमाण है ब्राह्मणों ने जिसे बाद में क्षत्रिय राजाओं ने जन्म आधारित जाती बनाया का जन्म आधारित जातिय समाज नही बनाया बल्कि मनुवादी क्षत्रिय ओर यादवो( यादव मूलतः सबसे बड़ा शासक वर्ग रहा है पर भी OBC) ने बनाया।मनु का मूल वंशज पांचजन्य है जिसमे यदु(यादव) प्रमुख है।ब्राह्मण हमेशा से राजा में नीचे रहा है और नीचे रहने वाला या आदेश /आज्ञा का पालन करने वाला समाज मे जातिय आधारित वर्ण समाज नही ला सकता।अर्थात जन्म आधारित जाति में ब्राह्मणों का कोई देन नही है।ब्राह्मण को शासकों ने बलि का बकरा बना दिया और खुद बेकवर्ड क्लास बन बैठे ।ब्राह्मण जो हमेशा से शोषित था आज भी शोषित ही है।चूंकि राजा का बात का प्राभव जानता में ज्यादा होता है,इस लिए इन शोषकों द्वारा ब्राह्मणों पर अपनी सारी राजनीतिक अपराध को मढ़ दिया गया।मूलतः मनुवादी और जन्म आधारित जाति समाज ब्राह्मणों ने नही उस समय के राजाओं ने बनाया था।इनमें से सबसे बड़े राजा यदुवंशी(यादव),पुरु ,कुरु आदि थे।इन राजवंशों के उदय के साथ ही जन्म आधारित जाति समाज का उदय हुआ।जितने भी ऋषि जिन्हने जन्म आधारित जातिय समाज से संबंधित ग्रंथों की रचना की 99% ऋषि ब्राह्मण से उतपन्न (जन्म) ही नही था।ब्राह्मण को शासकों ने बदनाम किया।ब्राह्मणों ने यादवो और क्षत्रियो की पूजा की जैसे क्षत्रिय-भगवान राम,यादव-भगवान कृष्ण माँ बिंधवाशिनी का जन्म भी यादवों के घर हुई थी।भगवान भोलेनाथ ने भील शिकारी के रूप में आये जिनका पूजा ब्राह्मणों करतें है।ब्राह्मण कोई वर्ण आधारित समाज कैसे बना सकता जबकि ब्राह्मण क्षत्रिय,यादव(क्षत्रिय) जो भी श्रेष्ठ बने सबके पूजा अर्चना किया।जन्म आधारित जाति समाज उस समय के राजाओं की देन है,जिसे सभी वर्गों ने जैसे स्वीकार किया ब्राह्मणों ने भी स्वीकार किया। Edited · Like · Report · May 25 Shivsharan Prajapati Varn vyavastha america japan england me kyon nahi hai yadi bramha ji ke mukh se bramhin bahu se kshatriya udar se vaishya pairon se doosra ki utpatti hui to musalman jain isai farsi amrica vasi ki utpatti kanha se hui hogi Like · Report · May 25 Santosh Kumar Singh वर्ण व्यवस्था की जाति प्रथा समाप्त होनी चाहिए ये देश के विकास के लिए सबसे ज्यादा नुकसान की है और करती है Like · Report · Jun 5 Satendra Chauhan kon pagal kahata h ki jativyavastha Hindu Darm me h? Like · Report · Jun 25 Fatah Salvi Main Bolta Hoon Like · Report · Jul 10 at 5:21pm Ashok Nayak Bodh PUBLIC KO BUDHU BANAYA JATA HAI,YE BHARAT KA VINASH KAR DEGI Like · Report · Friday at 6:20pm Write a comment... Attach a Photo · Mention Friends

आत्मानं रथिनं विद्धि- आत्मा को रथ समझो !

संसार की कामनाओं में काम ( उपभोग करने की इच्छा-अथवा बुभुक्षा- का समावेश है और ये कामनाऐं अपनी तृप्ति हेतु अनैतिक और पापपूर्ण परिणामों का कारण बनती हैं । इसी पाप का परिणाम संसार की यातना और असंख्य पीड़ाऐं हैं  इन कामनाओं का दिशा परिवर्तन आध्यात्मिक कारणों से ही सम्भव है ।

कठोपनिषद् में वाजश्रवापुत्र ऋषिकुमार नचिकेता और यम देवता के बीच प्रश्नोत्तरों की कथा का वर्णन है । 
बालक नचिकेता की शंकाओं का समाधान करते हुए यमराज उसे उपमाओं के माध्यम से सांसारिक भोगों में लिप्त आत्मा, अर्थात् जीवात्मा, और उसके शरीर के मध्य का संबंध को स्पष्ट करते हैं ।

संबंधित आख्यान में यम देवता के निम्नांकित श्लोकनिबद्ध दो वचन जीवन सार्थक: उपमा अथवा रूपक के सूचक हैं ! 
_________________
  आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
 बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।३

 (कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
 (आत्मानम् रथिनम् विद्धि, शरीरम् तु एव रथम्, बुद्धिम् तु सारथिम् विद्धि, मनः च एव प्रग्रहम् ।)

 इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो । 
(लगाम – 
इंद्रियों पर नियंत्रण हेतु, 
अगले मंत्र में उल्लेख 
 __________________
 इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।। ४

(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४) 
(मनीषिणः इंद्रियाणि हयान् आहुः, विषयान् तेषु गोचरान्, आत्मा-इन्द्रिय-मनस्-युक्तम् भोक्ता इति आहुः ।)

मनीषियों, विवेकी पुरुषों, ने इंद्रियों को इस शरीर-रथ को खींचने वाले घोड़े कहा है, जिनके लिए इंद्रिय-विषय विचरण के मार्ग हैं,
 इंद्रियों तथा मन से युक्त इस आत्मा को उन्होंने शरीररूपी रथ का भोग करने वाला बताया है

प्राचीन भारतीय विचारकों का चिंतन प्रमुखतया आध्यात्मिक प्रकृति का रहा है । 
ऐहिक सुखों के आकर्षण का ज्ञान उन्हें भी रहा ही होगा  किंतु उनके प्रयास रहे थे कि वे उस आकर्षण पर विजय पायें । 
उनकी जीवन-पद्धति आधुनिक काल की पद्धति के विपरीत रही । 
स्वाभाविक भौतिक आकर्षण से लोग स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करें ऐसा वे सोचते रहे होंगे और उपनिषद् आदि ग्रंथ उनकी इसी सोच को प्रदर्शित करते हैं । 
 उनके दर्शन के अनुसार अमरणशील आत्मा शरीर के द्वारा इस भौतिक संसार से जुड़ी रहती है और यहां के सुख-दुःखों का अनुभव मन के द्वारा करती हैं ।
 मन का संबंध बाह्य जगत् से इंद्रियों के माध्यम से होता है । 
दर्शन शास्त्र में दस इंद्रियों की व्याख्या की जाती हैः पांच ज्ञानेंद्रियां (आंख, कान, नाक, जीभ तथा त्वचा) और पांच कर्मेद्रियां (हाथ, पांव, मुख, मलद्वार तथा उपस्थ अर्थात्  जननेद्रिय, पुरुषों में लिंग एवं स्त्रियों में योनि) ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से मिलने वाले संवेदन-संकेत को मन अपने प्रकार से व्याख्या करता है, 
सुख या दुःख के तौर पर । 

इंद्रिय-संवेदना क्रमशः देखने, सुनने, सूंघने, चखने तथा स्पर्शानुभूति से संबंधित रहती हैं ।
 किन विषयों में इंद्रियां विचरेंगी और कितना तत्संबंधित संवेदनाओं को बटोरेंगी यह मन के उन पर नियंत्रण पर रहता है ।

इंद्रिय-विषयों की उपलब्धता होने पर भी मन उनके प्रति उदासीन हो सकता है ऐसा मत मनीषियों का सदैव से रहा है ।
उक्त मंत्रों के अनुसार क्या कर्तव्य है और क्या नहीं का निर्धारण बुद्धि करती है और मन तदनुसार इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है ।

 इन मंत्रों का सार यह है: भौतिक भोग्य विषयों रूपी मार्गों में विचरण करने वाले इंद्रिय रूपी घोड़ों पर मन रूपी लगाम के द्वारा बुद्धिरूपी सारथी नियंत्रण रखता है ।
__________________________________________

रथ: शरीर पुरुष सत्य दृष्टतात्मा नियतेन्द्रियाण्याहुरश्वान् ।
तैरप्रमत:कुशली सदश्वैर्दान्तै:सुखं याति रथीव धीर:।२३।

षण्णामात्मनि युक्तानामिन्द्रयाणां प्रमाथिनाम् ।
यो धीरे धारयेत् रश्मीन् स स्यात् परमसारथि:।।२४।

इन्द्रियाणां प्रसृष्टानां हयानामिव वर्त्मसु धृतिं कुर्वीत सारथ्येधृत्या तानि ध्रुवम् ।।२५।

इन्द्रियाणां विचरतां यनमनोऽनु विधीयते ।
तदस्य हरते बुदिं नावं वायुरिवाम्भसि ।।२६।

येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्सु मोहात् फलागमम्।
तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ।।२७।।

इति महाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेय समस्या पर्वणि ब्राह्मण व्याधसंवादे एकादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:(211 वाँ अध्याय)


पुरुष का यह प्रत्‍यक्ष देखने में आने वाला स्‍थूल शरीर रथ है। आत्‍मा (बुद्धि) सारथि है और इन्द्रियों को अश्व बताया गया है। जैसे कुशल, सावधान एवं धीर रथी, उत्तम घोड़ों को अपने वश में रखकर उनके द्वारा सुख पूर्वक मार्ग तै करता है, उसी प्रकार सावधान, धीर एवं साधन-कुशल पुरुष इन्द्रियों को वश में करके सुख से जीवन यात्रा पूर्ण करता है।।२३।

जो धीर पुरुष अपने शरीर में नित्‍य विद्यमान छ: प्रमथन शील इन्द्रिय रुपी अश्रवों की बागडोर संभालता है, वही उत्तम सारथि हो सकता है । २४।

सड़क पर दौड़ने वाले घोड़ों की तरह विषयों में विचरने वाली इन इन्द्रियों को वश में करने के लिये धैर्य पूर्वक प्रयत्‍न करे। धैर्यपूर्वक उधोग करने वाले को उन पर अवश्‍य विजय प्राप्‍त होती है ।२५।

 जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्‍त पुरुष की बुद्धि हर लेती है ।२६।

 सभी मनुष्‍य इन छ: इन्द्रियों के शब्‍द आदि विषयों में उनसे प्राप्‍त होने वाले सुखरुप फल पाने के सम्‍बन्‍ध में मोह से संशय में पड़ जाते हैं। परंतु जो उनके दोषों का अनुसंधान करने वाला वीतराग पुरुष है, वह उनका निग्रह करके ध्‍यानजनित आनन्‍द का अनुभव करता है ।२७।
___________________          
इस प्रकार श्री महाभारत वनपर्व के अन्‍तर्गत मार्कण्‍डेय समस्‍या पर्व में ब्राह्मण व्‍याध संवाद विषयक दो सौ ग्‍यारहवां अध्‍याय पूरा हुआ

प्रस्तुति करण - यादव योगेश कुमार "रोहि" ग्राम आजा़दपुर पहाड़ीपुर-जिला अलीगढ़- उ०प्र०
___ 
8077160219

ब्राह्मण ......

Etymology
From Middle English brame, from Old French brame, bram (“a cry of pain or longing; a yammer”), of Germanic origin, ultimately from Proto-Germanic *bramjaną (“to roar; bellow”), from Proto-Indo-European *bʰrem- (“to make a noise; hum; buzz”). Compare Old High German breman (“to roar”), Old English bremman (“to roar”). More at brim. Compare breme. Noun Edit brame (uncountable) (obsolete) intense passion or emotion; vexation Spenser, The Fairie Queene, Book III, Canto II, 52 ... hart-burning brame / She shortly like a pyned ghost became. Part or all of this entry has been imported from the 1913 edition of Webster’s Dictionary, which is now free of copyright and hence in the public domain. The imported definitions may be significantly out of date, and any more recent senses may be completely missing. French Edit Verb Edit brame first-person singular present indicative of bramer third-person singular present indicative of bramer first-person singular present subjunctive of bramer first-person singular present subjunctive of bramer second-person singular imperative of bramer Anagrams Edit ambre, Ambre, ambré Italian Edit Noun Edit brame f plural of brama Anagrams Edit ambre Brema Spanish Edit Verb Edit brame First-person singular (yo) present subjunctive form of bramar. Third-person singular (él, ella, also used with usted?) present subjunctive form of bramar. Formal second-person singular (usted) imperative form of bramar. Last edited 6 months ago by Rukhabot

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

तुर्वसु का तुर्किस्तान में होना ।

For other uses, Troy
(disambiguation) निश्चित रूप से
Troy (Ancient Greek: Τροία, Troia and Ἴλιον, Ilion, or Ἴλιος, Ilios;
Latin: Trōia and Īlium;[note 1] Hittite: Wilusha or Truwisha;
Turkish: Truva or Troya) was a city situated in the far northwest of the region known in late Classical antiquity as Asia Minor, now known as Anatolia in modern Turkey, near (just south of) the southwest mouth of the Dardanelles strait and northwest of Mount Ida.
The present-day location is known as Hisarlik. It was the setting of the Trojan War described in the Greek Epic Cycle, in particular in the Iliad, one of the two epic poems attributed to Homer. Metrical evidence from the Iliad and the Odyssey suggests that the name Ἴλιον (Ilion) formerly began with a digamma: Ϝίλιον (Wilion); this is also supported by the Hittite name for what is thought to be the same city, Wilusa.
Troy
The walls of the acropolis belong to Troy VII, which is identified as the site of the Trojan War (c. 1200 BC)
(ईसा पूर्व १२ वीं सदी )
LocationTevfikiye, Çanakkale Province, Turkey
RegionTroad
Coordinates (39°57′27″N 26°14′20″E)
TypeSettlement
History
Founded 3000 BC
Abandoned 500 AD
PeriodsEarly Bronze Age to Byzantine
Reference no.849
RegionEurope and Asia
A new capital called Ilium (from Greek Ilion) was founded on the site in the reign of the Roman Emperor Augustus. It flourished until the establishment of Constantinople, became a bishopric and declined gradually in the Byzantine era, but is now a Latin Catholic titular see.
In 1865, English archaeologist Frank Calvert excavated trial trenches in a field he had bought from a local farmer at Hisarlik, and in 1868, Heinrich Schliemann, a wealthy German businessman and archaeologist, also began excavating in the area after a chance meeting with Calvert in Çanakkale.
These excavations revealed several cities built in succession. Schliemann was at first skeptical about the identification of Hisarlik with Troy, but was persuaded by Calvert[5] and took over Calvert's excavations on the eastern half of the Hisarlik site, which was on Calvert's property. Troy VII has been identified with the city called Wilusa by the Hittites, the probable origin of the Greek Ἴλιον, and is generally (but not conclusively) identified with Homeric Troy.
Today, the hill at Hisarlik has given its name to a small village near the ruins, which supports the tourist trade visiting the Troia archaeological site.[6] It lies within the province of Çanakkale, some 30 km south-west of the provincial capital, also called Çanakkale. The nearest village is Tevfikiye. The map here shows the adapted Scamander estuary with Ilium a little way inland across the Homeric plain. Due to Troy's location near the Aegean Sea, the Sea of Marmara, and the Black Sea, it was a central hub for the military and trade.
अन्य उपयोगों के लिए, ट्रॉय (निःसंकोच) देखें
ट्रॉय (प्राचीन यूनानी:
Τροία, ट्रॉआ और Ἴλιον, Ilion, या Ἴλιος, इलीओस, लैटिन: ट्रोआआ और एलियम; [नोट 1] हित्ती:
विलोष या ट्रुविशा; संस्कृत वैदिक रूप तुर्वसु
  तुर्की: ट्रुवा या ट्रोया)
एक शहर था   एशिया माइनर में , जिसे अब आधुनिक तुर्की में अनातोलिया के रूप में जाना जाता है,।

इसके दावेदार दक्षिणी-पश्चिमी मुर्गा डारडेनेलस की तरफ और माउंट ईडा के उत्तर-पश्चिम के निकट के प्राचीन काल में जाना जाते है। वर्तमान दिन का स्थान हिसारलिक के रूप में जाना जाता है ।
यह ग्रीक एपिक साइकिल में वर्णित ट्रोजन युद्ध की सेटिंग थी, ।
विशेष रूप से इलियड में, दो महाकाव्य कविताओं में से एक होमर को जिम्मेदार ठहराया गया था।
इलियड और ओडिसी के सशक्त सबूत बताते हैं कि नाम Ἴλιον (Ilion) पूर्व में एक digamma के साथ शुरू हुआ: Ϝίλιον (विलियन);
यह उसी शहर, विलुषा, के लिए हित्ती नाम का भी समर्थन करता है।
ट्रॉय
एट्रोपोलिस की दीवारें ट्रॉय VII के हैं,
जिसे ट्रोजन वॉर (सी। 1200 ईसा पूर्व) की साइट के रूप में पहचाना गया है।
3000 बीसी की स्थापना
500 ईस्वी छोड़ दिया
बीजान्टिन साम्राज्य के लिए काल का प्रारंभिक कांस्य युग--
क्षेत्र यूरोप और एशिया
रोमन सम्राट अगस्टस के शासनकाल में साइट पर एक नई राजधानी इलियम (ग्रीक इलियन से) की स्थापना की गई थी।
यह कॉन्स्टेंटिनोपल की स्थापना तक विकसित हुआ, एक बिशपचाय बन गया और बीजान्टिन युग में धीरे-धीरे गिरावट आई, लेकिन अब यह एक लैटिन कैथोलिक नामधारी है।
1865 में, अंग्रेजी पुरातत्वविद् फ्रैंक कैलवर्ट ने एक क्षेत्र में हिसारलिक में एक स्थानीय किसान से खरीदा था, और 1868 में एक धनी जर्मन व्यापारी और पुरातत्वविद् हेनरिक शल्यमैन ने कैल्वर्ट के साथ एक मौका मिलने के बाद क्षेत्र में उत्खनन शुरू किया। Çanakkale।
[3] [4] इन उत्खनन ने उत्तराधिकार में कई शहरों का निर्माण किया। स्लियममैन ट्रोय के साथ हिसारलिक की पहचान के बारे में पहली संदेह में था, लेकिन कैल्वर्ट [5] द्वारा राजी किया गया और हेलारलिक स्थल के पूर्वी हिस्से में कैल्वर्ट की खुदाई को संभाला, जो कैल्वर्ट की संपत्ति पर था। ट्रॉय VII को हिल्टाईस नामक शहर के साथ, ग्रीक Ἴλιον की संभावित मूल के नाम से शहर के रूप में पहचाना गया है, और सामान्यतः (लेकिन निर्णायक रूप से नहीं) होमेरिक ट्रॉय के साथ पहचाने जाते हैं
आज, हिसारलिक के पहाड़ी पर इसका नाम खंडहर के निकट एक छोटे से गांव में दिया गया है, जो टोरिया पुरातात्विक स्थल पर पर्यटकों के व्यापार का समर्थन करता है।
यह कनकले के प्रान्त के भीतर स्थित है, प्रांतीय राजधानी के 30 किमी दक्षिण-पश्चिम में भी, जिसे कनकले भी कहा जाता है।
निकटतम गांव तेवीफिक्स है यहां का नक्शा ऑलियम के साथ स्वीकृत घोटाला मुहाना का पता चलता है जो होमेरिक मैदान के पार एक छोटा रास्ता है।
ईजियन सागर, मोरमारा का सागर और काला सागर के पास ट्रॉय के स्थान के कारण यह सैन्य और व्यापार के लिए एक केंद्रीय केंद्र था। [7]
ट्रॉय को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में 1998 में जोड़ा गया था।
Ancient Greek historians variously placed the Trojan War in the 12th, 13th, or 14th centuries BC: Eratosthenes to 1184 BC, Herodotus to 1250 BC, and Duris of Samos to 1334 BC. Modern archaeologists associate Homeric Troy with archaeological Troy VII.[8]
In the Iliad, the Achaeans set up their camp near the mouth of the River Scamander (presumably modern Karamenderes),[9] where they had beached their ships. The city of Troy itself stood on a hill, across the plain of Scamander, where the battles of the Trojan War took place. The site of the ancient city is some 5 km from the coast today, but 3,000 years ago the mouths of Scamander were much closer to the city,[10] discharging into a large bay that formed a natural harbor, which has since been filled with alluvial material. Recent geological findings have permitted the identification of the ancient Trojan coastline, and the results largely confirm the accuracy of the Homeric geography of Troy.[11]
In November 2001, the geologist John C. Kraft from the University of Delaware and the classicist John V. Luce from Trinity College, Dublin, presented the results of investigations, begun in 1977, into the geology of the region.[12] They compared the present geology with the landscapes and coastal features described in the Iliad and other classical sources, notably Strabo's Geographia, and concluded that there is a regular consistency between the location of Schliemann's Troy and other locations such as the Greek camp, the geological evidence, descriptions of the topography and accounts of the battle in the Iliad.[13][14][15]
Besides the Iliad, there are references to Troy in the other major work attributed to Homer, the Odyssey, as well as in other ancient Greek literature (such as Aeschylus's Oresteia). The Homeric legend of Troy was elaborated by the Roman poet Virgil in his Aeneid. The Greeks and Romans took for a fact the historicity of the Trojan War and the identity of Homeric Troy with the site in Anatolia. Alexander the Great, for example, visited the site in 334 BC and there made sacrifices at tombs associated with the Homeric heroes Achilles and Patroclus.
After the 1995 find of a Luwian biconvex seal at Troy VII, there has been a heated discussion over the language that was spoken in Homeric Troy. Frank Starke of the University of Tübingen recently demonstrated that the name of Priam, king of Troy at the time of the Trojan War, is connected to the Luwian compound Priimuua, which means "exceptionally courageous".[16] "The certainty is growing that Wilusa/Troy belonged to the greater Luwian-speaking community," although it is not entirely clear whether Luwian was primarily the official language or in daily colloquial use.[17]
प्राचीन यूनानी इतिहासकारों ने विभिन्न तरह से ट्रोजन युद्ध को 12 वीं, 13 वीं या 14 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में रखा था: इरोटोथेनिनेस से 1184 ईसा पूर्व, हेरोडोट्स को 1250 ईसा पूर्व और साओस के ड्यूरीस को 1334 ईसा पूर्व। आधुनिक पुरातत्वविदों ने होमरिक ट्रॉय को पुरातात्विक ट्रॉय VII के साथ संबद्ध किया है। [8]
इलियड में, अचियंस ने नदी घोटाले के मुंह (संभवत: आधुनिक करमेन्देस) के मुहाने के पास अपने शिविर की स्थापना की, [9] जहां उन्होंने अपने जहाजों को बढ़ाया था ट्रॉय शहर, घोटाले के मैदान के पार एक पहाड़ी पर खड़ा था, जहां ट्रोजन युद्ध की लड़ाई हुई थी। प्राचीन शहर की साइट आज तट से लगभग 5 किमी दूर है, लेकिन 3,000 साल पहले घोटाले के मुंह शहर के बहुत करीब थे, [10] प्राकृतिक खाड़ी के निर्माण में एक बड़ी खाड़ी में निर्वहन किया गया था, जिसे बाद में पूरा किया गया था जलोढ़ सामग्री हाल ही में भूगर्भीय निष्कर्षों ने प्राचीन ट्रोजन तट रेखा की पहचान करने की अनुमति दी है, और परिणाम मुख्यतः ट्रॉय के होमेरिक भूगोल की सटीकता की पुष्टि करते हैं। [11]
नवंबर 2001 में, डेलावेयर विश्वविद्यालय से भूविज्ञानी जॉन सी क्राफ्ट और ट्रिनिटी कॉलेज, डबलिन के क्लासिकिस्ट जॉन वी। लुसे ने क्षेत्र के भूविज्ञान में 1 9 77 में शुरूआत की जांच के परिणामों को प्रस्तुत किया। [12] उन्होंने इलियाड और अन्य शास्त्रीय स्रोतों, विशेष रूप से स्ट्रैबो के भौगोलिक में वर्णित परिदृश्य और तटीय सुविधाओं की तुलना में वर्तमान भूविज्ञान की तुलना की, और निष्कर्ष निकाला कि स्लिमेलन ट्रॉय के स्थान और ग्रीक शिविर, भूवैज्ञानिक साक्ष्य जैसे अन्य स्थानों के बीच एक नियमित स्थिरता है , इलियड में लड़ाई के स्थलाकृति और विवरणों का विवरण। [13] [14] [15]
इलियड के अलावा, होमर, ओडिसी और अन्य प्राचीन ग्रीक साहित्य (जैसे एशिलस के ओरेस्टिया) के लिए जिम्मेदार अन्य प्रमुख काम में ट्रॉय के संदर्भ हैं। ट्रॉय के होमेरिक लीजेंड को रोमन कवि वर्जिल ने अपनी ऐनेड में विस्तार से बताया था। यूनानियों और रोमनों ने एनाटोलिया में साइट के साथ ट्रोजन युद्ध की ऐतिहासिकता और होमरिक ट्रॉय की पहचान के लिए एक तथ्य लिया। उदाहरण के लिए, अलेक्जेंडर द ग्रेट, 334 ईसा पूर्व में साइट का दौरा किया और वहां होमरिक नायकों अचिलेस और पेट्रोक्लस से जुड़े कब्रों में बलिदान किए गए।
1 99 5 को ट्रॉय सातवीं में लूवियन बिकॉनवेक्स सील का पता लगाने के बाद, होमरिक ट्रॉय में बोली जाने वाली भाषा पर एक गर्म चर्चा हुई है। ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय के फ्रैंक स्टार्क ने हाल ही में यह दर्शाया है कि ट्रॉय के ट्रॉय के राजा प्रियम का नाम, लूवियन कंपाउंड प्रिमुआआ से जुड़ा हुआ है, जिसका अर्थ है "असाधारण साहसी"। [16] "निश्चितता बढ़ रही है कि विल्सा / ट्रॉय अधिक लुवियन-बोलने वाले समुदाय के थे," हालांकि यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि क्या लुवियन मुख्य रूप से आधिकारिक भाषा थी या दैनिक बोलचाल उपयोग में। [17]
With the rise of critical history, Troy and the Trojan War were, for a long time, consigned to the realms of legend. However, the true location of ancient Troy had from classical times remained the subject of interest and speculation.
The Troad peninsula was anticipated to be the location. Early modern travellers in the 16th and 17th centuries, including Pierre Belon and Pietro Della Valle, had identified Troy with Alexandria Troas, a ruined town approximately 20 km south of the currently accepted location.[18] In the late 18th century, Jean Baptiste LeChevalier had identified a location near the village of Pınarbaşı, Ezine as the site of Troy, a mound approximately 5 km south of the currently accepted location. LeChavalier's location, published in his Voyage de la Troade, was the most commonly accepted theory for almost a century.[19]
In 1822, the Scottish journalist Charles Maclaren was the first to identify with confidence the position of the city as it is now known.[20][21]
In 1866, Frank Calvert, the brother of the United States' consular agent in the region, made extensive surveys and published in scholarly journals his identification of the hill of New Ilium (which was on farmland owned by his family) on the same site. The hill, near the city of Çanakkale, was known as Hisarlik.[22]
Schliemann
In 1868, German archaeologist Heinrich Schliemann visited Calvert and secured permission to excavate Hisarlik. In 1871–73 and 1878–79, he excavated the hill and discovered the ruins of a series of ancient cities dating from the Bronze Age to the Roman period. Schliemann declared one of these cities—at first Troy I, later Troy II—to be the city of Troy, and this identification was widely accepted at that time. Schliemann's finds at Hisarlik have become known as Priam's Treasure. They were acquired from him by the Berlin museums, but significant doubts about their authenticity persist.
The view from Hisarlık across the plain of Ilium to the Aegean Sea
Schliemann became interested in digging at the mound of Hisarlik at the persuasion of Frank Calvert. The British diplomat, considered a pioneer for the contributions he made to the archaeology of Troy, spent more than 60 years in the Troad (modern day Biga peninsula, Turkey) conducting field work.[23] As Calvert was a principal authority on field archaeology in the region, his findings supplied evidence that Homeric Troy might exist in the hill, and played a major role in directing Heinrich Schliemann to dig at the Hisarlik.[24] However, Schliemann downplayed his collaboration with Calvert when taking credit for the findings, such that Susan Heuek Allen recently described Schliemann as a "relentlessly self-promoting amateur archaeologist".[25]
Schliemann's excavations were condemned by later archaeologists as having destroyed the main layers of the real Troy. Kenneth W. Harl in the Teaching Company's Great Ancient Civilizations of Asia Minor lecture series sarcastically claims that Schliemann's excavations were carried out with such rough methods that he did to Troy what the Greeks couldn't do in their times, destroying and levelling down the entire city walls to the ground.[26] Other scholars agree that the damage caused to the site is irreparable.[27] Although his work is largely rejected, his recorded findings and artifacts added knowledge regarding ancient Western history.
Dörpfeld and BlegenEdit
After Schliemann, the site was further excavated under the direction of Wilhelm Dörpfeld (1893–94) and later Carl Blegen (1932–38). [28][29][page needed] These excavations have shown that there were at least nine cities built, one on top of the other, at this site. In his research, Blegen came to a conclusion that Troy's nine levels could be further divided into forty-six sublevels .[30]
Korfmann
In 1988, excavations were resumed by a team from the University of Tübingen and the University of Cincinnati under the direction of Professor Manfred Korfmann,
महत्वपूर्ण इतिहास के उदय के साथ, ट्रॉय और ट्रोजन युद्ध, लंबे समय से, किंवदंती के क्षेत्र में निहित थे। हालांकि, प्राचीन ट्रॉय का वास्तविक स्थान शास्त्रीय समय से ब्याज और अटकलों का विषय रहा था।
ट्राइड प्रायद्वीप को स्थान होने की उम्मीद थी 16 वें और 17 वीं शताब्दी के शुरुआती आधुनिक यात्रियों में, पियरे बेलोन और पिएत्रो डेला वैले सहित, ने ट्रॉय को अलेक्जेंड्रिया ट्रॉस के साथ, वर्तमान में स्वीकृत स्थान के लगभग 20 किमी दक्षिण में एक बर्बाद शहर को पहचान लिया था। [18] 18 वीं शताब्दी के अंत में, जीन बैप्टिस्ट लेशेवालियर ने पेनरबास्की गांव के निकट एक स्थान की पहचान की, ट्रॉय की जगह के रूप में ईज़ीन, वर्तमान में स्वीकृत स्थान के लगभग 5 किमी दक्षिण में एक तीर है। ले चावलियर का स्थान, अपने वॉयज डे ला ट्रोदे में प्रकाशित, लगभग एक सदी के लिए सबसे अधिक स्वीकार्य सिद्धांत था। [1 9]
1822 में, स्कॉटिश पत्रकार, चार्ल्स मैक्लारेन, शहर की आत्मविश्वास को पहचानने वाले पहले व्यक्ति थे, जिन्हें अब जाना जाता है। [20] [21]
1866 में, इस क्षेत्र में संयुक्त राज्य अमेरिका के 'कॉन्सलर एजेंट' के भाई फ्रैंक कालवर्ट ने व्यापक सर्वेक्षण किए और विद्वानों के पत्रिकाओं में प्रकाशित किया जिसमें उनकी पहचान नई इलियम (जो उसके परिवार के स्वामित्व वाले खेत पर थी) की एक ही साइट पर की गई थी। पर्वत, सिनाक्कल शहर के पास, हिसारलिक के रूप में जाना जाता था। [22]
Schliemann
1868 में, जर्मन पुरातत्वविद् हाइनरिक शिलिमन ने हेलारलिक को खोदने के लिए कैल्वर्ट और सुरक्षित अनुमति का दौरा किया। 1871-73 और 1878-79 में, उन्होंने पहाड़ी की खुदाई की और कांस्य युग से रोमन काल तक डेटिंग करने वाले प्राचीन शहरों की एक श्रृंखला के खंडहर की खोज की। स्लीइमैन ने इन शहरों में से एक को घोषित किया- पहले ट्रॉय मैं, बाद में ट्रॉय II- में ट्रॉय शहर का, और इस पहचान को उस समय व्यापक रूप से स्वीकार किया गया था। हिसारलिक में स्लिमेंन की खोज प्रियं के खज़ाना के रूप में जाने जाते हैं उन्हें बर्लिन संग्रहालयों द्वारा प्राप्त किया गया था, लेकिन उनकी प्रामाणिकता के बारे में महत्वपूर्ण संदेह जारी है।
ईलियम के मैदान के पार हिसारलिक से ईजियन समुद्र तक का दृश्य
फ्रैंक कालवर्ट के अनुनय में हिलेरलिक के टाइल पर खुदाई करने में स्लिमीमैन को रूचि मिली ब्रिटिश राजनयिक, ट्रॉय के पुरातत्व के लिए किए गए योगदान के लिए एक अग्रणी माना जाता है, उन्होंने क्षेत्रीय कार्य के संचालन में 60 वर्ष से अधिक (आधुनिक दिन बिगा प्रायद्वीप, तुर्की) खर्च किया। [23] जैसा कि कालवर्त इस क्षेत्र में क्षेत्र पुरातत्व पर एक प्रमुख प्राधिकरण था, उनके निष्कर्षों ने साक्ष्य प्रदान किया कि होमेरिक ट्रॉय पहाड़ी में मौजूद हो सकता है, और हेनरिक शिलिमन को हिसारलीक में खोदने के निर्देश देने में एक प्रमुख भूमिका निभाई। [24] हालांकि, स्केलिमैन ने कैल्वर्ट के साथ अपने सहयोग को निराशा दी, जब निष्कर्षों के लिए ऋण लेते हुए, जैसे कि सुसान ह्यूके एलन ने हाल ही में स्लिमेंन को "अविवेकी से आत्म-प्रचारित शौकिया पुरातत्वविद्" के रूप में वर्णित किया। [25]
बाद के पुरातत्वविदों ने वास्तविक ट्रॉय की मुख्य परतों को नष्ट करने के रूप में स्लीमेन के उत्खनन की निंदा की थी टीचिंग कंपनी की महान प्राचीन सभ्यताओं के एशिया माइनर लेक्चर श्रृंखला में केनेथ डब्लू। हार्ल का मानना ​​है कि शिलिमन की खुदाई ऐसे कठोर तरीकों से की गई थी, जो उन्होंने ट्रॉय से किया था जो यूनानियों ने अपने समय में नहीं किया, नष्ट कर दिया और पूरे समतल जमीन पर शहर की दीवार। [26] अन्य विद्वान सहमत हैं कि साइट के कारण हुई क्षति अपूरणीय है। [27] हालांकि उनका काम काफी हद तक खारिज कर दिया गया है, उनके दर्ज किए गए निष्कर्षों और कलाकृतियों ने प्राचीन पश्चिमी इतिहास के बारे में ज्ञान जोड़ा है।
डॉर्फ़फेल्ड और ब्लेजेन
Schleemann के बाद, साइट आगे विल्हेम डोर्फेफल्ड (1893-94) और बाद में कार्ल ब्लेजेन (1 932-38) की दिशा में खुदाई की गई थी। [28] [2 9] [पेज की जरूरत] इन खुदाई से पता चला है कि इस साइट पर कम से कम नौ शहर बनाए गए हैं, दूसरे के ऊपर एक है। अपने शोध में, ब्लेजेन ने निष्कर्ष पर पहुंचा कि ट्रॉय के नौ स्तरों को आगे छः-छह उप-भागों में विभाजित किया जा सकता है। [30]
Korfmann
1988 में, प्रोफेसर बी के साथ प्रोफेसर मैनफ्रेड कॉर्फमैन की दिशा में ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय और सिनसिनाटी विश्वविद्यालय से एक टीम द्वारा उत्खनन शुरू किया गया था।
korfmann
1 9 88 में, प्रोफेसर ब्रायन रोज (ग्रीक, रोमन, बीजान्टिन) ईजियन के तट पर उत्खनन के प्रोफेसर ब्रायन रोज़ के साथ, प्रोफेसर मैनफ्रेड कॉर्फमैन की दिशा में ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय और सिनसिनाटी विश्वविद्यालय से खुदाई शुरू हुई समुद्री टावर में सागर 12 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के शुरुआती दिनों की परतों में दफन होने के कारण कांस्य के तीर के किनारों और अग्नि-क्षतिग्रस्त मानव अवशेषों के रूप में लड़ाई का संभावित प्रमाण पाया गया था। कांस्य युग की दुनिया में ट्रॉय का दर्जा 2001-2002 में कॉर्फमैन और ट्यूबिन्गान इतिहासकार फ्रैंक कोल्ब के बीच कभी-कभी एसरबिक बहस का विषय रहा है।
अगस्त 1993 में, किले के नीचे के क्षेत्रों के चुंबकीय इमेजिंग सर्वेक्षण के बाद, एक गहरी खाई स्थित था और एक बाद में ग्रीक और रोमन शहर के खंडहरों के बीच खुदाई की गई थी। खाई में पाए गए अवशेष देर कांस्य युग, जो कि होमरिक ट्रॉय का कथित समय था, के लिए दिनांकित किया गया था। यह कॉर्फमैन द्वारा दावा किया गया है कि खाई ने एक बार पहले संदिग्ध होने की तुलना में बहुत बड़े शहर के बाहरी सुरक्षा को चिह्नित किया हो सकता है। उत्तरार्द्ध शहर उनकी टीम द्वारा 1250 ईसा पूर्व के लिए दिनांकित किया गया है, और यह भी सुझाव दिया गया है - प्रोफेसर मैनफ्रेड कॉर्फमैन की टीम के पास खुला हाल के पुरातात्विक सबूतों के आधार पर - यह वास्तव में ट्रेल के होममेर शहर था
हाल के घटनाक्रम
1998 में ट्रॉय की पुरातात्विक स्थल यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में जोड़ा गया था।
2006 की गर्मियों में, कोर्फ़मन के सहयोगी अर्नस्ट पर्निका की नई खुदाई परमिट के साथ खुदाई जारी रही। [31]
2013 में, विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय में पुरातत्वविद् विलियम एल्वर्ड के नेतृत्व में क्रॉस-अनुशासनिक विशेषज्ञों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने नई खुदाई शुरू की थी। यह गतिविधि कैनकक्ले ऑनसेकीज मार्ट विश्वविद्यालय के तत्वावधान में आयोजित की गई थी और "आणविक पुरातत्व" की नई तकनीक का उपयोग करना था। [32] विस्कॉन्सिन टीम छोड़ने के कुछ दिन पहले तुर्की ने विस्कॉन्सिन सहित लगभग 100 खुदाई परमिट रद्द कर दिए थे। [33]
मार्च 2014 में, यह घोषणा की गई थी कि एक निजी कंपनी द्वारा प्रायोजित एक नए खुदाई का आयोजन किया जाएगा और कैनकक्ले ऑनसेकीज मार्ट विश्वविद्यालय द्वारा किया जाएगा। यह खुदाई करने वाली पहली तुर्की टीम होगी और 12 महीने की खुदाई के रूप में योजनाबद्ध है, जो एसोसिएट प्रोफेसर रूस्तु असलन के नेतृत्व में है। विश्वविद्यालय के रेक्टर ने कहा कि "ट्रॉय में छिड़काव के टुकड़े कैनकक्ले की संस्कृति और पर्यटन में योगदान देगा। शायद यह तुर्की के सबसे महत्वपूर्ण अक्सर ऐतिहासिक स्थानों में से एक बन जाएगा।" [34]
-----------------------------------------------------------------
त्वरणे जुहो० पर० अक० सेट् ।
तुतोर्त्ति अतोरीत् । तुतोर ।
परस्मैपदी
लट्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषः
तुतोर्त्तितुतूर्त्तःतुतुरतिमध्यमपुरुषःतुतोर्षितुतूर्थःतुतूर्थउत्तमपुरुषःतुतोर्मितुतूर्वःतुतूर्मः
लिट्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषः
तुतोरतुतुरतुःतुतुरुःमध्यमपुरुषःतुतोरिथतुतुरथुःतुतुरउत्तमपुरुषःतुतोरतुतुरिवतुतुरिम
लुट्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषः
तोरितातोरितारौतोरितारःमध्यमपुरुषः
तोरितासितोरितास्थःतोरितास्थउत्तमपुरुषःतोरितास्मितोरितास्वःतोरितास्मः
लृट्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषः
तोरिष्यतितोरिष्यतःतोरिष्यन्तिमध्यमपुरुषः
तोरिष्यसितोरिष्यथःतोरिष्यथउत्तमपुरुषः
तोरिष्यामितोरिष्यावःतोरिष्यामः
लोट्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषः
तुतूर्त्तात्/तुतोर्त्तुतुतूर्त्ताम्तुतुरतुमध्यमपुरुषः
तुतूर्त्तात्/तुतूर्हितुतूर्त्तम्तुतूर्त्तउत्तमपुरुषःतुतुराणितुतुरावतुतुराम
लङ्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषः
अतुतोःअतुतूर्त्ताम्अतुतुरुःमध्यमपुरुषःअतुतोःअतुतूर्त्तम्अतुतूर्त्तउत्तमपुरुषःअतुतुरम्अतुतूर्वअतुतूर्म
विधिलिङ्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषः
तुतूर्यात्तुतूर्याताम्तुतूर्युःमध्यमपुरुषःतुतूर्याःतुतूर्यातम्तुतूर्यातउत्तमपुरुषःतुतूर्याम्तुतूर्यावतुतूर्याम
आशीर्लिङ्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषः
तूर्यात्तूर्यास्ताम्तूर्यासुःमध्यमपुरुषःतूर्याःतूर्यास्तम्तूर्यास्तउत्तमपुरुषःतूर्यासम्तूर्यास्वतूर्यास्म
लुङ्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषः
अतोरीत्अतोरिष्टाम्अतोरिषुःमध्यमपुरुषःअतोरीःअतोरिष्टम्अतोरिष्टउत्तमपुरुषःअतोरिषम्अतोरिष्वअतोरिष्म
लृङ्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषः
अतोरिष्यत्अतोरिष्यताम्अतोरिष्यन्मध्यमपुरुषः
अतोरिष्यःअतोरिष्यतम्अतोरिष्यतउत्तमपुरुषःअतोरिष्यम्अतोरिष्यावअतोरिष्याम
__________________________________________
वैदिकोऽयम् धातुः यह वैदिक धातु (क्रिया का मूल) है-
। “अपामिवेदूर्मयस्तर्तुराणाः” ऋ० ९ । ९५ । ३ । ताच्छील्ये चानश् । अभ्यासस्यातोऽत्त्वं च “सहिष्ठे तुरतस्तुरस्य” ऋ० ६ । १८ । ४ । “अर्को वा यत्तुरते” तैस० २ । २ । १२ । ४ । वेदे गणव्यत्ययः पदव्यत्ययश्च । अस्यादन्त चुरादित्वमपि । तुरयति । “तुरयन्न जिष्यः” ऋ० ४३८ । ७
तुरु +असु = तुर्वसु अर्थात् तीव्र प्राणों वाला व्यक्ति
ब्राह्मणों ने तुर्वसु को  म्लेच्छ-जातिय ही वर्णित किया
तुर--उसिक् स्वार्थे क इसुसोरिति षत्वम् । १ गन्धद्रव्यभेदे (शिलारस) अमरः ।
२ म्लेच्छजातिभेदे मेदि० ३ पारस्यभाषाभेदे च हेमच० ४ श्रीवासवृक्षे विश्वः ।

तुर्वसु देवयानी और ययाति का द्वितीय पुत्र तथा यदु का छोटा भाई था। ऐसा भारतीय पुराणों में वर्णित है ।
पिता को अपना यौवन देने से अस्वीकार करने पर ययाति ने उसे संतानहीन और म्लेच्छ राजा होने का शाप दिश था (महाभारत आदिपर्व ८४)।
परन्तु ये कथाऐं काल्पनिक उड़ाने मात्र अधिक है ।
कि तुर्वसु ने अपने पिता को यौवन देने से मना किया इस लिए पिता ययाति ने उसे म्लेच्छ (म्रेक्ष) होने का शाप दे दिया"
पौराणिक तुर्वसु, वैदिक तुर्वश का परवर्ती रूप है जिसका ऋग्वेद में यदु (मण्डल१ सूक्त १७४), सुदास (७/१८), इन्द्र, दिवोदास (१/३६) और वृची वृतों के साथ अनेक बार उल्लेख हुआ है। उन सन्दर्भों के आधार पर इसे किसी परवर्ती आर्यकुल और उसके योद्धा नामक दोनों के रूप में स्वीकार किया जाता है।
यद्यपि ईरानी भाषा में आर्य नस्लीय विशेषण न होकर वीरों का पर्याय वाची रूप है ।
परवर्ती वैदिक साहित्य में तुर्वशु पाञ्चालों के सहायक रूप में वर्णित हुए हैं (शतपथ ब्राह्मण १३-५)।
अनेक प्रसंगों के आधार पर इस आर्य जाति का उत्तर-पशिचम से कुरु पांचाल तथा भरत के लोगों की राज्यसीमा तक आना सिद्ध होता है।
वैदिक तथा पौराणिक उल्लेखों में आर्य जाति तथा आर्यकुल के पूर्वज योद्धा के रूप में तुर्वसु की स्थिति विवादास्पद है।
क्योंकि कालान्तरण में आर्य शब्द जन-जाति गत होने लगा था ।
" ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त की १० वीं ऋचा में देखें---
" उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी।
गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।।
अर्थात् यदु और तुर्वसु नामक दौनो दासों की हम सराहना करते हैं ।
जो बड़े सौभाग्य शाली हैं ।
जो गायों से घिरे हुए हैं ।
अग्निपुराण के अनुसार द्रुुहयु वंश, तुर्वसु वंश की शाखा थी जो आगे चलकर पौरव कुल में मिल गई।
सम्भवत यहूदीयों के सहवर्ती द्रुज़ों को ही पुराण कारों ने द्रुह्यु के रूप में वर्णित किया है ।
वस्तुत ये द्रविड ही थे ।
कहा जाता है कि पांड्य तथा चोल आदि राजवंश की स्थापना तुर्वशों ने की थी।
और यह सिद्ध ही है कि  चोल अथवा कोल अथवा इनकी शाखा पणि द्रविडों से सम्बद्ध है ।जिन्हें कैल्ट तथा गॉल संस्कृतियों में ड्रयूड( Druids) कहा गया है ।
तुर्वसु का वास्तविक उल्लेख ट्रॉय तथा तुर्किस्तान संस्कृतियों में हुआ है । जेसा कि ऊपर वर्णित है ।

 Overall evidence of the explanatory description presented is  procted by Yadav Yogesh Kumar 

Therefore, do not send any monsieur facts away from deformed strings.

Our consultation is necessary

                            with the best wishes

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

पारसी वर्ण-व्यवस्था की प्रणाली

As in the Vedic society, the priestly class were considered to be superior in the society as is evident from the following verse
"The dignity of the head in the human body is (allotted) to the profession of Athornan;
of the hand, to the profession Arthestar; of the belly,
to the profession of Vastariush;
and of feet, to the profession of Hutokhsh:

ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ९०वें सूक्त का १२वीं ऋचा
" ब्राह्मणोsस्य मुखमासीत् बाहू राजन्यकृत:।
उरू तदस्ययद् वैश्य: पद्भ्याम् शूद्रोsजायत ।।
thus, it is symbolically shown, that in rank and dignity, the profession of Athornan is as the head of the world;
the profession of Arthestar is as the hands of the world;
the profession of Vastariush is as the belly of the world;
and, the profession of Hutokhsh is as the feet of the world. ( Denkard Bk.3-Chp.42)
-------------------------------------------------------------------
जैसा कि वैदिक समाज में, पुजारी वर्ग को समाज में श्रेष्ठ माना जाता था,
जैसा कि निम्नलिखित कविता से स्पष्ट है
"मानव शरीर में सिर की गरिमा आथर्नन के पेशे (आबण्टित) हाथ से,
पेशे आर्टिस्टर, पेट के, वस्तरीयुज के पेशे के लिए और पैरों से हुताखेश के पेशे के लिए है: इस प्रकार , यह प्रतीकात्मक रूप से दिखाया गया है, कि रैंक और गरिमा में, अथोर्नन का व्यवसाय दुनिया का प्रमुख है, आर्टिस्टर का पेशा विश्व के हाथों जैसा है, वस्तरीयुष का व्यवसाय दुनिया के पेट के रूप में है; और, हूटोखशा का व्यवसाय दुनिया के पैरों के समान है।
(डेनकार्ड बीके -3-सीपी.42)
Athravan (priest); Ratheshtar (warrior); Vastryosh (husbandman); Hutokhsh (artisan). Manu's father was .... There is a deep mystical meaning in this name. One of the meanings .
अत्त्र (पुजारी); राथेशर (योद्धा); वस्तरीश (पेंशन); हूटोकश (कारीगर) मनु का पिता था .... इस नाम पर एक गहरी रहस्यमय अर्थ है।
अर्थों में से एक
__________________________________________

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

पश्तो भाषा के शब्द ----

आपसफ़ाई पख्तुन पीएफ योगदानकर्ता   डाक: 1,885 धन्यवाद: 1,195 628 डाक में 1,048 टाइम्स धन्यवाद उल्लेख: 31 पोस्ट (एस) टैग की गईं: 0 धागा सम्मिलित तिथि: अप्रैल 2010 स्थान: پښتونخوا  पश्तो में पशु नाम - 10-14-2010, 03:45 पूर्वाह्न चलो पश्तो में जानवरों के नाम लिखते हैं ..... यहां वर्णमाला क्रम में कुछ हैं ... एंट = मेगी (मे) बैट = खापरॉक (ښاپېرک) भालू = मेलो / बालू (مېلو) तितली = प्रतिपरके / बेबोज़े (پرپرکے يا ببوزے) ऊंट = ओख़ (اوښ) कैट = पेशो (پيشو) चिकन = चार्जोटे (چرګوټے) क्रो = कैरगा '(کارغۀ) हिरण = होसै (هوسۍ) डॉग = स्पि (सेपे) गधा = खार (खुर) कबूतर = करकुरह (کرکوړۍ) बतख = स्नान (بطه) ईगल = बाज़ (باز) फॉक्स = लूमरहा (لومبړه) मेंढक = चेन्दख (چيندخ) बकरी = चेले (چېلۍ يا بيزه) हॉर्स = एन्स (एसएस) जैकेल = गेदरहढ़ (ګيدړ) शेर = ज़मेरी (ज़मीन) बंदर = शैडो / बीज़ो (شادو يا بيزو) खरगोश = सोया (سويه) चूहा = मंगक / मागा (منږک يا مږه) भेड़ = गद्दा (ګډه) सांप = मार (مار) स्पाइडर = जोला / जोलागे (जौला يا جولاګے) टाइगर = प्राग (پړانګ) वुल्फ = शर्मक (शर्मम) ना सेज शॉ ना साज़ शो, बस हसी जवां तमं शॉ निम्नलिखित यूज़रफैजई पख्तुन को ये उपयोगी पोस्ट के लिए धन्यवाद: गुलालै (10-23-2010), लैला (10-15-2010) (# 2) Feroza_Banu अतिथि   डाक: एन / ए उल्लेख किया गया: पोस्ट टैग की गईं: थ्रेड (ओं)  10-14-2010, 04:22 पूर्वाह्न सलाम ... डेरा मनाने ... कुछ चीजें डॉग = स्पै और बहुवचन स्पीच एंट = मैगी बहुवचन = मैगी स्पाइडर असली पे पश्तो के = Ghanna غڼه भेड़ वैकल्पिक = पीएस हॉफ = एएएस के साथ अलिफ मिट्टी آس चिकन = घिरगा रोस्टर = Chrig बतख वैकल्पिक = हेलै चूहा: मुग़क या मुगल या मुज़क मूक बकरी = वज़ (पुरुष) और (वूज़ा) महिला और वज़ग्ररे (बच्चा बकरी) तितली = पतंग!

अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, पश्टु, पश्तो और पख्तू में 210 शब्दों की संपूर्ण सूची।

हिंदी और उर्दू एक ही बोली जाने वाली भाषा है, लेकिन धार्मिक और राजनीतिक कारणों के लिए पूरी तरह से अलग-अलग वर्णों में लिखा है। पश्तो, पश्तो, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पठान जनजातियों द्वारा बोली जाने वाली एक एकीकृत भाषा की बजाय, वास्तव में पख्तू भाषा की एक परिवार है।
यह शब्द सूची सही नहीं हो सकती है, लेकिन मैं चाहता हूं कि यह मेरे साथ था जब मैंने पहली बार दुनिया के उस क्षेत्र में यात्रा करना शुरू किया था। - इस्माइल स्लोअन

अंग्रेजी हिन्दी-उर्दू Pashtu-पश्तो-Pukhtu

शरीर जिस्म बदन

सिर खोज एवं बचाव खोज एवं बचाव

बाल बाल wextu

चेहरा चेहरा अधिकतम

आँख एक अखार्स्टा

कान एक काँ घाग

नाक nak Poza

मुंह muh zolu

दांत

जीभ Zaban जिबा

स्तन chati सिना

पेट पालतू Xeta

हाथ / हाथ Bazu लास

कोहनी kohni संगल

हथेली hatheli कहानी

fingel उंगली gota

fingelnail naxun nukh

पैर तन xpaq

त्वचा jidl Sarman

हड्डी हादी Aduke

दिल दिल zaru

रक्त क्सुन wina

मूत्र पेशाब टीज़ मुटुआज़

विष्ठा पाक्साना डेक म्यूटियाज़

गांव गऊ गोभी

घर घर ने कोर

छत चैट chath

दरवाजा दरवाजा युद्ध

ज्वाला जलाएं वाली लक्ष्मी दा सजाज घाटी

झाड़ू jharu जारु

मोर्टार मसाला पिस्न गोल चिज लंगेरेई

मूसल हाथी chetu

हथौड़ा hathera satak

चाकू chaqu चाकू-

कुल्हाड़ी kulhara Tabar

रस्सी रासी पारे

धागा Dhaga टार

सुई सुई स्टेन

कपड़ा kapra kapra

अंगूठी anguthi gota

सूरज सूरज Nwar

चाँद चाँद spogmai

आकाश Asman Asman

स्टार एक तारा स्टोर

बारिश Baris बरन

पानी पानी Ubu

नदी दरया सिंध

बादल बादल waryaz

प्रकाश bijili prakigi

इंद्रधनुष क्यूसरा क्ज़ः दा बुडाई ताल

हवा हवा हवा

पत्थर पत्थर केन

पथ रास्ता lar

रेत सेवानिवृत्त shaga

आग एजी हमारे

Dhua लुग धूम्रपान

राख राख इरा

कीचड़ kichar Xata

धूल MITI Gard

सोना सोना सर जार

पेड़ daraxt wana

पत्ती पाटा pana

जड़ डार्सेट का एक झार जारारे

कांटा काटा azghe

फूल phul ग्वाल

फल फल मेवा

आम बजे बजे

केला केला केला

गेहूं Gehu Ghanam

जौ बाजरा warbashi

चावल चावल wrije

आलू ALU ALU

बैंगन बैनान टो बटरार

मूंगफली का फल फली मुंपली

मिर्च मिर्च marchake

हल्दी हल्दी kurkaman

लहसुन lehsan UGA

प्याज piaz piaz

फूलगोभी फुल गोबी गोबी

टमाटर तमतार सुर बटरार

गोभी बैंड गोबी प्रतिबंध गोबी

तेल टेलीफोन टेलीफोन

नमक नमक Malga

मांस गोश्त ghwaxa

वसा cherbi wazda

मछली Machli कब

चिकन murghi charga

अंडे एक और एचयू

गाय gae ghwa

भैंस bhes Mexa

दूध Dudh पे

सींग्स ​​एक गाना xkar

पूंछ डम झील

बकरी बाकरी Biza

कुत्ते Kuta spe

साँप saap मार्च

बंदर बन्दर Bizo

मच्छर मचर mashe

चींटी chiuti Mege

मकड़ी makri जोला

नाम nam संख्या

आदमी आदमी sare

औरत Urat xaza

बच्चे bacha mashum

पिता BAP plar

मां मा मोर

बड़े भाई बारा भाई माशर रोअर

छोटे भाई छोटा भाई कासार रोअर

बड़ी बहन बरी बहन मश्रा एक्सोर

छोटी बहन छोटी बहन काशरा एक्सर

बेटा बीटा zwe

बेटी बेटी lur

पति shohar xawand

पत्नी bivi xaza

लड़का Larka halak

महिला Larki jine

दिन दिन wraz

रात चूहे shpa

सुबह सुबह सहर

दोपहर dopaher gharma

शाम दिखावा Maxam

कल कल parun

आज ए जे नेन

कल अनन्त काल साबा

सप्ताह एक हफ्ता हफ़्टा

महीने mihana miasht

साल साल kal

वर्ष पुराण जोर

नई Nea nawe

अच्छा Acha जू

बुरा xarab xarab

गीला bhiga लंड

सूखी xushk wach

लंबे लांबा ugud

लघु छोटा लंड

गर्म गरम तोड़

ठंड Thanda yax

सही डे XE

बाईं bae गैस

पास qarib nizde

अब तक dur lare

बड़ा बारा घाट

छोटे छोटा warkote

भारी भरी drund

प्रकाश Halka Spak

ऊपर upar uchat

आला lande नीचे

सफेद sufed स्पिन

काला काला टो

लाल लाल सुर

एक ek याओ

दो dwa करना

तीन टिन ड्रे

चार चार Salor

पाँच pach pinza

छह चे shpag

सात उवे बैठ गया

आठ एथलीट atu

नौ Nao नाहा

दस दास लास

ग्यारह gyara yaolas

बारह बारा dolas

बीस बिस शाल

एक सौ एक इतनी सल

जो कुन सोक

क्या क्या सु

जहां Kidhar Charta

जब कब काला

कितने किटने शमरा

जो kensa kam

इस तु दा

कि आगा wo

इन तु दा

उन आगा wo

वही एक ही याओ शान

विभिन्न muxt

Indo - Sumerian Vocabulary Part. 2 भारत - सुमेरियन शब्दावली (भाग दो )

Sumerian.
sur 'to press, squeeze; to drip; to rain; to milk', PIE *su-(l/r)- 'to press out, distill, milk', Skt (संस्कृत )su- 'to press out, distill', soma 'juice of a sacred plant',
sūra 'the Soma juice flowing from the press', sūri 'presser of Soma', surā 'spirituous liquor', Avestan hurā 'id.', Latvian sula 'juice',
Greek hyein 'to rain',
hylizein 'to filter, strain'. Sum. šar 'totality', PIE *sala-/sal-va- 'whole', Skt.( संस्कृत) sarva 'all, every', Greek holos 'whole', Latin salvus 'safe, sound', salus 'health, safety', Avestan haurva, Old Persian haruva 'whole; sound', Middle Persian har 'every'. Sum. šed ‘to lie down; to sit, be recumbent (of animals)’,
PIE *sad/sid ‘to sit down’. Sum. šeĝ 'to cook; to dry a field; to fire (pottery)', sig 'to burn (of digestion)', PIE *sa(n)k- 'to singe, burn, dry', Old English sengan 'to singe', Icelandic sangr 'burnt, scorched', sengja 'singed taste', Sindhi sekaṇu ʻto toast, warm (anything)ʼ, seku m. ʻtoastingʼ, seko m. ʻdrying up of a crop from wind or droughtʼ, Marathi śekṇẽ, śẽkṇẽ ʻto warm oneself before a fire, foment, burnʼ; PIE sik- 'dry', Latin siccus, Avestan hiku- 'dry'. The velar nasal in Sumerian corresponds here to a nasal infix+velar in Germanic. Sum. šer 'reddening, (to be) bright', PIE *sar- 'red', Lith. sartas 'reddish (of horses)', sárkanas “bright, clear, light; pink”, serbentà 'redcurrant', sirpti 'to ripen (of fruits)', Latvian sarts 'ret (in face)', sarks 'red, pink', sarkt 'to become red, to redden', Latin sorbum 'sorb (reddish fruit)'. Sum. šerti 'strip of cloth', PIE *(s)k'ar- 'to cut', Old English scyrte 'skirt, tunic', English shirt, shred (long narrow strip cut off), Middle High German scherze 'piece cut off', German Schere 'scissors', Lith. skirti, Latv. šk'irt 'to divide', Skt. kṛt- 'to cut', śāṭa/śāṭī 'strip of cloth, particular garment (sari)'
(possibly from *k'art- with retroflexion following the fall of r). The initial š- in Sumerian can be the result of an original sk- or sk'- as in Germanic languages. Sum. šita(n) 'water channel', Skt. sītā 'furrow; name of a river', from the root sī- 'to draw a line' found also in sīman 'line parting the hair; limit, boundary', sīra 'plough' and sīrā 'stream'. Possibly also Greek oiròn/hoiròn (from *sairan) 'furrow, border line' is connected. Sum. šun 'to shine', PIE *sun/swan- 'sun', Old Norse, OHG sunna 'sun', Avestan xᵛə̄ṇg 'sun (genitive)', Welsh huan 'sun'. Sum. tab 'burn', PIE *tap- 'to be warm, hot', Skt. tap- 'to burn, be hot, make hot', tapas 'heat', Hitt. tapassa- 'fever', Persian taftan 'to heat, burn, shine', Khot. ttav- 'to be hot'. Sum. tag ‘to touch, take hold of’, PIE *tag- ‘to touch’, Old Latin tago 'I touch', Lat. tangere 'to touch', tactus 'touched', Greek te-tag-on 'having seized'. Sum. tak.alan 'craftsman' (composed with alan 'statue, form'), PIE *tak's- 'to form by cutting', Skt. takṣ- 'to fashion, chisel', takṣan- 'wood-cutter, carpenter', Greek tekton 'carpenter', techne 'art, craft, skill', Avestan tašaiti 'to make (as a carpenter)', Hitt. ták-ki-(e-)eš-zi 'to join, build', Lithuanian tašaũ, tašýti, OCS tešǫ, tesati 'to hew', Russian Church Slavic tesla 'adze, carpenter's tool', Latin texere 'to weave, plait', tela 'web, loom, fabric', OHG dehsa 'axe', Old Icelandic þexla 'adze'. Sum. tal '(to be) broad, expand', PIE *tal- 'surface', Skt. tala 'surface, base, palm (of the hand), sole (of the foot)', taliman 'soil', Irish talam 'earth', Old Prussian talus 'floor (of a house)', Old Norse þel 'floor, board', Lat. tellus 'earth', Greek telia 'board'; PIE *stal- 'to dilate, broaden, stretch out; broad', Old Lat. *stlatus, Lat. latus 'broad', dilatare 'to dilate, spread wide', Common Slavic steljo 'I spread'. Sum. tar 'to cut down; to untie, loosen; to scatter, disperse', PIE *stṛ/star- 'to strew, scatter', Skt. stṛ- 'to spread, strew, scatter; to lay low, overthrow', Middle Persian wistardan 'to spread out', Lat. sternere 'to spread out, scatter; to lay low', Greek stornumi 'I spread out', Old English strewian 'to scatter', Old Norse stra 'straw', which is scattered. Sum. temen, Akk. temmenu, temennu 'foundation (deposit)', PIE *dhā-man/dha-mn̥- 'what is placed or set', Skt. dhāman- 'dwelling-place, abode; law', Greek thema 'what is placed or laid down: deposit; position of land; grammatical stem'; themethla, theme(i)lia 'foundations', themelios 'foundation-stone'. In Greek we have also temenos 'a piece of land cut off and assigned as an official domain', especially to kings and to temples of gods. According to the analysis of Dunham (1986), Sum. temen often refers to a marked off area, and also the boundaries and the corners of the area, and Whittaker remarks that temen is the reading of the 'perimeter sign', so something very similar to the temenos. Manessy-Guitton already in 1966 proposed that temenos comes from temen, but temenos seems to have a very clear etymology from the Greek tem-no 'to cut', which is made stronger by the comparison with Latin templum, originally indicating a delimited space in the sky for auspices, but also a space consecrated to the gods (the temple) and a transverse beam. So, if temen and temenos have a relation, we should admit that temen comes from the same root tem- as temenos and templum. The temen sign is done with two crosses and a rope, like this: x—x. Rather than a perimeter, it is one side of it, and, as Dunham remarks, it is like a string between two pegs, and he also suggests that temen indicates the foundation peg (or set of pegs). If he is right, the root of temen is more likely 'to put, place' (the pegs) than 'to cut' (the area of the foundations). Sum. ten 'to be extinguished; become cool', PIE *dhwan/dhwin- 'to be extinguished', Skt. dhvan- 'to become extinguished', Middle English dwinen 'waste away, fade, vanish', Greek than-, thnesko 'to die'. Sum. til '(to be) complete(d); to end', PIE *kwal- 'completion of a circle', Greek telos 'completion, accomplishment, end'. This semantic correspondence with Greek compels us to accept an analogous evolution of the IE *kwi>ti, probably from a palatal intermediate form, or a loanword directly from a language similar to Greek. This comparison allows us to propose also the following: Sum. til 'to live; to dwell', PIE *kwal/kwil- 'to move, frequent, inhabit', Lat. colo 'I cultivate, inhabit, honor', in-quil-inus 'inhabitant'. Sum. tud 'to hit, beat', PIE *(s)tud- 'to hit', Skt. tud- 'to push, strike', Latin tundere 'to beat, pound, strike', Gothic stautan 'to strike'. Sum. tug 'textile, garment', PIE *(s)tag- 'to cover', Latin toga, tegimen/tegumen/tegmen 'cover; dress', OCS o-stegъ 'garment', Old Irish etach 'garment'. Sum. tum(u) 'wind', PIE *dham/dhum- 'to blow', Skt. dham- 'to blow', Parachi dhamā́n, Nuristani Ashkunu domṍ 'wind', Lith. dumiù 'to blow'. Sum. ubur 'breast', PIE *ūdhar-, Latin ūber 'udder, breast', Danish yver, Skt. ūdhar- 'udder'. Sum. ugnim, ummana 'army', here Whittaker proposes for ugnim a metathesis from PIE *h2ĝmen- 'train, war band on the march', Lat. agmen, and remarks that Lafont in an article has compared semantically the Sumerian and the Latin terms. The form ummana, found also in Akkadian as umman(u), can be a variant (assimilation of *ug-man-), closer to the IE term. In Vedic we have ajman- 'career, passage, battle', and the root must be aj- 'to drive, move forward' (PIE *ag'-). Sum. ugur, according to Whittaker a divine weapon described sometimes as a mace, sometimes as a sword, PIE *wag’-ra-, Skt. vajra, which has been connected with the root uj- 'be strong', found also in ugra- 'powerful, violent, mighty, cruel, angry'. In Sum. we have also ug '(to be) furious; anger'. In Avestan vazra- is the weapon of Mitra, and in Middle Persian wazr, warz (Modern Persian gurz) is a 'club'. Sum. ulin ‘colored wool’, Akk. h̬ullānu 'cover; woollen', PIE *wal/wul- ‘wool’, Hitt. h̬ulana-, huliya-, Got. wulla, Skt. ūrṇā 'wool'. Sum. umbin 'nail, claw, finger, toe', PIE *n̥gwi-, Lat. unguis 'nail, claw'. Connected is Old Irish ingen, Greek onyx, Arm. eġung 'nail'. Sum. ur 'to shut; protection', PIE *war/wṛ- 'to shut, close, cover; guard, warn, save', Skt. vṛ- 'to cover, screen, veil, conceal, hide, surround, obstruct; to close ( a door ); to ward off', ūr-ṇu- 'to cover, invest, hide, surround', Ossetic wart 'shield, protection', Old English werian 'to defend, protect'. Sum. uru 'to sow, cultivate, plow', Latin urvare 'to plow round, mark out with a plough', urvum 'the plough-tail', verv-agere 'to plow land', Skt. urvarā 'fertile soil , field yielding crop'. Sum. urud ‘copper’, PIE *(H)rudh- ‘red’, Skt. rudhira-, Gr. erythros, Old English rudu, Welsh rhudd ‘red’.
__________________________________________
          अनुवादित रूप ( भाग एक )
योग। सुर 'प्रेस करने के लिए, निचोड़; टपकाने के लिए; बारिश होना; दूध करने के लिए, पीआईई * सु- (एल / आर) - 'प्रेस, डिस्टिल्ड, दूध', स्क्टी। सु-'प्रेस, डिस्टिबल', 'सोमा' का रस, पवित्र पौधे 'सूरा', 'सोमा', सूरा 'आत्मीक शराब', 'अवेस्तन हुरा' आईडी से बहने वाली सोमा रस, प्रेस से बहती है। लातवियाई सूला 'रस', यूनानी hyein 'to rain', hylizein 'फ़िल्टर करने के लिए, तनाव'। योग। एस 'संपूर्णता', पीआईई * सला-/ सल-वीए- 'पूरे', स्कt। सर्व 'हर', ग्रीक होलोस 'पूरे', लैटिन salvus 'सुरक्षित, ध्वनि', 'स्वास्थ्य, सुरक्षा', अवेस्तन हौरव, पुरानी फारसी हरुवा 'पूरे; ध्वनि ', मध्य पर्शियन हर' हर ' योग। झूठ बोलने के लिए; बैठने के लिए, लेटा हुआ (जानवरों का) ', पीआईई * उदास / एसआईडी' नीचे बैठो '। योग। še to 'खाना बनाना; एक क्षेत्र सूखने के लिए; पीईई * सा (एन) के- 'गायन, जला, सूखी', पुरानी अंग्रेजी भाषा 'गायन', आइसलैंडिक संद्र 'जला, झुलसे', 'आग (पॉटरी)' करने के लिए सिग 'को जलाने के लिए' सेन्ज 'गायन स्वाद', सिंधी सेकातु 'टोस्ट, गर्म (कुछ)', सेकू एम 'टास्टिंग', सेको मी वायु या सूखा से एक फसल को तैयार करना, मराठी शखे, śẽkṇẽ आग से पहले खुद को गर्म करने के लिए, उभड़ना, जला; पीआईई सिक- 'सूखी', लैटिन सिस्कस, अवेस्तान हाकु- 'सूखी' सुमेरियन में वेलर नाक जर्मन भाषा में नाक infix + velar के साथ मेल खाती है योग। सवेर 'रेडिंग, (होना) उज्ज्वल', पीआईई * सर - 'लाल', लिथ सरट्स 'लाल (घोड़ों की)', सारकण "उज्ज्वल, स्पष्ट, प्रकाश; गुलाबी ", सर्बेंटिया 'रेडकुरंट', सरप्टी 'फुल टू फ्रॉम फ्रैंक्स', लातवियाई सरट्स 'रिट (फेस फॉर)', सर्कस 'लाल, गुलाबी', सर्क्ट 'लाल बनने के लिए, रेडडेन', लैटिन शर्बाम 'सॉर्ब लाल फल) ' योग। 'स्टार्ट ऑफ क्लॉथ', पीआईई * (एस) के'र- टू कट टू ', पुरानी अंग्रेज़ी स्कार्ट' स्कर्ट, ट्यूनिक ', अंग्रेजी शर्ट, टुकड़ा (लंबी संकीर्ण पट्टी कटौती), मध्य हाई जर्मन शंख' का टुकड़ा काटा गया ', जर्मन क्षेत्र' कैंची ', लिथ स्कर्ती, लातव šk'irt 'को विभाजित करने', Skt काट- 'कट करने के लिए', शता / शहरी कपड़े की पट्टी, विशेष रूप से परिधान (साड़ी) '(संभवतः * के'र्ट से - आर के पतन के बाद रेट्रोफ्लोज़िशन के साथ)। प्रारंभिक- सुमेरियन में एक मूल स्की- या स्की के परिणाम हो सकते हैं- जैसे कि जर्मनिक भाषाओं में। योग। स्सिता (एन) 'वाटर चैनल', स्कt सिता 'झाड़ू; एक नदी का नाम ', जड़ से-' एक रेखा खींचने के लिए 'सेयमन में भी बाल मिलाकर रेखा मिलती है; सीमा, सीमा ', सिरा' हल 'और सीरा' धारा '। संभवत: ग्रीक ओरोन / होरॉन्स (* सियारन से) 'फ़्यरो, सीमारेखा लाइन' जुड़ा हुआ है। योग। 'चमक' करने के लिए, पीआईई * सूरज / हंस- 'सूर्य', पुराना नॉर्स, ओएचजी सुन्ना 'सूर्य', अवेस्टेन एक्सट्यूशन 'सूरज (यौनिक)', वेल्श हुआन 'सूर्य'। योग। टैब 'बर्न', पीआईई * टैप- 'गर्म होना, गर्म', स्कt टैप करें- 'जला, गर्म रहें, गरम करें', तपस 'गर्मी', हिट तपसा- 'बुखार', फारसी तात्रण 'गर्मी, जला, चमक', खोत। टीटीव- 'गर्म होना' योग। टैग 'स्पर्श करने के लिए, पकड़ लेना', पीआईई * टैग- 'स्पर्श करने के लिए', पुरानी लैटिन टैगो 'आई टच', लाट स्पर्शरेखा 'स्पर्श', स्पर्श 'छुआ', ग्रीक टी-टैग-ऑन 'जब्त किया' योग। tak.alan 'शिल्पकार' (एलन 'मूर्ति, फार्म' के साथ), पीआईई * tak's- 'काटने के लिए फार्म', Skt takṣ- 'फैशन, छेनी', takanan- 'लकड़ी के कटर, बढ़ई', ग्रीक tekton 'बढ़ई', तकनीक 'कला, शिल्प, कौशल', अवेस्तन तसती 'बनाने के लिए (एक बढ़ई के रूप में)', हिट। ताक-की- (ई-) ईश-जी 'शामिल होने के लिए, निर्माण', लिथुआनियन टास्का, टास्तिटी, ओसीएस टेक्सास, टीसती 'हेवे', रूसी चर्च स्लाव टेस्ला 'एडेज़, बढ़ई के उपकरण', लैटिन टेक्क्सर ' ', तिल' वेब, करघा, कपड़े ', ओएचजी डेहासा' कुल्हाड़ी ', ओल्ड आइडलैंडिक þexla' एडेज़ '। योग। ताल '(होना) व्यापक, विस्तार', पीआईई * टैल- 'सतह', एसटीटी ताला की सतह, आधार, हाथ (हाथ का), एकमात्र (पैर का), तालीमान 'मिट्टी', आयरिश तालाम 'पृथ्वी', पुरानी प्रशियाई तलवों की मंजिल (एक घर की) ', पुराना नोर्स फ्लोर, बोर्ड ', लाट टेलस 'पृथ्वी', यूनानी टेलीआ 'बोर्ड'; पीआईई * स्टाल- 'फैलाना, विस्तार, फैलाना; व्यापक ', पुरानी लात * स्टैटस, लाट लेटस 'विस्तृत', dilatare 'फैलाने के लिए, व्यापक फैल', सामान्य स्लाव शब्द 'मैं फैला' योग। कटौती करने के लिए टार '; खोलना, ढीला करना; स्कैटर करने के लिए, फैलाने ', पीआईई * स्टॉ / स्टार-' स्टु, स्कैटर ', स्कt स्टु- 'फैलाने के लिए, स्टू, स्कैटर; कम करना, उखाड़ना ', मध्य फ़ारसी विस्टर्डन' फैलाने के लिए ', लाट स्टर्नियर 'फैलाने के लिए, स्कैटर; पुरानी नर्स स्ट्रा 'स्ट्रॉ', जो बिखरे हुए हैं, 'ग्रीक कछुआ' मैं फैला हुआ हूं ', पुरानी अंग्रेजी स्ट्रेवियन' स्कैटर 'के लिए। योग। टेम्पैन, एके temmenu, temennu 'नींव (जमा)', पीआईई * ध-आदमी / ढा- mn̥- 'क्या रखा है या सेट', Skt धरम- 'निवास स्थान, निवास; कानून ', ग्रीक विषय' क्या रखा गया है या नीचे रखा गया है: जमा; भूमि की स्थिति; व्याकरणिक स्टेम '; थीथला, थीम (i) लिया 'फाउंडेशन', थीसियोलिस 'नींव-पत्थर' यूनानी में हमारे पास भी एक बारिश है 'भूमि का एक टुकड़ा काट दिया जाता है और एक आधिकारिक डोमेन के रूप में असाइन किया जाता है', खासकर राजाओं और देवताओं के मंदिरों के लिए। डनहम (1 9 86) के विश्लेषण के अनुसार, योग temen अक्सर एक चिह्नित बंद क्षेत्र, और सीमाओं और क्षेत्र के कोनों को संदर्भित करता है, और Whittaker टिप्पणी है कि temen 'परिधि साइन' का पठन है, तो temenos के समान कुछ। पहले से ही 1 9 66 में मैनेसे-गिटोंटन ने प्रस्ताव किया था कि टेमिनोस टेंमें से आता है, लेकिन टेमेंओस में यूनानी टेम-नो 'टू कट' से एक बहुत स्पष्ट व्युत्पत्ति है, जो लैटिन टेम्पलम के साथ तुलना करके मजबूत बना है, मूल रूप से एक सीमांकित स्थान को दर्शाती है देवताओं (मंदिर) और एक अनुप्रस्थ किरण के लिए पवित्रा स्थान पर एक स्थान भी है। इसलिए, यदि टेम्पन और टेम्पनोस का कोई संबंध है, तो हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि टेम्पन एक ही जड़ की तरफ से आता है- जैसे टेम्पनोस और टेम्पलम। टेम्पन साइन दो क्रॉस और रस्सी के साथ किया जाता है, जैसे: x-x परिधि के बजाय, यह एक तरफ है, और, Dunham टिप्पणी के रूप में, यह दो खूंटे के बीच एक तार की तरह है, और वह यह भी सुझाव देता है कि temen नींव खूंटी (या खूंटी का सेट) इंगित करता है। अगर वह सही है, तो 'को कट' (नींव के क्षेत्र) की तुलना में, टिमन की जड़ अधिक होने की संभावना अधिक है, 'जगह, जगह' (खूंटे)। योग। दस 'बुझ जाए; शांत हो जाओ, पीआईई * ध्वान / ध्विन- 'बुझाए जाने', स्कt घन- 'बुझ गया', मिडिल इंग्लिश डवीनन 'अपव्यय दूर, फीका, गायब हो गया', ग्रीक से, थेंस्को 'मरने के लिए'। योग। तिल '(होना) पूरा (डी); समाप्त करने के लिए, पीआईई * क्वाल- 'एक सर्कल के पूरा होने', ग्रीक टेलोस 'समापन, सिद्धि, एंड'। ग्रीक के साथ यह शब्दावली पत्राचार हमें आईएल के समान विकास को स्वीकार करने के लिए मजबूर करता है, शायद एक तामल के मध्यवर्ती रूप से, या ग्रीक के समान भाषा से सीधे ऋणकारी। यह तुलना हमें निम्नलिखित का प्रस्ताव भी देता है: योग। टिल 'रहने के लिए; रहने के लिए ', पीआईई * क्वाल / क्विल-' ले जाने के लिए, अक्सर, निवास ', लाट कॉलो 'मैं खेती करता हूं, निवास करता हूं, सम्मान', 'क्विल्ट इनस' निवासी '' योग। ट्यूड 'टू हिट, बीट', पीआईई * (एस) टुड- 'हिट', स्कt टुड- 'धक्का, हड़ताल', लैटिन टुंडर 'हरा करने के लिए, पाउंड, स्ट्राइक', गॉथिक स्टॉतन 'हड़ताल'। योग। टग 'वस्त्र, परिधान', पीआईई * (एस) टैग- 'कवर करने के लिए', लैटिन टोगा, टेगिमैन / टेगुमेन / टेगमेन 'कवर; पोशाक ', ओसीएस ओ-स्टीग' वस्त्र ', पुरानी आयरिश एट' वस्त्र '। योग। तुम (यू) 'वायु', पीआईई * धाम / धूम- 'फ्लावर', स्क्टी। धमा- 'उड़ाने के लिए', परछी धमान, नूरिस्तानी अशोकुनु डोम 'पवन', लिथ। ड्यूमियू 'झटका' योग। उबूर 'स्तन', पीआईई * खोज-, लैटिन 'उदर, स्तन', 'डेनिश', स्कैट उधर- 'उकड़ना' योग। उजीम, उम्माना 'सेना', यहां व्हिटाटेर ने पीआईई * h2 -men- 'रेलगाड़ी, मार्च पर युद्ध बैंड', लाट से ओग्निम के एक मेटाटिसिस के लिए प्रस्ताव दिया था। agmen, और टिप्पणी है कि एक लेख में Lafont semantically सुमेरियन और लैटिन शब्दों की तुलना की है फार्म ummana, अक्कड़ियन में भी उममान (यू) के रूप में पाया जाता है, यह IE के करीब एक संस्करण (आभासी-आदम का एकीकरण) हो सकता है। वैदिक में हमारे पास एजमन- 'करियर, बीतने, युद्ध' है, और जरूरी होना चाहिए- 'ड्राइव करने, आगे बढ़ने' (पीआईई * एजी-) योग। यूगुर, विटेटेर के अनुसार, कभी-कभी एक गदा के रूप में वर्णित दिव्य हथियार, कभी-कभी तलवार के रूप में, पीआईई * वाग्'-आरए, स्कt। वज्रा, जो जड़ से जुड़े हुए हैं- 'मजबूत हो', उग्रा में भी पाया - 'शक्तिशाली, हिंसक, पराक्रमी, क्रूर, गुस्सा'। कुल मिलाकर। हमारे पास भी गुस्सा है; गुस्सा'। अवेस्तन वज़रा में - मित्रा का हथियार है, और मध्य फ़ारसी व्याज़र में, वेज़ (आधुनिक फ़ारसी गुर्ज़) एक 'क्लब' है योग। उलिन 'रंगीन ऊन', अक्कल हूलानु 'कवर; ऊनी ', पीआईई * वाल / वूल-' ऊन ', हिट हुल्लाना-, हिला-, समझे वुला, स्कt। उराना ऊन योग। umbin 'कील, पंजा, उंगली, पैर की अंगुली', पीआईई * नग्गी, लात अनगिस 'कील, पंजे' कनेक्टेड है पुरानी आयरिश इंगन, यूनानी ओनिक्स, आर्म। एंगंग 'कील' योग। उर 'बंद करने के लिए; सुरक्षा ', पीआईई * युद्ध / wṛ-' बंद, बंद, कवर; गार्ड, चेतावनी, बचाओ, स्कt vṛ- 'को कवर करने के लिए, स्क्रीन, घूंघट, छुपाने, छुपाने, चारों ओर, रुकावट; बंद करने के लिए (एक दरवाजा); 'वार्ड ऑफ', उर-यू-'कवर करने, निवेश करने, छिपाने, चारों ओर', ओसेटिक मर्ट 'ढाल, संरक्षण', पुरानी अंग्रेज़ी बंगाली 'रक्षा करने के लिए' योग। उरु 'बोना, खेती, हल', लैटिन उर्वरे 'को हल करने के लिए, एक हल के साथ चिह्नित करें,' उर्वम 'हल-पूंछ', वर्व-एगर 'भूमि हल करने के लिए', स्क्टी। उर्वारा 'उपजाऊ मिट्टी, खेत उपज फसल' योग। उरुद 'तांबे', पीआईई * (एच) रुध- 'लाल', स्क्टी। रुधिर-जीआर इरीथ्रॉस, पुरानी अंग्रेज़ी रूडु, वेल्श रड्ड 'लाल'
_______________________________________
Sum. (Ebla) uwi ‘sheep’, PIE *Hawi- ‘sheep’, Luwian hawi- 'sheep', Arm. hoviw 'shepherd', Lat. ovis, Old High German ouwi 'sheep'. Sum. zal 'to shine', zalag '(to be) pure; (fire) light; (to be) bright, to shine', PIE *swal- 'to shine, burn, sun, light, glory'. In Greek we find selagéo 'I enlighten, I shine', selagos 'ray', selas 'light, brightness, flame; lightning, flash', selēnē 'moon' (Aeolic selanna). These Greek words are generally derived from PIE *swel/sūl/sā́wel- 'to shine', found also in Skt. svar- 'sun, light, heaven; to shine', svarga 'heaven, paradise', sūrya, Lat. sol, Gothic sauil, Greek hēlios 'sun' (from *sawelios, we have also the Cretan abelios, Aeolic aelios and Epic ēelios). The passage sw- to s- in Greek is found also in sīgē 'silence', from PIE *swīg- (see sig above), and somphos 'spongy, porous', from PIE *swambha- (OHG swambo 'mushroom', Old English swamm 'sponge, mushroom'). Again, we would find a similar loss of w in Sumerian and Greek, which apparently creates a voiced z in Sumerian in this case. According to the Pennsylvania Dictionary, a variant form of zalag is sulug, which can be a different dialectal result of *swalag-, with vocalic harmony. It is interesting that the closest parallel formations are in Greek, whith the addition of -ag-. However, for the passage from sw to s we can also cite Toch. B sälp- ‘be set alight, blaze up; burn’, which is accepted by Douglas Adams as "an extension of the widely attested *swel- ‘burn, smoulder’" and is connected with Latin sulphur (see here). Sum. zurzar (zur-za-ar) 'sound', zarah 'wailing, lamentation', Akk. ṣarāhu 'to cry out, wail, complain; lament, sing lamentation', Sum. šir 'to sing, play an instrument; song', PIE *swar/swir/sur-, Skt. svara- 'sound', svarati 'to utter a sound, resound', Russian svara 'altercation', OCS svirati 'to play a flute', Gothic swaran 'to swear', Old Norse swarmr 'noise', German surren 'to whisper, hum, buzz', Lat. susurrus 'whisper'. So, we have some quite strong evidence of common roots and loanwords, especially with Indo-Iranian, Greek, Italic and Anatolian, sometimes also with Germanic and Balto-Slavic. Some exclusively Indo-Iranian and Greek forms suggest that an IE language was spoken close to the Sumerians and spread to the Indo-Iranian area and Greece. Where could this language be spoken and which archaeological culture can be connected with it? From some words, it seems that it was a culture which knew farming, flour milling, herding, buildings and water channels. In Mesopotamia, irrigation agriculture started in the Samarra culture (see here), which influenced the Ubaid culture of Eridu and other Sumerian cities: "According to Gwendolyn Leick, Eridu was formed at the confluence of three separate ecosystems, supporting three distinct lifestyles, that came to an agreement about access to fresh water in a desert environment. The oldest agrarian settlement seems to have been based upon intensive subsistence irrigation agriculture derived from the Samarra culture to the north, characterised by the building of canals, and mud-brick buildings. The fisher-hunter cultures of the Arabian littoral were responsible for the extensive middens along the Arabian shoreline, and may have been the original Sumerians. They seem to have dwelt in reed huts. The third culture that contributed to the building of Eridu was the nomadic Semitic pastoralists of herds of sheep and goats living in tents in semi-desert areas. All three cultures seem implicated in the earliest levels of the city." The Samarra culture was developed in 5600-4800 in an area not only bordering the northern Zagros that we have proposed as the PIE cradle, but also including the same region where Jarmo is found, the Neolithic site, inhabited around 7000 BC on the Zagros foothills, which presents affinities with the Iranian sites of the Zagros and the Caspian region and with Mehrgarh in Baluchistan, as we see from the lithic inventory and figurines (see my previous post). The Samarra culture is characterized by a style of painted ware rich in geometric motifs: the most typical are the swastika and the cross, two elements very popular also in Iranian art of the Bronze age until the historical times, while the swastika subsequently disappears in Mesopotamia. It is also interesting that the root meaning 'rotation' (bal/val-), a central element of Samarran art, appears to be shared by Sumerian and Indo-European. Samarran painted bowl Samarran designs So, we can suppose that the Samarran people were ancient speakers of an Indo-European language, who were assimilated by Sumerians and left an important heritage of technology, words and concepts to the Sumerian civilization. If this is true, Indo-Europeans, far from being originally nomadic barbarians of the North, would be involved in the first urban and literate civilization of Mesopotamia, the source of a great part of the Eurasian cultural evolution. Impruneta, 3-5-2015 (with later additions)
__________________________________________
           अनुवादित रूप  (भाग दो )
योग। (एब्ला) यूवी 'भेड़', पीआईई * हुवाई- 'भेड़', लुवेन होवी- 'भेड़', आर्म होवीव 'चरवाहा', लात ओविस, ओल्ड हाई जर्मन की 'भेड़' योग। जला 'चमक', जलाग '(होना) शुद्ध; (आग) प्रकाश; (होना) उज्ज्वल, चमकने के लिए ', पीआईई * स्वाल-' चमकने के लिए, जला, सूर्य, प्रकाश, महिमा ' ग्रीक में हम 'सेलागिएओ' को सिखाते हैं, मैं चमक रहा हूँ, सेलागॉस 'रे', सेला 'प्रकाश, चमक, लौ; बिजली, फ्लैश ', सेलेनिस' चंद्र '(एओलिक सेलाना)। ये ग्रीक शब्द आम तौर पर पीईई * स्वेल / सोल / सावेल- 'चमकने के लिए' से प्राप्त होते हैं, जो स्कt में भी पाए जाते हैं। स्वार- 'सूर्य, प्रकाश, स्वर्ग; चमकने के लिए ', स्वर्ग' स्वर्ग, स्वर्ग ', सूर्य, लाट सोल, गॉथिक सॉइल, यूनानी हॉलीओस 'सूरज' (* सेलिओलिस से, हम क्रेतेन एबिलियस, एओलिक एलीओस और एपिक ēelios भी हैं)। पीईई * स्विंग (ऊपर सिग देखें), और स्फोफॉस 'स्पंज, झरझरा', पीईई * स्वंघ (ओएचजी स्वमबो 'मशरूम', ओल्ड अंग्रेजी स्वाद 'स्पंज, मशरूम') फिर से, हम सुमेरियन और यूनानी भाषा में एक समान नुकसान की खोज करेंगे, जो जाहिरा तौर पर इस मामले में सुमेरियन में एक ज़ोरदार ज़ेन बनाता है। पेंसिल्वेनिया शब्दकोश के अनुसार, जलाग का एक प्रकार का रूप सल्लुग है, जो कि स्वराज के अलग-अलग द्वैभाषिक परिणाम हो सकता है, जिसमें मुखर सद्भाव होता है। यह दिलचस्प है कि निकटतम समानांतर संरचनाएं ग्रीक में हैं, जो कि -गैग के अलावा। हालांकि, एसएच से लेकर बी के लिए हम भी टेक का हवाला देते हैं। बी एसएएलपी- 'उतरना तय हो, आग लगना; जला ', जिसे डगलस एडम्स द्वारा स्वीकार किया गया है "व्यापक रूप से स्वीकृत * स्विल-' जला, धुंधला 'का विस्तार" और लैटिन सल्फर (यहां देखें) के साथ जुड़ा हुआ है। योग। ज़ुजर (ज़ुर-ज़ा-एआर) 'ध्वनि', ज़राह 'रोना, विलाप', अक्का ṣarahu 'रोना, आओ, शिकायत; विलाप, विलाप गाओ ', योग šir 'गाने के लिए, एक यंत्र खेलते हैं; गीत ', पीआईई * स्वर / स्विर / सुर-, स्कt सुवर्ण 'ध्वनि', सवाराती 'एक आवाज, आवाज़ बोलना', रूसी स्वर 'विवाद', ओसीएस शवीती 'एक बांसुरी खेलने के लिए', गॉथिक शप को 'कसम' करने के लिए, पुराना नॉर्स झुंड 'शोर', जर्मन सररेन 'कानाफूसी करने के लिए , हू, बज़ ', लाट ससुर्रस 'कानाफूसी' इसलिए, हमारे पास आम जड़ों और ऋण के कुछ ठोस प्रमाण हैं, विशेषकर भारत-ईरानी, ​​ग्रीक, इटैलिक और एनाटोलियन के साथ, कभी-कभी जर्मनिक और बाल्टो स्लाव सहित। कुछ विशेष रूप से भारत-ईरानी और यूनानी रूपों का सुझाव है कि एक आईई भाषा सुमेरियों के करीब बोली जाती है और इंडो-ईरानी क्षेत्र और ग्रीस में फैलती है। यह भाषा कहां कह सकती है और किस पुरातत्व संस्कृति को इसके साथ जोड़ा जा सकता है? कुछ शब्दों से, ऐसा लगता है कि यह एक ऐसी संस्कृति थी जो कि खेती, आटा मिलना, हेडिंग, इमारतों और जल चैनलों को जानता था। मेसोपोटामिया में, सिंचाई कृषि समरा संस्कृति में शुरू हुई (देखें यहां), जो एरिदु और अन्य सुमेरियन शहरों की उबेद संस्कृति को प्रभावित करती है: "ग्वेन्डोलिन लीक के अनुसार, तीन अलग-अलग पारिस्थितिकी प्रणालियों के संगम पर एरीदु का गठन किया गया था, जो कि तीन अलग-अलग जीवन शैली का समर्थन करता था एक रेगिस्तान वातावरण में ताजा पानी की पहुंच के बारे में एक समझौते पर आया था। सबसे पुराना कृषि समझौता गहन निर्वाह सिंचाई कृषि पर आधारित था, जो सामरा संस्कृति से उत्तर में उत्तर में प्राप्त हुआ, जो नहरों के निर्माण और मिट्टी-ईंट की इमारतों की विशेषता है। अरेबियन समुद्र तट के मछुआरे शिकारी संस्कृतियों ने अरबी तटरेखा के साथ व्यापक मिडवेन के लिए जिम्मेदार ठहराया था, और शायद ये मूल सुमेरियन हो सकते थे। वे रीड झोपड़ी में रहते थे। तीसरी संस्कृति, जो एरिडू के निर्माण में योगदान देती थी, खानाबदोश थी अर्ध-रेगिस्तानी इलाकों में तम्बों में रहने वाले भेड़ों और बकरियों के झुंड के सेमीटिक पर्शियनवादियों। तीनों संस्कृतियों को कर्कशियों में फंसाया जाता है शहर के टी स्तर। " समरा संस्कृति 5600-4800 में एक क्षेत्र में विकसित हुई थी, न कि उत्तरी ज़ग्रोस की सीमा के साथ ही हमने पीआईई के झुण्ड के रूप में प्रस्तावित किया है, लेकिन साथ ही उस क्षेत्र को भी शामिल किया गया है जहां जिर्मो पाया जाता है, निओलिथिक साइट, 7000 ईसा पूर्व के आसपास ज़ग्रोस तलहटी पर बसा है , जो ज़ग्रोस और कैस्पियन क्षेत्र की ईरानियों की साइटों और बलूचिस्तान में मेहरगढ़ के साथ समानताएं प्रस्तुत करता है, जैसा कि हम लिथिक इन्वेंट्री और मूर्तियों (देखें मेरी पिछली पोस्ट देखें) से। समर संस्कृति को चित्रित वेयर की एक शैली से ज्यामितीय रूपांकनों में समृद्ध है: सबसे सामान्य हैं स्वस्तिका और क्रॉस, ईरानियाई कला में काफ़ी उम्र के दो तत्व, जो ऐतिहासिक काल तक बहुत लोकप्रिय हैं, जबकि स्वस्थिका बाद में मेसोपोटामिया में गायब हो जाती है। । यह भी दिलचस्प है कि मूल अर्थ 'रोटेशन' (बाल / वैल), समरान कला का एक केंद्रीय तत्व, सुमेरियन और इंडो-यूरोपियन द्वारा साझा किया जा रहा है। समर्रान चित्रित कटोरा समरानन डिजाइन इसलिए हम समझ सकते हैं कि समर्रान लोग एक भारतीय-यूरोपीय भाषा के प्राचीन वक्ताओं थे, जो सुमेरियनों द्वारा आत्मसात कर चुके थे और सुमेरियन सभ्यता के लिए प्रौद्योगिकी, शब्दों और अवधारणाओं का एक महत्वपूर्ण विरासत छोड़ दिया था। अगर यह सच है, तो उत्तर-पूर्व में मूल रूप से भ्रामक बर्बर होने से भारत-यूरोपियों को मेसोपोटामिया की पहली शहरी और साक्षरता सभ्यता में शामिल किया जाएगा, जो यूरेशियन सांस्कृतिक विकास का एक बड़ा हिस्सा है। Impruneta, 3-5-2015 (बाद में अतिरिक्त के साथ)-
-------------------------------------------------------------------.   Undoubtedly, history is not an affrontation with pre-insistence -
In this context, by Yadav Yogesh Kumar  'Rohi'
Equation of Sumerian, European and Sanskrit language group of Indian language Sanskrit
Introducing.....
अर्थात्
नि: सन्देह इतिहास पूर्व-आग्रह से ग्रसित न होकर एक नि:पक्ष विवरण है --
इसी प्रसंग में यादव योगेश कुमार 'रोहि' के द्वारा
सुमेरियन , यूरोपीयन तथा भारतीय भाषा संस्कृत के सांस्कृतिक शब्द समूह का समीकरण
प्रस्तुत है .......