शनिवार, 30 सितंबर 2017

बुद्ध के ईश्वर सम्बद्ध विचार -

भगवान् बुद्ध ने स्वयं के इश्वर होने,तथा किसी इश्वर का अवतार होने या किसी इश्वर का दूत होने से साफ़ इनकार किया है,उन्होंने स्वयं को मार्गदर्शक कहा है| किसी और के इश्वर होने के प्रश्न पर वे मौन हो कर गुजरते हुए समय की तरफ इशारा किया है ,जिसे समय गुजरने के साथ कुछ बौध सम्प्रदाए में इंकार या अनीश्वरवाद समझा गया, जबकि कुछ सम्प्रदायें में भगवान् बुद्ध को ही इश्वरिये शक्ति के रूप में स्वीकार कर लिए|
इस संसार को किसने बनाया? “इस संसार को किसने बनाया?” यह एक सामान्य प्रश्न है. “इस दुनिया को ईश्वर ने बनाया.” यह वैसा ही सामान्य सा उत्तर है. तथागत ने ईश्वर को कभी सृष्टिकर्त्ता के रुप में स्वीकार नहीं किया. बुद्ध ने कहा, ” धर्म -आधारित ईश्वर मात्र एक कल्पना है. इसलिये ऐसे धर्म का भी कोई उपयोग नहीं.” बुद्ध ने इस विषय को ऐसे ही नहीं छोड़ दिया. उन्होने इस विषय के अनेक पहलुओं पर विचार किया. बुद्ध का तर्क था कि ईश्वर का सिद्धान्त सत्य पर आश्रित नहीं है. उन्होंने इसे वासेठ्ठ और भारद्धाज के साथ हुई बातचीत में स्पष्ट किया है. एक बार वासेट्ठ और भारद्धाज में एक विवाद खड़ा हुआ कि सच्चा मार्ग कौन सा है और झूठा कौन सा? इस समय तथागत बुद्ध भिक्षु संघ के साथ कौशल जनपद में विहार कर रहे थे. वह मनसाकत नामक ब्राह्मण गाँव में अचिरवती नदी के तट पर एक बगीचे में ठहरे थे. वासेट्ठ और भारद्धाज दोनों मनसाकत नाम की बस्ती में ही रहते थे. जब उन्होंने सुना कि तथागत उनकी बस्ती में आये हैं तो वे उनके पास गये और दोनों ने भगवान्‌ बुद्ध से अपना दृष्टिकोण रखने का निवेदन किया. भारद्धाज ने कहा, “तरुक्ख का दिखाया मार्ग सीधा-साधा है, वह मुक्ति का सीधा मार्ग है और जो इसका अनुसरण कर लेता है उसे वह ब्रह्म से मिला देता है. ”वासेट्ठ ने कहा, “ हे गौतम, बहुत से ब्राह्मण बहुत से मार्ग सुझाते हैं – अध्वर्य ब्राह्मण, तैत्तिरिय ब्राह्मण, कंछोक ब्राह्मण तथा भीहुवर्गीय ब्राह्मण. वे सभी मानव, जो इनके बताये मार्ग का अनुकरण करते हैं, तो ये मार्ग उन्हें ब्रह्म से मिला देते हैं. जिस प्रकार किसी गाँव या नगर के पास अनेक रास्ते होते हैं, किन्तु वे सभी उसी गांव मे पहुंचा देते हैं, उसी तरह से ब्राह्मणों द्वारा दिखाये सभी पथ ब्रह्म से जा मिलते हैं.” तथागत ने प्रश्न किया, “तो वासेट्ठ तुम्हारा क्या यह कहना है कि वे सभी मार्ग सही हैं?” वासेट्ठ बोला, “श्रमण गौतम हाँ, मेरा यही मानना है” “लेकिन वासेट्ठ ! क्या तीनों वेदों के जानकार ब्राह्मणों के गुरुओं में कोई एक भी ऐसा है, जिसने ब्रह्म का आमने सामने दर्शन किया हो?” “गौतम ! निश्चित नही !” “तो ब्रह्म को किसी ने नहीं देखा? किसी को ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं हुआ?” वासेट्ठ बोला, “हां ऐसा ही है.” “तब तुम कैसे यह मान सकते हो कि ब्राह्मणों का कथन सत्य-आश्रित है?” “वासेट्ठ ! जैसे कोई अंधे की कतार हो, न आगे चलने वाला अंधा देख सकता हो, न बीच में और न पीछे चलने वाला अंधा. इसी तरह वासेट्ठ ! मुझे लगता है कि ब्राह्मणों का कथन सिर्फ़ अंधा-कथन है. न आगे चलने वाला देखता है, न बीच वाला और न पीछे वाला देखता है. इन ब्राह्मणों की बातचीत केवल हास्यास्पद है, शब्द मात्र जिसमें कोई सार नही.” “वासेट्ठ क्या यह ऐसा नहीं है कि किसी आदमी का किसी स्त्री से प्रेम हो गया हो जिसे उसने देखा तक नही है?” “वासेट्ठ बोला, “हां यह ऐसा ही है.” “वासेट्ठ! तब तुम यह बताओ कि यह कैसा होगा कि जब लोग उस आदमी से पूछेंगे कि जिस सुन्दरतम स्त्री से तुम प्रेम करने की बात करते हो, वह अमुक स्त्री कौन है? कहां की है?” सृष्टि के तथाकथित रचयिता की चर्चा करते हुये तथागत ने भारद्धाज और वासेट्ठ से कहा, “मित्रों! जिस प्राणी ने पहले जन्म लिया था, वह अपने बारे मे सोचने लगा कि मै ब्रह्म हूँ, विजेता हूँ, निर्माता हूं, अविजित हूँ, सर्वाधिकारी हूँ, मालिक हूँ, निर्माता हूँ, रचयिता हूँ, व्यवस्थापक हूँ, आप ही अपना स्वामी हूँ और जो हैं तथा वे जो भविष्य में पैदा होने वाले हैं, उन सब का पिता हूँ, मैं ही इन सब प्राणियों को उत्पन्न करता हूँ.” “तो इसका यह मतलब हुआ न कि वे जो अभी है और जो भविष्य में उत्पन्न होने वाले हैं, ब्रह्म सबका पिता है?“ “तुम्हारा कहना है कि यह जो पूज्य, विजेता, अविजित, जो है तथा जो होगें उन सब का पिता, जिससे हमारी उत्पति हुई है – वह ब्रह्म है, वह स्थायी है, सतत् रहने वाला है, नित्य है, अपरिवर्तन-शील है और वह अनन्त काल तक ऐसा ही रहेगा, तो हम जिन्हें ब्रह्म ने उत्पन्न किया है, जो ब्रह्म के यहाँ से आये हैं, सभी अनित्य क्यों है? परिवर्तनशील क्यों हैं? अस्थिर क्यों हैं? अल्पजीवी क्यों हैं? और मरणाधर्मी क्यों हैं?” इसका वासेट्ठ के पास कोई उत्तर नही था. तथागत का तीसरा तर्क ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता से संबधित था. “यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान और सृष्टि का पर्याप्त कारण है, तो फ़िर आदमी के दिल मे कुछ करने की इच्छा ही उत्पन्न नही हो सकती, उसे कुछ करने की आवशयकता भी नही रह सकती, न उसके मन में कुछ करने का संकल्प ही पैदा हो सकता है. यदि वह ऐसा ही है तो ब्रह्म ने आदमी को पैदा ही क्यों किया?” इसका भी वासेट्ठ के पास कोई उत्तर नहीं था. तथागत का चौथा तर्क था, “यदि ईश्वर कल्याण-स्वरुप है तो आदमी हत्यारे, चोर, व्यभिचारी, झूठे, चुगलखोर, लोभी, द्वेषी, बकवादी और कुमार्गी क्यों हो जाते हैं? क्या किसी अच्छे, भले ईश्वर के रहते यह संभव है?” तथागत का पाँचवां तर्क ईश्वर के सर्वज्ञ, न्यायी, और दयालु होने से संम्बधित था. “यदि कोई ऐसा महान्‌ सृष्टि-कर्त्ता है, जो न्यायी भी है और दयालु भी है, तो संसार मे इतना अन्याय क्यों हो रहा है?” तथागत बुद्ध का प्रश्न था. उन्होने कहा, “जिसके पास भी आंख है, वह इस दर्दनाक हालत को देख सकता है. ब्रह्म अपनी रचना सुधारता क्यों नहीं है? यदि उसकी शक्ति इतनी असीम है कि उसे कोई रोकने वाला नही, तो उसके हाथ ही ऐसे न हों जो किसी का कल्याण करते हो? उसकी सारी की सारी सृष्टि दु:ख क्यों भोग रही है? वह सभी को सुखी क्यों नही रखता है? चारों ओर ठगी, झूठ, अज्ञान क्यों फ़ैला हुआ है? सत्य पर झूठ क्यों बाजी मार ले जाता है? सत्य और न्याय क्यों पराजित हो जाते है? मैं तुम्हारे ब्रह्म को परम अन्यायी मानता हूँ, जिसने केवल अन्याय करने के लिये इस जगत की रचना की है.” “यदि सभी प्राणियों में कोई ऐसा सर्वशक्तिमान ईश्वर व्याप्त है, जो उन्हें सुखी और दुखी बनाता है और जो उनसे पाप पुण्य कराता है तो ऐसा ईश्वर भी पाप से सनता है, या तो आदमी ईश्वर की आज्ञा में नही है या ईश्वर नेक और न्यायी नही है अथवा ईश्वर अन्धा है.” ईश्वर के अस्तित्व के सिद्धान्त के विरुद्ध उनका अगला तर्क यह था कि ईश्वर की चर्चा से कोई प्रयोजन सिद्ध नही होता. बुद्ध के अनुसार धर्म की धुरी ईश्वर और आदमी का सम्बन्ध नहीं है बल्कि आदमी का आदमी के साथ संम्बन्ध है. धर्म का प्रयोजन यही है कि वह आदमी को शिक्षा दे कि वह दूसरे आदमी के साथ कैसे व्यवहार करे ताकि सभी आदमी प्रसन्न रह सकें. तथागत की दृष्टि में ईश्वर विश्वास सम्यक्‌ दृष्टि के मार्ग मे अवरोधक है. यही कारण था कि वह रीति-रिवाजों, प्रार्थना और पूजा के आडंबरों के सख्त खिलाफ़ थे. तथागत का मानना था कि प्रार्थना करने की जरुरत ने ही पुरोहित को जन्म दिया और पुरोहित ही वह शरारती दिमाग था जिसने इतने अन्धविशवास को जन्म दिया और सम्यक दृष्टि के मार्ग को अवरुद्ध किया. तथागत का ईश्वर अस्तित्व के विरुद्ध आखिरी तर्क प्रतीत्य-समुत्पाद के अन्तर्गत आता है. इस सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व है या नही, यह मुख्य प्रश्न नहीं है और न ही ये कि ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है या नहीं? असल प्रश्न है कि ईश्वर ने सृष्टि किस प्रकार रची? प्रश्न महत्वपूर्ण यह है कि ईश्वर ने सृष्टि किसी पदार्थ से उत्पन्न की या शून्य से? यह तो एकदम विश्वास नहीं किया जा सकता कि ‘कुछ नही‘ में से कुछ की रचना की गई. यदि ईश्वर ने सृष्टि की रचना कुछ से की है तो वह कुछ – जिसमें से नया कुछ उत्पन्न किया गया है, ईश्वर के किसी भी चीज के उत्पन्न करने के पहले से ही चला आया है. इसलिये ईश्वर को उस कुछ का रचयिता नहीं स्वीकार किया जा सकता क्योंकि वह कुछ पहले से ही अस्तित्व में चला आ रहा है. यदि ईश्वर के किसी भी चीज की रचना करने से पहले ही किसी ने कुछ में से उस चीज की रचना कर दी है, जिससे ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है तो ईश्वर सृष्टि का आदि-कारण नहीं कहला सकता. तथागत बुद्ध के इन सभी तर्कों का वासेट्ठ और भारद्धाज के पास कोई जबाब नही था ।
बौध धम्म पूर्णतः वैज्ञानिकता पर आधारित धर्म है जहाँ प्रमाणिकता के बिना कुछ भी स्वीकार्य नहीं, जबकि अन्य सभी धर्मों के सिद्धांत केवल आस्था और परंपरा के बल पर चल रहे हैं| अब भी दुनियां में ऐसा बहुत कुछ है जो वैज्ञानिकता और इंसान के समझ के परे है जिसे अन्य धर्म अपने धर्म से जोड़कर जनता को अपने साथ मिलाये रखते हैं| बुद्ध धम्म में ऐसा नहीं है, भगवान् बुद्ध ने इस विषय में कहा है की “सर्वोच्च सत्य अवर्णननिये है” | पर ये भी एक सच्चाई है की जब किसी व्यक्ति के जीवन में भीषण दुःख या परालौकिक घटनाएँ होतीं हैं तब केवल इश्वर रुपी काल्पनिक सहारा ही उसे ढाढस बंधता है| बौध धम्म की सभी बातें सभी को अच्छी लगती हैं पर अनीश्वरवाद की बात से पीछे हट जाता है , 10% बुद्धिजीवी वर्ग तो अनीश्वरवाद को समझ सकता है पर मानते वे भी नहीं हैं |इसपर 90% आम आदमी को तो अटूट विशवास है की कोई न कोई सर्वशक्तिमान तो है जो दुनियां चलता है|आम आदमी चमत्कार को नमस्कार करता है,उसे कोई ऐसा चाहिए ही चाहिए जिसके आगे वो अपने सुख दुःख रख सके| वो सच्चाई जानना ही नहीं चाहता ऐसे में उन तक भगवान् बुद्ध का सन्देश कैसे पहुंचेगा? यही कारण रहा की ये महा-कल्याणकारी धर्म हर आदमी तक आज भी नहीं पहुँच पा रहा है | असल में व्यापक प्रचार न होने के कारण बौध धम्म को समझने के लिए थोडा अध्यन करना पड़ता है इसलिए ये केवल बुद्धि-जीवी वर्ग तक ही सीमित होकर रह गया है|उन्हें बाकि बातें समझने के लिए जीवित गुरु के प्रवचनों की आवश्यकता होती है, मौलवी,पादरी,पुरोहित,सत्संग अदि इसी जरुरत का एक उदाहरण है | इसी बात का फायदा उठाकर अन्य धर्म बहुसंख्यक आम जनता को काल्पनिक आस्था,चमत्कार और कर्मकांडों में फसाकर सत्य से दूर कर देते हैं |शायद इसी इश्वरिये कल्पना की जरूरत के चलते सभी धर्म किसी इश्वरिये नाम पर केन्द्रित होते हैं,यहाँ तक की कुछ अभिनज्ञ अनुयाई भगवान् बुद्ध को ही इश्वरिये शक्ति के रूप में पूजते हैं | हम केवल समय को ही इश्वर मानते हैं |
पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- "हमें अपने आप को कहीं भी सीमित नहीं करना चाहिए वर्ना हम कुए के मेडक कि भांति सत्य से अपरिचित रह जायेंगे,परिणाम हमें नुक्सान उठाना पड़ेगा|"  गुजरात में 13-अक्टूबर-2013 को एक लाख बहुजन लोगों ने हिन्दू/ब्राह्मण धर्म को छोड़कर वापस अपने बौद्ध धम्म में लौटने की संगठित दीक्षा ली|…राकेश प्रियेदर्शीबौध धर्म के कुछ जाने माने महान अनुयायीे ईरान का शासक बनने से बहुत पहले खुसरो एक गुरुकुल में रहता था और उसके गुरु उसे समस्त शास्त्र और विद्या में पारंगत करने के लिए प्रतिबद्ध थे. एक दिन खुसरो के गुरु ने अकारण ही उसे कठोर शारीरिक दंड दे दिया. कई वर्ष बाद जब खुसरो राजगद्दी पर बैठा तो उसने सबसे पहले अपने गुरु को महल में बुलवाया और पूछा कि उन्होंने सालों पहले किस अपराध के लिए उसे कठोर दंड दिया था. “आपने मुझे अकारण ही कठोर दंड क्यों दिया? आप भलीभांति जानते थे कि मैंने कोई भी गलती या अपराध नहीं किया था”. “जब मैंने तुम्हारी बुद्धिमता देखी तब में यह जान गया कि एक-न-एक दिन तुम अपने पिता के साम्राज्य के उत्तराधिकारी अवश्य बनोगे,” गुरु ने कहा. “तब मैंने यह निश्चय किया कि तुम्हें इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि किसी व्यक्ति के साथ किया गया अन्याय उसके हृदय को आजीवन मथता रहता है. मैं आशा करता हूं कि तुम किसी भी व्यक्ति को बिना किसी कारण के कभी प्रताड़ित नहीं करोगे।
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बुद्ध के विचार ईश्वर के विषय में -

महात्मा बुद्ध को उनके अनुयायी ईश्वर में विश्वास न रखने वाला नास्तिक मानते हैं।
आजकल जो लोग अपने को बौद्धमत का अनुयायी कहते हैं उनमें बहुसंख्या ऐसे लोगों की है जो ईश्वर और आत्मा की सत्ता से इन्कार करते हैं तथा वेदों की निन्दा करते हैं। माननीय डा. भीमराव अम्बेदकर भी जिस बौद्धमत के प्रचार के लिए प्रयत्नशील थे उसमें भी बौद्धमत का ऐसा ही नास्तिक स्वरूप माना जाता है, किन्तु बौद्ध ग्रन्थों के निष्पक्ष अनुशीलन करने पर वह (पं. धमदेव विद्यामार्तण्ड) इस परिणाम पर पहुंचें हैं कि महात्मा बुद्ध ईश्वर की सत्ता से सर्वथा इनकार करनेवाले और वेदों की निन्दा करने वाले न थे, प्रत्युत आस्तिक थे। एक बड़ी कठिनाई महात्मा बुद्ध के यथार्थ विचार जानने में यह है कि उन्होंने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा अब दीघनिकाय, मज्झिनिकाय, विनयम पिटक आदि जो भी ग्रन्थ महात्मा बुद्ध के नाम से पाये जाते हैं उनका संकलन उनके निर्वाण की कई शताब्दियों के पश्चात् किया गया जिनमें से बहुत-सी उक्तियां किंवदन्ती के ही रूप में हैं। नास्तिक कौन होता है? इस प्रश्न को उठाकर उसका समाधान करते हुए आर्यविद्वान पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि अष्टाध्यायी के ‘अस्ति नास्ति दिष्टं मतिं’ इस सुप्रसिद्ध सूत्र के अनुसार जो परलोक और पुनर्जन्म आदि के अस्तित्व को स्वीकार करता है वह आस्तिक है और जो इन्हें नहीं मानता वह नास्तिक कहाता है। महात्मा बुद्ध परलोक और पुनर्जन्म को मानते थे इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसलिये उन्हें सिद्ध करने के लिए अनेक प्रमाण देना अनावश्यक है। प्रथम प्रमाण के रूप में धम्मपद के जरावग्गो श्लोक (संख्या 153) ‘अनेक जाति संसारं, सन्धाविस्सं अनिन्विस। गृहकारकं गवेस्संतो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।।’ में महात्मा बुद्ध ने कहा है कि अनेक जन्मों तक मैं संसार में लगातार भटकता रहा। गृह निर्माण करनेवाले की खोज में। बार-बार जन्म दुःखमय हुआ। श्लोक का यह अर्थ महाबोधि सभा, सारनाथ-बनारस द्वारा प्रकाशित श्री अवध किशोर नारायण द्वारा अनुदित धम्मपद के अनुसार है। दूसरा प्रमाण ब्रह्मजाल सुत्त का है जहां महात्मा बुद्ध ने अपने 2 या 4 नहीं अपित लाखों जन्मों के चित्तसमाधि आदि के द्वारा स्मरण का वर्णन किया है। वहां उन्होंने कहा है–भिक्षुओं ! कोई भिक्षु संयम, वीर्य, अध्यवसाय, अप्रमाद और स्थिर चित्त से उस प्रकार की चित्त समाधि को प्राप्त करता है जिस समाधि को प्राप्त चित्त में अनेक प्रकार के जैसे कि एक सौ, हजार, लाख, अनेक लाख पूर्वजन्मों की स्मृति हो जाती है—“मै। इस नाम का, इस गोत्र का, इस रंग का, इस आहार का, इस प्रकार के सुखों और दुःखों का अनुभव करनेवाला और इतनी आयु तक जीनेवाला था। सो मैं वहां मरकर वहां उत्पन्न हुआ। वहां भी मैं इस नाम का था। सो मैं वहां मरकर यहां उत्पन्न हुआ।“ इत्यादि। अगला तीसरा प्रमाण धम्मपद के उपर्युक्त वर्णित श्लोक का अगला श्लोक है जिसमें गृहकारक के रूप में आत्मा का निर्देश किया गया है। श्लोक है- ’गह कारक दिट्ठोऽसि पुन गेहं न काहसि। सब्वा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसंखितं। विसंखारगतं चित्तं तण्हर्निं खयमज्झागा।।‘ इस श्लोक के अनुवाद में इसका अर्थ दिया गया है कि हे गृह के निर्माण करनेवाले! मैंने तुम्हें देख लिया है, तुम फिर घर नहीं बना सकते। तुम्हारी कडि़यां सब टूट गईं, गृह का शिखर गिर गया। चित्त संस्कार रहित हो गया, तृष्णाओं का क्षय हो गया। इस पर टिप्पणी करते हुए पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि यह मुक्ति अथवा निर्वाण के योग्य अवस्था का वर्णन है। जब तक ऐसी अवस्था नहीं हो जाती तब तक जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। इस प्रकार यह सर्वथा स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध परलोक, पुनर्जन्म आदि में विश्वास करने के कारण आस्तिक थे। महात्मा बुद्ध के आस्तिक होने से संबंधित अगला प्रश्न यह है कि क्या वह अनीश्वरवादी अर्थात ईश्वर में विश्वास न रखने वाले थे? इसका समाधान करते हुए पं. धर्मदेव जी लिखते हैं कि नास्तिक शब्द का एक प्रचलित अर्थ ईश्वर की सत्ता से इन्कार करनेवाले का है। क्या महात्मा बुद्ध ईश्वर की सत्ता से इन्कार करनेवाले थे इस विषय में अपने विचार संक्षेप से माननीय डा. अम्बेदकर जी से बात-चीत के प्रसंग में (संदर्भः सार्वदेशिक जुलाई 1951 अंक) प्रकट कर चुका हूं। इस विषय पर कुछ अधिक प्रकाश डालने से पूर्व मैं ‘सन्त सुधा’ के सम्पादक श्री ईश्वरदत्त मेधार्थी अणुभिक्षु बुद्धपुरी कानपुर के लेख से कुछ उद्धरण देना उचित समझता हूं। ‘सन्त सुधा’ के बुद्ध जयन्ती अंक में ‘सन्त सिद्धार्थ’ शीर्षक से महत्वपूर्ण अपने लेख में श्री मेधार्थी ने लिखा है कि ब्रह्म के विषय में भगवान बुद्ध स्वयं कहते हैं—“ब्रह्मभूतो अतितुलो मारसेन प्पमद्दनो। सब्वा मित्ते बसीकत्वा, मोदामि अकुतोभयो।।“ अर्थात् –मैं अब ब्रह्म पद को प्राप्त हुआ हूं, मेरी तुलना अब किसी से नहीं है, मैंने मार (कामदेव) की सेना को मर्दित कर दिया है। अब मैं काम, क्रोध आदि सब अन्तः शत्रुओं को वश में करके निर्भय होकर मस्त हो रहा हूं। विद्वान लेखक पं. धर्मदेव इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि यह एक ही वचन भगवान बुद्ध की आस्तिकता और ब्रह्मपद प्राप्ति के लिये पर्याप्त है। जरा-सी समझने की बात है कि जो स्वयं ब्रह्मविहार करता हो, ब्रह्मचारी हो, ब्रह्मभूत हो (यह सम्भव ही नहीं है कि) वह ब्रह्म को न माने? वास्तव में बौद्ध साहित्य में निर्वाण, ब्रह्म, अमृतपद, परमसुख, उत्तम अर्थ, अनाष्यात, दुलर्भनाथा आदि शब्द एकार्थवाचक हैं। जिज्ञासुओं को भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये। भगवान बुद्ध ने स्वयं कहा है–जो नास्तिक हैं उन्हें विनाशोन्मुख समझो। एक बात है–भगवान् बुद्ध आस्तिक तो थे ही, आर्य भी थे। आर्य शब्द से उन्हें बड़ा प्रेम था। चार आर्य सत्य, आर्य, अष्टांगिक मार्ग और आर्यश्रावक तो बहुत प्रसिद्ध हैं। आर्य शब्द गुणवाची है। आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ। इसलिये श्रेष्ठता, उच्चता, और उत्तमता की भावना के लिये ‘आर्य शब्द’ भगवान बुद्ध ने प्रयोग किया है। इसीलिये बुद्धपरी में आस्तिकता और अहिंसकता की श्रेष्ठ भावना को पुष्ट करने के लिये ‘आर्य बौद्ध’ शब्द का प्रचार किया जाता है। भगवान बुद्ध ने भी धम्मपद में स्वयं कहा है–’न तेन अरियो होति, येन पाणानि हिंसति। अहिंसा सबपाणानं, अरियोति पवुच्चति।।‘ (धम्मपद श्लोक 270, धम्मट्ठवग्गो 15) अर्थात् प्राणियों का हनन कर कोई आर्य नहीं होता, सभी प्राणियों की हिंसा न करने से उसे आर्य कहा जाता है। (सत्नसुधा कानपुर बुद्ध जयन्ती अंक मई 1950 पृष्ठ 10-11)। लेखक महोदय कहते हैं कि आचार्य मेधार्थीजी का उपर्युक्त लेख महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने बौद्ध ग्रन्थों का विशेष अनुशीलन करके उसे लिखा है और वे अपने को आर्य बौद्ध नाम से ही कहते हैं। पत्रिका सन्त-सुधा के मई 1950 अंक में आर्य बौद्ध संघ बुद्धपुरी के कुलगुरू श्री ज्ञानक्षेत्रजी की एक सूक्ति भी प्रस्तुत की गई है। यह सूक्ति है ”You will find so many Bhikshoos coming here (in Buddha Puri). They are the enemies of Om; but you will never leave Om, every thing is in Om, Lord Buddha is also in Om.” अर्थात् यहां बुद्धपुरी में आप कई भिक्षुओं को आते हुए पाते हैं जो ओम् (परमात्मा) के शत्रु या विरोधी हैं किन्तु आपको ओम् का परित्याग कभी नहीं करना चाहिये। सब कुछ ओम् में है। बुद्ध भगवान् भी ओम् में हैं। बुद्धत्व की प्राप्ति के पश्चात् अपने प्रथम ही उपदेश में जो सारनाथ में महात्मा बुद्ध जी ने दिया उसमें उन्होंने कहा—“अहं भिक्खवे! तथागत सम्मासम्बुद्धो उदूहथ भिक्खवे। सोतं अमतं अधिगतम् अहमनुसासामि अहं धम्र्मं देसेमि।“ अर्थात् भिक्षुओं ! मैं अब बुद्ध हो गया हूं। मैंने ‘अमृत’ की प्राप्ति कर ली है। अब मैं धर्म का उपदेश करता हूं। पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि अमृत नाम वेद और उपनिषदों में ब्रह्म अर्थात् ईश्वर के लिए प्रयुक्त हुआ। इसके उदाहरण भी आपने दिये हैं। धम्मपद श्लोक 160 (अत्तवग्गो 4) “अत्ताहि अत्तनो नथो को हि नाथो परो सिया अत्तनां व सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं।।“ में ईश्वर की सत्ता को महात्मा बुद्ध स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हुए कहते हैं कि आत्मा ही आत्मा का नाम है और कौन उस (परमात्मा) से बड़ा नाथ व स्वामी हो सकता है। अच्छी प्रकार आत्मा का दमन कर लेने से दुर्लभ नाथ (परमात्मा) की प्राप्ति होती है। ‘नाथं लभति दुल्ल्भं’ यह शब्द अत्यन्त स्पष्टरूप से दुर्लभ नाथ (परमात्मा) का निर्देश करते हैं। यद्यपि अनीश्वरवादी आधुनिक बौद्ध इसका अर्थ निर्वाण कर देते हैं जो संगत नहीं होता और जिसमें खींचा-तानी भी बहुत अधिक करनी पड़ती है। उपर्युक्त विवरण से सिद्ध है कि महात्मा बुद्ध ईश्वर विश्वासी व आस्तिक थे, अनीश्वरवादी नहीं। Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window)Click to share on Twitter (Opens in new window)Click to share on Google+ (Opens in new window)Click to share on LinkedIn (Opens in new window)Click to share on Reddit (Opens in new window)Click to share on Pinterest (Opens in new window)Click to share on Tumblr (Opens in new window)Share on Skype (Opens in new window)Click to email this to a friend (Opens in new window)Click to print (Opens in new window)

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

पूर्ण दस्तावेजीय परिचय

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प्रार्थी :--याेगेश कुमार
पिता का नाम :--श्री पुरुषोत्तम सिंह
माता का नाम :--- श्रीमती राजेश कुमारी
प्रार्थी की जन्म तिथि :--10/03/1983
हाईस्कूल परीक्षा का समय :-- 1997
हाईस्कूल में प्राप्तांक :--396 (first DV)
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इण्टर मीडिएट प्राप्तांक :--255/500 second Dv
इण्टर परीक्षा का समय :--सन् 2000
मो० 8077160219
Email :---
yogeshrohi3@gmail.com
पता :--ग्राम :--आज़ादपुर पत्रालय :- पहाड़ीपुर
तहसील :- अतरौली
जनपद :- अलीगढ़

हाईस्कूल में विषयगत अंक:-
हिन्दी :-67 /100
अंग्रेजी :-55/100
गणित:-70/100
विज्ञान दो :-65/100
सामाजिक विज्ञान :-60/100
जीवविज्ञान :- 75/100
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(सम्पूर्ण :- 396/600 )
------------------------------------इण्टर में विषयगत अंक :--
साहित्य हिन्दी :- 46
संस्कृत :-51
नागरिक शास्त्र :-55
अर्थशास्त्र :-51

समाज शास्त्र (Sociology):-52
                   
                    सम्पूर्ण :- (255/500)
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आधार संख्या :--441087927778